सीकर के खेतों में इन दिनों एक अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है, जहां आमतौर पर दिखने वाले पीले या सफेद मक्के की जगह पांच अलग-अलग रंगों की बालियां लहरा रही हैं। यह कमाल किया है किसान संजय यादव ने, जिन्होंने सिर्फ आठवीं तक पढ़ाई की है, लेकिन खेती को एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करते हुए ऐसा मॉडल तैयार कर दिया कि अब दूसरे राज्यों के किसान भी उनके खेत तक सीखने पहुंच रहे हैं। प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, देसी बीज और घर पर बने कीटनाशकों के दम पर उन्होंने साबित कर दिया कि पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मायने मेहनत और लगातार सीखने की भूख रखती है।
कैसे शुरू हुआ प्रयोगों का सफर
प्राकृतिक खेती और मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग लेने के बाद संजय ने अपने खेत को टेस्टिंग ग्राउंड बना दिया। करीब दो साल तक उन्होंने अलग-अलग बीजों और तकनीकों पर लगातार हाथ आजमाया, तब जाकर पांच रंगों में मक्का उगाने में कामयाबी मिली। शुरुआत में यह सिर्फ एक प्रयोग था, लेकिन जैसे-जैसे नतीजे सामने आए, संजय का भरोसा भी बढ़ता गया। इस रंग-बिरंगे मक्के का आकर्षक रूप और बेहतर क्वालिटी जल्द ही चर्चा का विषय बन गई, यहां तक कि होटल और रेस्टोरेंट वाले भी इसकी मांग करने लगे। इस बढ़ती मांग और सफलता को देखते हुए संजय ने अपनी इस खास किस्म के मक्के के लिए पेटेंट के लिए आवेदन भी कर दिया है, ताकि उनकी मेहनत से तैयार यह किस्म कानूनी तौर पर उनके नाम दर्ज हो सके।
रसायन छोड़ते ही घटी लागत, बढ़ी बचत
संजय के मुताबिक पहले वे एक हेक्टेयर जमीन पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर थे, उस दौर में लागत में मुश्किल से 30 फीसदी तक की बचत हो पाती थी। धीरे-धीरे उन्होंने रसायनों का इस्तेमाल पूरी तरह त्याग दिया और देसी संसाधनों से तैयार खाद-कीटनाशकों पर शिफ्ट हो गए। नतीजा यह निकला कि खेती की लागत में भारी कमी आई और बचत का आंकड़ा 70 फीसदी तक जा पहुंचा। आज उनका खेत कम खर्च में ज्यादा पैदावार देने वाले मॉडल के तौर पर पहचाना जाता है, जिसे देखने के लिए किसान दूर-दूर से आते हैं।
पीएम मोदी से भी साझा किया मॉडल
अक्टूबर 2025 में धनधान्य योजना के उद्घाटन कार्यक्रम के लिए संजय को दिल्ली बुलाया गया था। वहां उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का मौका मिला और उन्होंने अपने प्राकृतिक खेती मॉडल की पूरी जानकारी उनके सामने रखी। संजय बताते हैं कि उनके फार्म पर देसी बीज, देसी गाय के गोमूत्र और गोबर से जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कंपोस्ट और सरल कंपोस्ट जैसे जैविक संसाधन खुद ही तैयार होते हैं। इनके इस्तेमाल से बाहर से खाद और दवाइयां खरीदने पर होने वाला खर्च काफी हद तक खत्म हो गया है, जिसका सीधा असर उनकी बचत पर पड़ा है।
घर पर बनते हैं जैविक कीटनाशक
कीट-पतंगों से फसल बचाने के लिए भी संजय बाजार के महंगे कीटनाशकों का रुख नहीं करते। इसके बजाय वे घर पर ही अग्नि अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, दसपर्णी अर्क और पंचगव्य जैसे जैविक घोल तैयार करते हैं। उनका मानना है कि खेत में मौजूद संसाधनों का सही ढंग से इस्तेमाल करने पर न सिर्फ लागत घटती है, बल्कि मिट्टी की सेहत भी लंबे समय तक बनी रहती है। यही वजह है कि उनके खेत की उपज को गुणवत्ता के मामले में भी अलग पहचान मिली है।
एक ही खेत में सब्जी, मसाले और हल्दी की खेती
दुर्गापुरा पिपराली इलाके में स्थित उनके फार्म पर मिर्च, टमाटर, भिंडी, लौकी, करेला, बैंगन, फूलगोभी, ब्रोकली और मूली जैसी सब्जियां मौसम के हिसाब से उगाई जाती हैं। इसके साथ मिश्रित खेती के तहत हल्दी और काली हल्दी की भी पैदावार ली जाती है, जबकि मसाला फसलों में राई और सौंफ शामिल हैं। संजय अपने फार्म पर बीज भी तैयार करते हैं और उन्हें दूसरे किसानों तक भी पहुंचाते हैं, जिससे आसपास के किसानों को भी अच्छी क्वालिटी के देसी बीज मिल पाते हैं।
सब्जी, घी और मशरूम से लाखों की कमाई
संजय हर हफ्ते रविवार और बुधवार को सीकर शहर में सीधे ग्राहकों को अपने खेत की सब्जियां बेचते हैं, जिससे सालाना करीब तीन से चार लाख रुपए की कमाई हो जाती है। उनके पास पांच देसी गायें भी हैं, जिनके दूध से घी तैयार कर वे हर साल तीन से चार लाख रुपए और कमा लेते हैं। इसके अलावा बटन, ओयस्टर और मिल्की मशरूम की खेती से सालाना पांच लाख रुपए से ज्यादा की आमदनी हो रही है। इस तरह अकेले खेती से नहीं, बल्कि सब्जी, डेयरी और मशरूम, तीनों को मिलाकर संजय ने कमाई का एक मजबूत मॉडल खड़ा किया है।
150 किसानों को दे चुके हैं प्रशिक्षण
संजय का खेत अब सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों के लिए ट्रेनिंग सेंटर भी बन चुका है। अब तक वे करीब 150 किसानों को प्राकृतिक खेती की बारीकियां सिखा चुके हैं। राजस्थान के अलावा दूसरे राज्यों से भी किसान उनके इस मॉडल को देखने और समझने के लिए यहां पहुंच रहे हैं, ताकि वे भी अपने खेतों में कम लागत और ज्यादा कमाई का यही तरीका अपना सकें।


















