राजस्थान के टोंक जिले में जमीन की फर्जी रजिस्ट्री का एक मामला अब हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। इस केस में प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता पर अदालत ने कड़े सवाल उठाए हैं और जिला कलेक्टर को सीधे जवाबदेह बनाया है।
जस्टिस रवि चिरानिया की अदालत में सुनवाई
यह पूरा मामला जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ के सामने आया। कोतवाली थाने में दर्ज इस फर्जी रजिस्ट्री केस में आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी। उसी सुनवाई के दौरान कोर्ट को इस मामले की पूरी गंभीरता का अहसास हुआ। अदालत ने देखा कि जिस तरह से यह फर्जीवाड़ा हुआ, उसमें प्रशासन और पुलिस दोनों की भूमिका संदेह के घेरे में है।
टीना डाबी को VC पर पेश होना पड़ा, कड़े सवालों का सामना
19 जून को टोंक जिला कलेक्टर टीना डाबी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए राजस्थान हाईकोर्ट में पेश हुईं। कोर्ट ने उनसे सीधे पूछा कि कोतवाली थाने में दर्ज इस फर्जी रजिस्ट्री मामले में प्रशासन ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं। जिन सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से यह खेल खेला गया, उनके खिलाफ विभागीय या कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कोर्ट ने साफ कर दिया कि कागजी जवाब नहीं चलेगा, बल्कि उठाए गए ठोस कदमों की रिपोर्ट पेश करनी होगी।
कलेक्टर का खुलासा: एक दिन में रजिस्ट्री और म्यूटेशन दोनों
हाईकोर्ट की सख्त पूछताछ के बाद टीना डाबी ने अदालत को बताया कि इस पूरे फर्जीवाड़े में स्थानीय सरपंच, पटवारी और सब-रजिस्ट्रार (उप-पंजीयक) तीनों की भूमिका संदिग्ध है। जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली रही वो यह थी कि इस मामले में जमीन की रजिस्ट्री और उसका नामांतरण (म्यूटेशन) दोनों महज एक ही दिन के भीतर हो गए। आम तौर पर ये दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग समय में पूरी होती हैं और इनमें कई दिनों से लेकर हफ्तों का वक्त लग सकता है। इस असाधारण तेजी को हाईकोर्ट ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और सुनियोजित मिलीभगत का साफ सबूत बताया।
दो जांच रिपोर्टें, दो अलग कहानियां
सुनवाई के दौरान एक और परेशान करने वाला तथ्य सामने आया। एडीएम (बीसलपुर) ने जो प्रशासनिक जांच रिपोर्ट तैयार की और पुलिस ने जो रिपोर्ट दाखिल की, उन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क था। एक ही घटना पर दो सरकारी विभाग बिल्कुल अलग-अलग बातें कह रहे थे। हाईकोर्ट ने इस विरोधाभास पर कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्टीकरण की मांग की। यह साफ था कि कोर्ट इस मामले की तह तक पहुंचना चाहता है।
भू-माफिया की साठगांठ के सबूत पेश
परिवादी रामधन चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रवेंद्र कुंतल ने पैरवी की। उन्होंने हाईकोर्ट के सामने ऐसे दस्तावेज और सबूत पेश किए जो भू-माफियाओं और सरकारी अधिकारियों के बीच की गहरी साठगांठ को उजागर करते हैं। इन सबूतों ने मामले को और गंभीर बना दिया। हाईकोर्ट ने आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है और यह आदेश 22 जून को सुनाया जाएगा। कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद टोंक के राजस्व विभाग और प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है।













