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शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के 108 पावन नामों का पाठ खोलेगा सौभाग्य का मार्गधर्म
10 अक्तू॰ 2026, 11:36 pm (34 मिनट पहले)· 0

शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के 108 पावन नामों का पाठ खोलेगा सौभाग्य का मार्ग

11 अक्टूबर 2026 से प्रारंभ हो रही शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के 108 नामों का सच्चे मन से पाठ करने से देवी का विशेष आशीर्वाद और कृपा मिलती है।

आश्विन मास के पावन अवसर पर शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ 11 अक्टूबर 2026 से हो रहा है। इस दौरान नौ दिनों तक श्रद्धालु आदिशक्ति के नौ अलग-अलग रूपों की विधिपूर्वक उपासना करते हैं। घरों में घटस्थापना कर पूरे भक्तिभाव से पूजा अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। पारंपरिक मान्यता है कि यदि कोई भक्त व्यस्त दिनचर्या के चलते लंबा पूजन विधान करने में असमर्थ हो, तो वह मां दुर्गा के 108 दिव्य नामों का स्मरण करके भी संपूर्ण पूजन का पुण्य फल प्राप्त कर सकता है।

दुर्गा नामावली का महत्व और पूजन विधान

धार्मिक परंपराओं के अनुसार देवी के इन 108 नामों का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जीवन की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इन नामों में भगवती के स्वरूप, उनके पराक्रम और ब्रह्मांडीय शक्तियों का सार समाहित है।

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मां दुर्गा के 108 पवित्र स्वरूप और उनके गूढ़ अर्थ

  1. सती: अग्नि में समाकर भी अमर रहने वाली पावन सत्ता।
  2. साध्वी: सदा सकारात्मक और आशावादी दृष्टिकोण रखने वाली।
  3. भवप्रीता: देवाधिदेव महादेव शिव से अगाध प्रेम करने वाली।
  4. भवानी: समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त रहने वाली आदिशक्ति।
  5. भवमोचनी: सांसारिक मोह और बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली माता।
  6. आर्या: पूज्य देवी स्वरूप।
  7. दुर्गा: जिन्हें पराजित करना किसी के लिए संभव न हो, अपराजेय शक्ति।
  8. जया: सदैव विजय प्रदान करने वाली।
  9. आद्य: संपूर्ण सृष्टि के प्रारंभ का मूल सत्य।
  10. त्रिनेत्र: तीन लोचनों वाली भगवती।
  11. शूलधारिणी: हाथ में नुकीला शूल धारण करने वाली।
  12. पिनाकधारिणी: शिवजी का अलौकिक त्रिशूल धारण करने वाली देवी।
  13. चित्रा: अत्यंत नयनाभिराम और मनभावन स्वरूप वाली।
  14. चण्डघण्टा: भीषण गर्जना से घंटे की ध्वनि उत्पन्न करने वाली।
  15. सुधा: अमरता प्रदान करने वाले अमृत की स्वामिनी।
  16. मन: विचार और मनन की मूल चेतना।
  17. बुद्धि: समस्त ज्ञान और सर्वज्ञता का केंद्र।
  18. अहंकारा: स्वाभिमान और गर्व का भाव दर्शाने वाली।
  19. चित्तरूपा: निरंतर विचारमग्न रहने वाली चेतना।
  20. चिता: मृत्यु शय्या का प्रतीक।
  21. चिति: जागृत चेतना और प्राणशक्ति।
  22. सर्वमन्त्रमयी: समस्त अलौकिक मंत्रों का गूढ़ ज्ञान रखने वाली।
  23. सत्ता: सर्वोच्च सत्य स्वरूप, जो सबसे उच्च स्थान पर विद्यमान हैं।
  24. सत्यानंद स्वरूपिणी: अखंड और अनंत आनंद की साक्षात प्रतिमूर्ति।
  25. अनन्ता: जिनकी सीमा और स्वरूप का कहीं कोई अंत नहीं।
  26. भाविनी: सभी को जीवन देने वाली अत्यंत रूपवती शक्ति।
  27. भाव्या: गहन ध्यान और सच्ची भावना के योग्य।
  28. भव्या: भव्यता और कल्याणकारी रूप वाली।
  29. अभव्या: जिनकी भव्यता की तुलना किसी से न की जा सके।
  30. सदागति: निरंतर गतिशीलता और परम मोक्ष प्रदान करने वाली।
  31. शाम्भवी: भगवान शंभू की अर्धांगिनी और शिवप्रिया।
  32. देवमाता: समस्त देवगणों को जन्म देने वाली जननी।
  33. चिन्ता: चिंतन और विचार का स्वरूप।
  34. रत्नप्रिया: दिव्य आभूषणों और रत्नों से स्नेह रखने वाली।
  35. सर्वविद्या: संपूर्ण ज्ञान और विद्याओं का पावन धाम।
  36. दक्षकन्या: प्रजापति दक्ष की सुपुत्री।
  37. दक्षयज्ञविनाशिनी: दक्ष के अहंकारपूर्ण यज्ञ को ध्वस्त करने वाली।
  38. अपर्णा: घोर तप के दौरान सूखे पत्तों का भी त्याग करने वाली।
  39. अनेकवर्णा: अनगिनत रंगों और आभा से सुशोभित।
  40. पाटला: चटक लाल वर्ण धारण करने वाली।
  41. पाटलावती: गुलाब के दिव्य पुष्पों से सुसज्जित।
  42. पट्टाम्बरपरीधाना: सुंदर रेशमी परिधान धारण करने वाली।
  43. कलामंजीरारंजिनी: मधुर ध्वनि वाली पाजेब पहनकर आनंदित रहने वाली।
  44. अमेय: जिसकी सीमाओं को मापा न जा सके।
  45. विक्रमा: अपरंपार शौर्य और पराक्रम की स्वामिनी।
  46. क्रूरा: दुष्ट असुरों के संहार में अत्यंत कठोर।
  47. सुन्दरी: अनुपम और मनमोहक सौंदर्य वाली।
  48. सुरसुन्दरी: देवलोक की सबसे मनोरम देवी।
  49. वनदुर्गा: सघन वनों और अरण्य की अधिष्ठात्री।
  50. मातंगी: मातंग कुल की रक्षा करने वाली देवी।
  51. मातंगमुनिपूजिता: तपस्वी मातंग मुनि द्वारा पूजी जाने वाली।
  52. ब्राह्मी: सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की असीम शक्ति।
  53. माहेश्वरी: संहारकर्ता शिव की सर्वोच्च शक्ति।
  54. इंद्री: देवराज इंद्र की शक्ति स्वरूपा।
  55. कौमारी: शाश्वत किशोरी रूप में विद्यमान।
  56. वैष्णवी: भगवान विष्णु की अपराजेय शक्ति।
  57. चामुण्डा: दैत्य चंड और मुंड का संहार करने वाली।
  58. वाराही: वराह शक्ति पर आरूढ़ होने वाली।
  59. लक्ष्मी: रिद्धि-सिद्धि और सौभाग्य की दात्री।
  60. पुरुषाकृति: पुरुष रूप धारण करने में सक्षम।
  61. विमिलौत्त्कार्शिनी: असीम हर्ष और उल्लास बिखेरने वाली।
  62. ज्ञाना: विशुद्ध ज्ञान से परिपूर्ण।
  63. क्रिया: संसार के प्रत्येक कर्म और कार्य में उपस्थित।
  64. नित्या: जिसका कभी क्षय न हो, शाश्वत।
  65. बुद्धिदा: सद्बुद्धि और विवेक का दान देने वाली।
  66. बहुला: अनेक रूपों में दर्शन देने वाली।
  67. बहुलप्रेमा: सभी प्राणियों से अगाध वात्सल्य रखने वाली।
  68. सर्ववाहनवाहना: सभी सवारियों पर विराजित होने वाली भगवती।
  69. निशुम्भशुम्भहननी: शुंभ और निशुंभ दैत्यों का अंत करने वाली।
  70. महिषासुरमर्दिनि: महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त करने वाली।
  71. मसुकैटभहंत्री: मधु और कैटभ नामक राक्षसों का नाश करने वाली।
  72. चण्डमुण्ड विनाशिनि: चंड-मुंड का संहार करने वाली आदिशक्ति।
  73. सर्वासुरविनाशा: सभी दैत्यों की सत्ता मिटाने वाली।
  74. सर्वदानवघातिनी: संहारक शक्ति से दानवों को परास्त करने वाली।
  75. सर्वशास्त्रमयी: सभी शास्त्रों और गूढ़ सिद्धांतों की ज्ञाता।
  76. सत्या: साक्षात सत्य स्वरूप।
  77. सर्वास्त्रधारिणी: सभी अस्त्रों को धारण करने वाली।
  78. अनेकशस्त्रहस्ता: हाथों में विभिन्न शस्त्र धारण करने वाली।
  79. अनेकास्त्रधारिणी: अगणित दिव्यास्त्रों की स्वामिनी।
  80. कुमारी: निर्मल और सुंदर बालिका।
  81. एककन्या: कन्या रूप में पूजनीय।
  82. कैशोरी: यौवन की दहलीज पर खड़ी किशोरी।
  83. युवती: पूर्ण नारी शक्ति का प्रतीक।
  84. यति: कठोर तपस्या में लीन तपस्विनी।
  85. अप्रौढा: जो कभी वृद्ध न हों, सदा नूतन।
  86. प्रौढा: परिपक्वता और अनुभव की प्रतीक।
  87. वृद्धमाता: शिथिल और वयोवृद्ध मातृ रूप।
  88. बलप्रदा: आत्मबल और शारीरिक शक्ति प्रदान करने वाली।
  89. महोदरी: समूचे ब्रह्मांड को अपने उदर में समेटने वाली।
  90. मुक्तकेशी: खुले और लहराते केशों वाली।
  91. घोररूपा: अत्यंत भयभीत कर देने वाला रौद्र स्वरूप।
  92. महाबला: अतुलनीय शक्ति से संपन्न।
  93. अग्निज्वाला: धधकती अग्नि की प्रखर लपटों जैसी।
  94. रौद्रमुखी: प्रलयंकारी रुद्र जैसा तेजस्वी और भयंकर मुखमंडल।
  95. कालरात्रि: घने अंधकार और काल जैसी कांति वाली।
  96. तपस्विनी: निरंतर साधना में तत्पर रहने वाली।
  97. नारायणी: भगवान नारायण की संहारक ऊर्जा।
  98. भद्रकाली: महाकाली का कल्याणकारी किंतु उग्र रूप।
  99. विष्णुमाया: संपूर्ण जगत को बांधने वाली विष्णु की माया।
  100. जलोडरी: जल और अंतरिक्ष में ब्रह्मांड को धारण करने वाली।
  101. शिवदूती: भगवान शिव को दूत बनाकर भेजने वाली पराशक्ति।
  102. करली: प्रचंड और संहारक शक्ति।
  103. अनन्ता: जिसका कभी विनाश न हो सके।
  104. परमेश्वरी: समस्त देवियों में सर्वप्रथम और सर्वोपरि।
  105. कात्यायनी: महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट देवी।
  106. सावित्री: सूर्यदेव की तेजस्वी पुत्री।
  107. प्रत्यक्षा: प्रत्यक्ष और साक्षात रूप में विद्यमान।
  108. ब्रह्मवादिनी: चराचर जगत के हर कण में वास करने वाली।

नवरात्रि के पावन पर्व पर इन 108 नामों का श्रद्धा से ध्यान करने से मन को शांति मिलती है और जीवन की कठिनाइयां समाप्त होती हैं।

सवाल-जवाब

शारदीय नवरात्रि 2026 कब से शुरू हो रही है?
शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व 11 अक्टूबर 2026 से प्रारंभ हो रहा है।
यदि समय का अभाव हो तो नवरात्रि में कौन सी पूजा करना उत्तम है?
यदि विस्तार से पूजन करने का समय न हो तो मां दुर्गा के 108 नामों का सच्चे मन से जाप करना उत्तम माना जाता है।
मां दुर्गा के 108 नामों के जाप से क्या लाभ मिलता है?
सच्चे मन से इन पावन नामों का स्मरण करने से देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सोया हुआ भाग्य जागृत होता है।
नवरात्रि में किनकी आराधना की जाती है?
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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