राजस्थान के उदयपुर स्थित सेक्टर-11 के आदिनाथ भवन में जैन समुदाय की ओर से एक विशेष धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रम संपन्न हुआ, जहाँ लगभग 1000 बच्चों और युवाओं ने एक साथ उपनयन संस्कार ग्रहण किया। इस सामूहिक आयोजन का मुख्य ध्येय नई पीढ़ी को धार्मिक नियमों के साथ जोड़ते हुए उनके भीतर अनुशासन, आत्मज्ञान और उच्च नैतिक मूल्यों का संचार करना रहा। कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा मुनि आदित्य सागर महाराज के सान्निध्य में तय की गई, जिन्होंने उपस्थित बच्चों और युवाओं को जीवन जीने की सही दिशा और कठिन परिस्थितियों में सकारात्मक सोच बनाए रखने का मार्गदर्शन दिया।
मंत्रोच्चार और अभिषेक के साथ अनुष्ठान का शुभारंभ
इस वृहद अनुष्ठान का आयोजन आदिनाथ दिगंबर जैन चैरिटेबल ट्रस्ट तथा विशुद्ध वर्षायोग समिति के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। सुबह के सत्र की शुरुआत वैदिक एवं जैन मंत्रोच्चार की गूंज के साथ हुई। मुनि आदित्य सागर महाराज की पावन उपस्थिति में सर्वप्रथम शांतिधारा और भगवान का अभिषेक संपन्न कराया गया। इसके उपरांत निर्धारित धार्मिक विधान के अनुसार सभी बच्चों और युवाओं की उपनयन संस्कार विधि पूरी की गई। इस पावन अवसर के साक्षी बनने के लिए उदयपुर शहर के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण एवं उपनगरीय इलाकों से भी समाजजन बड़ी संख्या में आदिनाथ भवन पहुंचे।
माता-पिता का चरण वंदन और पांच पावन संकल्प
संस्कार विधि के दौरान उपस्थित बच्चों और युवाओं ने अपने माता-पिता के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लिया और जीवनभर उनके दिखाए आदर्श मार्ग पर चलने की प्रतिबद्धता जताई। इसके साथ ही जीवन को व्यसनमुक्त और मर्यादित रखने के उद्देश्य से सभी प्रतिभागियों ने पांच प्रमुख संकल्प ग्रहण किए। इन संकल्पों में मांसाहार और हर तरह के तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना, धूम्रपान अथवा किसी भी प्रकार के नशे से पूरी तरह दूर रहना, माता-पिता की आज्ञा का पालन और उनका आदर करना, प्रतिदिन मंदिर जाकर देव दर्शन का नियम निभाना तथा सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियों में निःस्वार्थ सेवा भाव से सक्रिय भागीदारी निभाना शामिल रहा।
उम्मीद की ताकत पर मुनि आदित्य सागर महाराज का प्रवचन
सभा को संबोधित करते हुए मुनि आदित्य सागर महाराज ने मानव जीवन में उम्मीद और संभावनाओं के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा, "जैसे शरीर को जीवित रहने के लिए सांस की जरूरत होती है, वैसे ही जीवन को सार्थक बनाने के लिए उम्मीद और संभावनाओं का बने रहना जरूरी है." उन्होंने स्पष्ट किया कि संकट की घड़ी चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो, मनुष्य को कभी अपना धैर्य और आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। यदि किसी प्रयास में पहली बार सफलता हाथ न लगे, तो अगली कोशिश में सफलता की पूरी संभावना जीवित रहती है, और यही दृढ़ विश्वास व्यक्ति को आगे बढ़ने की निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है।
जनेऊ धारण से आगे बढ़कर जीवन निर्माण की पहल
चातुर्मास कमेटी के अध्यक्ष अशोक शाह ने कार्यक्रम की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि उपनयन संस्कार को केवल पारंपरिक रूप से जनेऊ पहनने तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसका वास्तविक लक्ष्य अत्यंत व्यापक है। इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य युवा पीढ़ी को गलत आदतों और भटकाव से बचाकर उन्हें चरित्रवान और संस्कारी नागरिक बनाना है। वहीं आदिनाथ दिगंबर जैन चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष पारस चित्तौड़ा ने बताया कि कार्यक्रम में शामिल बच्चों को आत्मज्ञान, धर्म, परिवार के प्रति आदर और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक किया गया। इस तरह यह पूरा समागम एक पारंपरिक अनुष्ठान के साथ-साथ बच्चों के सकारात्मक व्यक्तित्व विकास का सशक्त माध्यम बना।























