जोधपुर की खेल प्रतिभाओं ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर देश का मान बढ़ाया है। स्थानीय निवासी पूजा राठौड़ ने स्पेन के बार्सिलोना में आयोजित प्रतिष्ठित IHF व्हीलचेयर हैंडबॉल विश्व चैंपियनशिप में भारत की पहली महिला रेफरी बनने का गौरव हासिल किया है। खेल के प्रति उनके समर्पण और कड़े संघर्ष ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है, जहां उन्होंने दुनिया भर के छह महाद्वीपों से जुटी टीमों के बीच रेफरी और टेक्निकल डेलीगेट के रूप में अपनी अहम जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया है।
शुरुआती सफर और शिक्षा का दौर
खेलकूद से उनका नाता बचपन में ही उनके पिता की प्रेरणा से जुड़ गया था। उन्होंने स्कूल के दिनों से लेकर यूनिवर्सिटी और नेशनल लेवल तक हैंडबॉल प्रतियोगिताओं में सक्रिय रूप से भाग लिया। इसके बाद उन्होंने खेल के तकनीकी पहलुओं को समझने के लिए डिप्लोमा इन स्पोर्ट्स कोचिंग की डिग्री हासिल की। केवल 23 साल की कम उम्र में उन्होंने शिक्षा विभाग के अंतर्गत सरकारी नौकरी प्राप्त कर ली थी, लेकिन उन्होंने अपनी खेल यात्रा को कभी नहीं रोका। वर्तमान समय में वह एमजीजीएस बीजेएस में वरिष्ठ शारीरिक शिक्षिका के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। इस दौरान उन्हें अपने प्रशिक्षकों के साथ-साथ राजस्थान हैंडबॉल एसोसिएशन, हैंडबॉल एसोसिएशन इंडिया और व्हीलचेयर हैंडबॉल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का पूरा सहयोग मिला, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
कड़ी परीक्षा और परिवार का संबल
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेफरी बनने की यह राह बिल्कुल आसान नहीं थी। आधिकारिक नामांकन के बाद उन्हें कई कठिन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा, जिसमें मुख्य रूप से फिजिकल टेस्ट और रिटन टेस्ट शामिल थे। वह अपनी इस बड़ी सफलता का श्रेय अपनी व्यक्तिगत मेहनत के साथ-साथ अपने पिता और ससुराल पक्ष को देती हैं। उनका मानना है कि यदि उन्हें अपने परिवार का मजबूत साथ न मिलता, तो इस मुकाम तक पहुंचना बेहद कठिन होता। उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि उनके ससुराल के लोगों ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और कभी भी किसी तरह की रोक-टोक नहीं लगाई। इसी पारिवारिक समर्थन ने उन्हें अपने पेशेवर कर्तव्यों और खेल के प्रति जुनून के बीच संतुलन बनाए रखने की अद्भुत शक्ति दी है।
निष्पक्षता को माना सबसे बड़ा धर्म
एक रेफरी की भूमिका को परिभाषित करते हुए उनका मानना है कि मैदान पर केवल निर्णय देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर खिलाड़ियों के भविष्य और उनके मनोबल से जुड़ा हुआ होता है। खिलाड़ी सालों की कड़ी मेहनत के बाद मैदान में उतरते हैं और उनकी उस मेहनत का परिणाम अक्सर एक रेफरी के फैसले पर निर्भर करता है। यही कारण है कि मैदान पर पूरी तरह निष्पक्ष रहना सबसे अनिवार्य शर्त है। उनका कहना है कि मुकाबले में हार-जीत चाहे जिसकी भी हो, यदि खिलाड़ियों को पूरी तरह निष्पक्ष न्याय मिलता है, तो खेल के प्रति उनका भरोसा और अधिक मजबूत होता है। बार्सिलोना के इस विश्व मंच पर जिम्मेदारी निभाकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि जोधपुर की बेटियां अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ने की पूरी क्षमता रखती हैं।



















