उत्तर प्रदेश के बरेली शहर को नाथ नगरी के नाम से भी जाना जाता है। सावन का समय आते ही पूरा इलाका भगवान शिव की भक्ति के रंग में रंग जाता है। इस शहर में कई प्राचीन और प्रसिद्ध शिवालय मौजूद हैं, लेकिन इनमें सबसे विशेष स्थान अलखनाथ मंदिर का माना जाता है। लगभग 900 वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक मंदिर को नाथ संप्रदाय की एक बेहद महत्वपूर्ण पीठ माना जाता है। शिवभक्तों के बीच इस पवित्र स्थल को लेकर गहरी आस्था और अटूट श्रद्धा जुड़ी हुई है।
बाबा अलखिया की तपस्या और मंदिर का गौरवशाली इतिहास
इस ऐतिहासिक स्थल की उत्पत्ति को लेकर कई दिलचस्प कहानियां प्रचलित हैं। वरिष्ठ इतिहासकार डॉ राजेश कुमार शर्मा के अनुसार, करीब नौ शताब्दियों पहले यह पूरा क्षेत्र घने बांस के जंगलों से आच्छादित था। इसी निर्जन और शांत स्थान पर बाबा अलखिया नामक एक महान तपस्वी ने एक विशाल और प्राचीन वटवृक्ष के नीचे बैठकर अत्यंत कठिन तपस्या की थी। उनके नाम पर ही बाद में इस पावन स्थान का नाम अलखनाथ पड़ा। समय बीतने के साथ यह मंदिर नाथ संप्रदाय, नागा संन्यासियों और शैव संप्रदाय की साधना का एक प्रमुख केंद्र बन गया। जब मुगल शासनकाल के दौरान साधु-संतों पर तरह-तरह के अत्याचार किए जा रहे थे, तब कई संन्यासियों ने अपनी रक्षा और सनातन धर्म की गरिमा बनाए रखने के लिए इसी मंदिर परिसर में शरण ली थी। यहां रहकर उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए लंबा संघर्ष भी किया। इसके अलावा, मंदिर के ठीक सामने बने भैरवनाथ मंदिर से जुड़ी भी कई प्राचीन ऐतिहासिक मान्यताएं श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय हैं।
सावन में उमड़ता है आस्था का सैलाब
सावन के पावन महीनों में अलखनाथ मंदिर की रौनक और महत्ता कई गुना अधिक बढ़ जाती है। इस दौरान हरिद्वार और कछला घाट जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों से पवित्र गंगाजल लेकर आने वाले हजारों कांवड़िए यहां पहुंचते हैं। डाक कांवड़ के रूप में आने वाले श्रद्धालुओं के जत्थे भी भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए इसी मंदिर की ओर रुख करते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि सावन के हर सोमवार को मंदिर में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग पर यदि कोई भक्त सच्चे मन से जल या पंचामृत अर्पित करता है, तो भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी करते हैं। शाम के समय जब मंदिर परिसर में डमरू और शंख की मंगल ध्वनि गूंजती है, तो वहां होने वाली भव्य आरती श्रद्धालुओं को एक अलौकिक और दिव्य आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराती है।
मंदिर परिसर के प्रमुख आकर्षण और धरोहरें
मंदिर परिसर में केवल मुख्य शिवलिंग ही नहीं, बल्कि कई अन्य अद्भुत आकर्षण भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। वरिष्ठ इतिहासकार डॉ राजेश कुमार शर्मा बताते हैं कि इस परिसर में रामेश्वरम से लाए गए विशेष पवित्र पत्थर मौजूद हैं, जो पानी पर तैरते हैं। इन पत्थरों को एक जलकुंड में सहेजकर रखा गया है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। इसके साथ ही, परिसर में स्थापित हनुमान जी की विशालकाय 51 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा भी लोगों की श्रद्धा का केंद्र है। मुख्य मंदिर के अलावा यहां भगवान विष्णु, भगवान श्रीकृष्ण, देवी दुर्गा, नवग्रह और शनिदेव को समर्पित भव्य मंदिर भी बने हुए हैं। बाबा अलखिया की तपोभूमि माना जाने वाला वह प्राचीन वटवृक्ष आज भी पूरी शान से खड़ा है, जिसे श्रद्धालु बेहद आदर और श्रद्धा भाव से नमन करते हैं।



















