हिंदू धर्म में शक्ति की उपासना के लिए समर्पित नवरात्रि का पर्व सबसे बड़े और महत्वपूर्ण त्योहारों में शुमार किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष अवधि में जगत जननी मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधिवत आराधना करने से साधक के सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नवरात्रि का यह पावन पर्व पूरे देश में क्षेत्रीय मान्यताओं और अलग-अलग परंपराओं के अनुसार हर्षोल्लास से मनाया जाता है। हालांकि, बहुत से लोग नवरात्रि और दुर्गा पूजा को एक ही मान लेते हैं, जबकि वास्तविकता में दोनों के बीच कई बुनियादी अंतर मौजूद हैं। दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और त्रिपुरा समेत पूर्वी भारत के राज्यों में अत्यंत भक्तिभाव और उत्साह के साथ किया जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इन दोनों उत्सवों में क्या भिन्नता है।
शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा की समय-सारणी
पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि का यह उत्सव आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होकर नवमी तिथि तक यानी पूरे नौ दिनों तक निरंतर चलता है। इसके अगले दिन यानी दशमी तिथि को विजयादशमी या दशहरा मनाया जाता है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर को हुई है और इसका समापन 19 अक्टूबर 2026 को तय किया गया है। दूसरी ओर, दुर्गा पूजा का मुख्य अनुष्ठान षष्ठी तिथि से शुरू होकर विजयादशमी तक यानी मुख्य रूप से पांच दिनों की अवधि का होता है। हालांकि, दुर्गा पूजा से जुड़ी तैयारियों और उत्सव का माहौल महालया के पावन अवसर से ही प्रारंभ हो जाता है।
अनुष्ठान और पूजा पद्धति का स्वरूप
भले ही नवरात्रि और दुर्गा पूजा एक ही समय अवधि के आसपास पड़ती हैं, लेकिन दोनों को मनाने के तौर-तरीके और उद्देश्य में भिन्नता है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में मां दुर्गा की नौ विभिन्न शक्तियों की नौ अलग-अलग रूपों में उपासना की जाती है। इसके विपरीत, दुर्गा पूजा का पूरा पर्व माता दुर्गा के महिषासुरमर्दिनी रूप की आराधना और पृथ्वी पर उनके आगमन की पौराणिक परंपरा से जुड़ा होता है। दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की विशाल और बेहद आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, और गली-मोहल्लों से लेकर बड़े परिसरों तक भव्य पूजा पंडाल सजाए जाते हैं। हालांकि, वैचारिक रूप से दोनों ही पावन पर्व शक्ति की सर्वोच्च उपासना और अधर्म तथा बुराई पर अच्छाई की विजय का शाश्वत संदेश देते हैं।
नवरात्रि और दुर्गा पूजा की विशेषताएं
नवरात्रि के नौ दिनों के भीतर साधक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों यानी शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक के रूपों की नौ दिनों तक निरंतर पूजा-अर्चना करते हैं, जो प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक चलती है। वहीं, दुर्गा पूजा के मुख्य चरण में महिषासुरमर्दिनी रूप की भव्य और सुंदर प्रतिमा स्थापित की जाती है, जिसमें माता दुर्गा के साथ भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय, माता लक्ष्मी और मां सरस्वती भी सहर्ष विराजमान रहती हैं। बंगाल की पारंपरिक लोक संस्कृति के अनुसार, षष्ठी के दिन देवी का बोधन और आमंत्रण किया जाता है, और इसी पवित्र दिन से दुर्गा पूजा का मुख्य चरण आधिकारिक रूप से आरंभ होता है।
दुर्गा पूजा कैलेंडर 2026 की मुख्य तिथियां
- 16 अक्टूबर 2026: षष्ठी पूजा, बिल्व निमंत्रण, कल्पारंभ अकाल बोधन, आमंत्रण और अधिवास के साथ उत्सव का श्रीगणेश होता है।
- 17 अक्टूबर 2026: सप्तमी पूजा के अंतर्गत नवपत्रिका पूजा और कोलाबोऊ पूजा का विधान निभाया जाता है।
- 19 अक्टूबर 2026: इस दिन अष्टमी पूजा के साथ-साथ विशेष कुमारी पूजा और संधि पूजा का आयोजन किया जाता है।
- 20 अक्टूबर 2026: नवमी पूजा के पावन अवसर पर बंगाल महा नवमी और दुर्गा बलिदान की रस्में पूरी की जाती हैं।
- 21 अक्टूबर 2026: इस दिन बंगाल विजयादशमी, पारंपरिक बंगाल दुर्गा विसर्जन और सुप्रसिद्ध सिंदूर उत्सव मनाया जाता है।
























