राजस्थान के नागौर जिले में एक ऐसी लोककथा जिंदा है, जो संत परंपरा और राजपूती इतिहास को एक साथ जोड़ती है। इस कहानी की जड़ें गुरु जंभेश्वर महाराज से जुड़ी हैं, जिनका नाम पीपासर, समराथल और मुकाम जैसे स्थानों के साथ पहले से जुड़ा हुआ है, लेकिन नागौर के रोटू और गुलर गांव भी उनकी स्मृतियों के बड़े केंद्र माने जाते हैं। यही कारण है कि श्रद्धालु इन दोनों गांवों को क्रमशः रोटू धाम और गुलर धाम कहकर पुकारते हैं।
मेड़ता के राव दूदा और बालक जंभेश्वर की भेंट
कथा के अनुसार मेड़ता के राव दूदा को किसी वजह से अपना राज्य छोड़कर देश निकाला झेलना पड़ा था। वे बीकानेर की तरफ जा रहे थे और रास्ते में पीपासर के पास रात गुजारने के लिए रुके। अगली सुबह उनकी भेंट बालक रूप में मौजूद गुरु जंभेश्वर से हुई। राव दूदा ने अपनी पीड़ा और राज्य खोने का दुख उनके सामने रख दिया। बालक जंभेश्वर ने उन्हें केर के पेड़ की एक लकड़ी थमाते हुए भरोसा दिलाया कि उनका खोया राज्य उन्हें दोबारा मिलेगा। यही मुलाकात राव दूदा की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।
साधारण लकड़ी कैसे बनी सप्तधातु का खांडा
राव दूदा को शुरुआत में केर की मामूली लकड़ी पर भरोसा नहीं हुआ और मन में शंका उठी। तभी गुरु जंभेश्वर ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति दिखाते हुए उसी लकड़ी को सप्तधातु से बनी तलवार यानी खांडे में बदल दिया, हालांकि उसकी मूठ लकड़ी की ही रहने दी। हाथ में खांडा आते ही राव दूदा का डर आस्था में बदल गया। गुरु ने उन्हें मूण्डवा के लाखोलाव तालाब के नजदीक डेरा डालने और वहां जमीन खोदने का निर्देश दिया। लोक मान्यता कहती है कि इसके बाद राव दूदा को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया।
तीसरी पीढ़ी में हुई चूक और खांडे का दो टुकड़ों में बंटना
कहानी में सबसे नाटकीय मोड़ राव दूदा की तीसरी पीढ़ी में राव जगन्नाथ के साथ आता है। 17वीं शताब्दी में राव जगन्नाथ गुलर गांव में एक बारात में शामिल होने पहुंचे थे। वहां किसी ने ताना कसते हुए कह दिया कि मेड़तियों की सत्ता असल में गुरु जंभेश्वर के दिए खांडे के भरोसे टिकी हुई है, उनकी अपनी ताकत से नहीं। भीड़ के उकसावे में आकर राव जगन्नाथ ने उसी खांडे से एक बकरे पर वार कर दिया। एक निर्दोष जानवर पर चलाया गया यह वार भारी पड़ा, खांडे की मूठ राव के हाथ में ही रह गई जबकि तलवार का बाकी हिस्सा उछलकर दूर आसोजा की डूंगरी नाम की पहाड़ी पर जा गिरा।
संत केसोजी गोदारा और खांडे की रोटू तक की यात्रा
लोक मान्यता के मुताबिक खांडा डेगाना के पास स्थित आसोजा की डूंगरी तक जा पहुंचा, जबकि उसकी मूठ गुलर में ही छूट गई। बिश्नोई समाज में संत और साहित्यकार के रूप में पहचाने जाने वाले संत केसोजी गोदारा को कहा जाता है कि सपने में खुद गुरु जंभेश्वर का आदेश मिला कि आसोजा की डूंगरी पड़ी उस खांडे को उठाकर रोटू में सुरक्षित रख दिया जाए। इसी आदेश का पालन करते हुए संत केसोजी खांडे को रोटू ले आए। तभी से आज तक रोटू में श्रद्धालुओं को यह खांडा दर्शन के लिए दिखाया जाता है।
अक्षय तृतीया की एक और कथा, पत्थर पर उभरे चरण चिह्न
रोटू की पहचान सिर्फ खांडे की कहानी तक सीमित नहीं है। मान्यता है कि विक्रम संवत 1572 में बैशाख सुदी तीज यानी अक्षय तृतीया के मौके पर गुरु जंभेश्वर भगवान अपनी भक्तिनी उमा बाई का मायरा भरने खुद रोटू पहुंचे थे। कहा जाता है कि उमाबाई के घर के सामने वे रथ से नीचे उतरे और जैसे ही उन्होंने एक पत्थर की शिला पर पैर रखा, वह शिला पिघल गई। इस तरह पत्थर पर भगवान के चरण चिह्न हमेशा के लिए अंकित हो गए, जो आज भी वहां बने मंदिर में श्रद्धा का सबसे बड़ा केंद्र बने हुए हैं।
आज भी कायम है रोटू और गुलर की आस्था
आज रोटू और गुलर सिर्फ नागौर जिले के दो साधारण गांव नहीं रह गए, बल्कि ये गुरु जंभेश्वर की स्मृतियों और बिश्नोई समाज की गहरी आस्था के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। रोटू में खांडे की पूजा और दर्शन की परंपरा बिना रुके आज भी चल रही है, जबकि गुलर में खांडे की मूठ मंदिर में सुरक्षित रखी बताई जाती है। एक साधारण केर की लकड़ी से शुरू हुई यह कथा सदियों बाद भी इतिहास, लोकविश्वास और गुरु जंभेश्वर की भक्ति को एक ही धागे में पिरोए हुए है।


















