पंजाब के फाजिल्का जिले में स्थित दुत्तरांवाली गांव के एक साधारण पृष्ठभूमि वाले परिवार से निकलकर अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपने नेटवर्क का विस्तार करने वाले लॉरेंस बिश्नोई की कहानी देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में से एक बन चुकी है। शुरुआत में पंजाब और दिल्ली के आसपास तक सीमित रहने वाली उसकी आपराधिक गतिविधियों का दायरा समय के साथ हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों तक फैल गया। इतना ही नहीं, सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार उसने कनाडा तक अपनी पहुंच बनाई है। जेल में बंद रहने के बावजूद विदेश में अपना कारोबार बढ़ाने वाले कई चर्चित भारतीय हस्तियों को धमकी देने के मामलों में उसका नाम सामने आया है। एक संपन्न कृषि पृष्ठभूमि वाले परिवार का लड़का किस तरह अपराध के इस मुकाम तक पहुंचा और छात्र राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क स्थापित करने का यह सफर किस प्रकार आगे बढ़ा, इसे समझना बेहद महत्वपूर्ण है।
फाजिल्का के दुत्तरांवाली गांव से शुरुआती जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
लॉरेंस बिश्नोई का जन्म 12 फरवरी 1993 को पंजाब के फाजिल्का जिले में स्थित दुत्तरांवाली गांव में हुआ था। उसका परिवार आर्थिक रूप से काफी समृद्ध माना जाता था और इलाके में उनकी अपनी एक अलग पहचान थी। उसके पिता पहले हरियाणा पुलिस में बतौर कांस्टेबल सेवाएं दे चुके थे, लेकिन बाद में उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़कर पूर्ण रूप से कृषि कार्य पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया। परिवार के पास अच्छी-खासी कृषि भूमि थी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी। बचपन के दिनों में लॉरेंस का जीवन पूरी तरह से सामान्य और अनुशासित था। परिवार की इच्छा थी कि वह उच्च शिक्षा प्राप्त करे, किसी बड़े प्रशासनिक पद पर पहुंचे या फिर अपना कोई प्रतिष्ठित व्यवसाय शुरू करे। शुरुआती दिनों में वह पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद की गतिविधियों में भी काफी रुचि रखता था। उस दौर में गांव के किसी भी व्यक्ति ने यह कल्पना नहीं की थी कि आने वाले समय में उसका नाम देश की तमाम बड़ी जांच एजेंसियों और पुलिस फाइलों में प्रमुखता से दर्ज होगा।
चंडीगढ़ में प्रवेश और डीएवी कॉलेज की छात्र राजनीति
अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद लॉरेंस बिश्नोई उच्च शिक्षा हासिल करने के उद्देश्य से चंडीगढ़ चला गया। वहां उसने डीएवी कॉलेज में दाखिला लिया और इसके बाद वह पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र राजनीतिक माहौल में सक्रिय हो गया। उस समय चंडीगढ़ की छात्र राजनीति काफी आक्रामक और प्रतिस्पर्धी मानी जाती थी। विभिन्न छात्र संगठन चुनाव जीतने और यूनिवर्सिटी कैंपस में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए हर संभव प्रयास करते थे। इन चुनावी लड़ाइयों के दौरान कैंपस में मारपीट और गुटबाजी की घटनाएं होना एक आम बात बन चुकी थी। चंडीगढ़ पहुंचने के बाद लॉरेंस की जीवन शैली में धीरे-धीरे एक बड़ा बदलाव आना शुरू हुआ। शुरुआती दौर में वह केवल छात्र राजनीति तक सीमित था और कॉलेज कैंपस में अपनी पहचान बनाकर चुनाव लड़ने का प्रयास कर रहा था। लेकिन यूनिवर्सिटी के उस माहौल ने उसे जल्द ही एक अलग दिशा में धकेल दिया।
छात्र संघर्षों से अपराध की दुनिया में पहला कदम
पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति लंबे समय से अपने तीखे टकरावों और आक्रामक गुटबाजी के लिए जानी जाती रही है। चुनाव के दिनों में अलग-अलग छात्र गुटों के बीच आपसी रंजिश, झड़पें और हिंसक घटनाएं होना सामान्य बात हो गई थी। यूनिवर्सिटी कैंपस में अपना वर्चस्व कायम करने और प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा बनाने की होड़ में उसने गलत रास्तों का सहारा लेना शुरू कर दिया। यही हिंसक रास्ते उसके लिए अपराध की दुनिया का दरवाजा साबित हुए। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इसी छात्र राजनीति के दौर में उसके खिलाफ पहली बार मारपीट और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराधों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इस पहली एफआईआर के दर्ज होने के बाद लॉरेंस का नाम अपराध की नई-नई घटनाओं से जुड़ता चला गया और उसके खिलाफ एक के बाद एक कई आपराधिक मामले दर्ज होते चले गए।
गोल्डी बराड़ के साथ गठबंधन और अंतरराज्यीय वारदातें
कॉलेज के दिनों में ही लॉरेंस की मुलाकात सतिंदरजीत सिंह उर्फ गोल्डी बराड़ से हुई थी। दोनों के विचार और कार्यशैली आपस में मेल खाने लगे, जिसके चलते बहुत ही कम समय में उनके बीच गहरी दोस्ती हो गई। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ समय बीतने के बाद गोल्डी बराड़ विदेश चला गया, लेकिन उसने वहां से भी अपने नेटवर्क का संचालन जारी रखा। पुलिस का कहना है कि गोल्डी बराड़ के निर्देशों पर ही लॉरेंस ने पंजाब में अपने गैंग का विस्तार करना और नए लोगों को जोड़ना शुरू किया। शुरुआत में उसने गोल्डी बराड़ के इशारे पर पंजाब और उससे सटे पड़ोसी राज्यों में कई आपराधिक वारदातों को अंजाम दिया। देखते ही देखते उसकी आपराधिक गतिविधियों की लंबी सूची पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के पास पहुंच गई। इसके बाद कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने उसे गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया।
जेल परिसर का इस्तेमाल और रिक्रूटमेंट सेंटर की कार्यशैली
सामान्यतः न्याय प्रणाली में जेल का मुख्य उद्देश्य किसी भी अपराधी को सुधारना और उसे समाज की मुख्यधारा में वापस लाना होता है। परंतु लॉरेंस बिश्नोई के मामले में परिस्थितियां बिल्कुल विपरीत नजर आईं। उसने जेल की चारदीवारी को ही अपने गैंग का नया रिक्रूटमेंट सेंटर बना लिया। जेल में निरुद्ध रहने के दौरान उसने वहां बंद अन्य कुख्यात और आदतन अपराधियों से संपर्क साधा और उन्हें अपने साथ जोड़ा। जेल के भीतर रहते हुए ही यह योजनाएं तैयार की जाने लगीं कि गैंग के भीतर किस व्यक्ति की क्या जिम्मेदारी होगी और जेल से रिहा होने के बाद उसे बाहर जाकर किस वारदात को अंजाम देना है। नतीजतन, जब वह जेल से बाहर आया तो उसमें सुधार होने के बजाय वह एक बेहद शातिर और संगठित गैंगस्टर का रूप ले चुका था, जिसका असर जमीन पर तेजी से दिखने लगा।
मॉड्यूलर संरचना और गन के ग्लैमर से नेटवर्क का विस्तार
जेल से बाहर आने के बाद लॉरेंस के नेटवर्क से जुड़े गुर्गों ने विभिन्न प्रकार के अपराधों को अंजाम देना शुरू कर दिया। वहीं दूसरी तरफ उसने अलग-अलग राज्यों के युवाओं को हथियारों के आकर्षण और गन के ग्लैमर का डर दिखाकर अपने गिरोह से जोड़ना शुरू किया। इसमें कुछ लोग ऐसे थे जो पहले से ही आपराधिक गतिविधियों में लिप्त थे, जबकि कई नए युवा भी उसके गैंग में शामिल होते चले गए। धीरे-धीरे उसका यह आपराधिक नेटवर्क पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैल गया। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि उसने किसी एक विशाल गैंग का ढांचा तैयार करने के बजाय छोटे-छोटे स्वतंत्र मॉड्यूल बनाए। हर मॉड्यूल को अलग इलाके में काम करने का जिम्मा दिया गया था। इस रणनीतिक व्यवस्था का फायदा यह मिला कि यदि पुलिस किसी एक मॉड्यूल या व्यक्ति को गिरफ्तार करती थी, तो भी उसका पूरा नेटवर्क ठप नहीं होता था। इसके अलावा जेल के अंदर से ही उसने विदेश में कारोबार फैलाने वाले प्रमुख भारतीय व्यापारियों और हस्तियों को रंगदारी और धमकियां देने का सिलसिला भी जारी रखा।
डिजिटल दौर और सोशल मीडिया का प्रभाव
विगत एक दशक के दौरान आपराधिक गिरोहों के काम करने और अपनी पहचान बनाने के तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां अपराधियों की जानकारी केवल पुलिस फाइलों तक सीमित रहती थी, वहीं अब सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पैठ बनाने की कोशिशें होने लगी हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, कई आपराधिक गिरोहों ने अपना प्रभाव दिखाने और युवाओं को आकर्षित करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया। लॉरेंस बिश्नोई का नाम भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काफी चर्चित होने लगा। उसके नाम पर कई अनौपचारिक और फर्जी अकाउंट्स बनाए गए। हालांकि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां समय-समय पर ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करती रही हैं, लेकिन इसके माध्यम से हुए प्रचार का असर यह हुआ कि कई राज्यों के छोटे-मोटे स्थानीय अपराधी भी उसके नेटवर्क से जुड़ने के लिए आकर्षित हुए।


















