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श्रीगंगानगर में डेढ़ लाख रुपये चुकाने के बाद भी शव देने से इनकार, अस्पताल के बाहर परिजनों का जोरदार हंगामाराजस्थान
15 सित॰ 2026, 11:17 pm (2 घंटे पहले)· 0

श्रीगंगानगर में डेढ़ लाख रुपये चुकाने के बाद भी शव देने से इनकार, अस्पताल के बाहर परिजनों का जोरदार हंगामा

राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक निजी अस्पताल द्वारा बकाया राशि न चुकाने पर शव रोकने का मामला सामने आया है, जिसके बाद परिजनों ने जमकर हंगामा किया। मामले में मारपीट और जहर खाने की अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं, और पुलिस जांच में जुटी है।

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में एक निजी अस्पताल द्वारा बकाया भुगतान के नाम पर शव परिजनों को न सौंपने का गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना के बाद अस्पताल परिसर के बाहर भारी तनाव पैदा हो गया और परिजनों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। यह पूरा मामला जिला अस्पताल के ठीक सामने स्थित आरेस अस्पताल से जुड़ा हुआ है। हंगामे की सूचना मिलते ही सदर थाना पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास शुरू किए।

अस्पताल प्रशासन पर बकाया राशि के लिए शव रोकने का आरोप

मृतक के परिजनों का आरोप है कि वे इलाज के दौरान अस्पताल में पहले ही करीब डेढ़ लाख रुपये जमा करवा चुके हैं। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन द्वारा लगभग 52 हजार रुपये की बकाया राशि का भुगतान न होने का हवाला देकर शव देने से मना किया जा रहा था। इस रवैये से नाराज होकर परिजन आक्रोशित हो गए और अस्पताल के बाहर हंगामा शुरू कर दिया। हालांकि, इस पूरे मामले पर अस्पताल प्रबंधन की तरफ से क्या प्रतिक्रिया दी गई है, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

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परिजनों ने पुलिस अधीक्षक को सौंपी शिकायत में लगाए गंभीर आरोप

यह विवाद केवल शव रोकने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि मामले ने तब एक और मोड़ ले लिया जब मृतक की मां रोशनी देवी ने पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत दी। रोशनी देवी ने बताया कि उनका पूरा परिवार मजदूरी करके किसी तरह गुजर-बसर करता है और उनका 20 साल का बेटा महावीर भी मजदूरी का काम करता था। शिकायत के मुताबिक, गजसिंहपुर के रहने वाले राजा सिंह ने महावीर को अपने यहां काम के लिए बुलाया था और वह उनकी ढाणी में काम करने गया था। परिजनों का आरोप है कि वहां महावीर के साथ मारपीट की गई, जिसके चलते उसकी हालत बिगड़ी।

दवा पीने से मौत की बात और पुलिस की जांच जारी

दूसरी तरफ इस मामले में यह भी कहा जा रहा है कि महावीर के साथ किसी प्रकार की कोई मारपीट नहीं हुई थी, बल्कि उसने कोई जहरीली दवा या पदार्थ का सेवन किया था जिसके कारण उसकी मौत हुई। हंगामे और तनाव की स्थिति को देखते हुए पुलिस ने दोनों पक्षों से आमने-सामने बातचीत कर विस्तृत जानकारी जुटाई है। फिलहाल सदर थाना पुलिस इस पूरे प्रकरण की गहराई से जांच कर रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने और रिपोर्ट आने के बाद ही शव रोकने के आरोपों और मारपीट की शिकायत पर पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

सवाल-जवाब

यह घटना कहां की है?
यह घटना राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले की है।
किस अस्पताल के बाहर हंगामा हुआ?
यह हंगामा जिला अस्पताल के सामने स्थित आरेस अस्पताल के बाहर हुआ।
परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर क्या आरोप लगाया?
परिजनों ने आरोप लगाया कि बकाया 52 हजार रुपये न चुकाने के कारण अस्पताल ने शव देने से इनकार कर दिया, जबकि वे पहले ही डेढ़ लाख रुपये दे चुके थे।
मृतक का नाम क्या था और उसकी उम्र कितनी थी?
मृतक का नाम महावीर था और उसकी उम्र 20 वर्ष थी।
मृतक की मां ने पुलिस अधीक्षक को दी शिकायत में क्या बताया?
मां रोशनी देवी ने बताया कि महावीर गजसिंहपुर निवासी राजा सिंह की ढाणी में काम करने गया था, जहां उसके साथ मारपीट किए जाने का गंभीर आरोप लगाया गया।
मौत के कारणों को लेकर क्या दूसरा पक्ष सामने आया है?
दूसरी तरफ से यह कहा जा रहा है कि महावीर के साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी बल्कि उसने कोई दवा पी थी जिससे उसकी मौत हुई।
इस मामले में कौन सी पुलिस कार्रवाई कर रही है?
सदर थाना पुलिस इस पूरे मामले की जांच कर रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

यह घटना निजी अस्पतालों में मानवीय संवेदनाओं के पतन और प्रशासनिक निगरानी की कमी को उजागर करती है। गरीब परिवारों पर बकाया भुगतान का दबाव बनाकर शव रोकना गंभीर कानूनी उल्लंघन है। इसके अलावा, मारपीट और जहर सेवन के विरोधाभासी बयानों के बीच पुलिस की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच बेहद जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों पर कार्रवाई हो सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह प्रकरण सिर्फ एक अस्पताल के दुराचरण का नहीं, बल्कि चिकित्सा संस्थानों में विनियामक और नैतिक नियंत्रण के गंभीर क्षरण को दर्शाता है। शव को बंधक बनाना उपभोक्ता संरक्षण और भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत दंडनीय कृत्य है। इसके साथ ही, मौत के कारणों को लेकर उपजे विरोधाभास—शारीरिक प्रताड़ना और विषाक्तता—की वैज्ञानिक और दस्तावेजी जांच के लिए मेडिको-लीगल प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन होना चाहिए। यह मामला इस बात की भी मांग करता है कि जिला प्रशासन ऐसे संस्थानों के बिलिंग और उपचार रिकॉर्ड का स्वतंत्र ऑडिट करे, ताकि न्याय प्रक्रिया में कोई ढिलाई न हो सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मानवीय संवेदनाओं के पतन को दर्शाती है। क्लिनिकल इकॉनॉमिक्स और एथिक्स के बीच का यह संघर्ष गंभीर विधिक जांच की मांग करता है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद शव को बंधक बनाना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन है। आगे की पुलिस जांच में यदि अस्पताल द्वारा देय राशि के दबाव में शव रोकने और работода (नियोक्ता) स्तर पर हुई मारपीट के आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह मेडिकल लापरवाही और आपराधिक बल प्रयोग का एक जटिल मामला बनेगा, जिसमें दंडात्मक कार्रवाई तय है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

श्रीगंगानगर की यह घटना दर्शाती है कि कैसे गरीब और मजदूर वर्ग के लिए चिकित्सा व्यवस्था में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। डेढ़ लाख रुपये चुकाने के बाद भी महज बावन हजार के लिए शव रोकना गंभीर है। यदि पुलिस जांच में नियोक्ता द्वारा मारपीट और अस्पताल की लापरवाही दोनों आरोप सही साबित होते हैं, तो यह प्रशासनिक और मानवीय व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। ऐसे मामलों में त्वरित न्यायिक कार्रवाई जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी अमानवीय घटनाएं न दोहराई जा सकें।

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