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बोकारो के इस मंदिर में मूर्ति नहीं, फिर भी सदियों से यहां जमीन में पूजे जाते हैं खुटा बाबाधर्म
21 जुल॰ 2026, 11:08 pm (47 दिन पहले)· 1

बोकारो के इस मंदिर में मूर्ति नहीं, फिर भी सदियों से यहां जमीन में पूजे जाते हैं खुटा बाबा

बोकारो के पेटरवार प्रखंड स्थित ओरदाना गांव के खुटा बाबा मंदिर में सौ साल से आदिवासी रीति से पूजा होती है, यहां न मूर्ति है और न महिलाओं को प्रवेश की इजाजत है।

झारखंड के बोकारो जिले में एक ऐसा मंदिर है, जहां न मूर्ति है, न कोई भव्य इमारत, फिर भी यहां हर दिन दूर-दूर से लोग अपनी मुराद लेकर पहुंचते हैं। पेटरवार प्रखंड के ओरदाना गांव में बना यह खुटा बाबा मंदिर 100 साल से भी पुराना बताया जाता है और बोकारो, रामगढ़ समेत आसपास के इलाकों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।

जमीन में बसते हैं भगवान, आदिवासी रीति से होती है पूजा

यहां आम मंदिरों की तरह कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। पूजा पाहन यानी आदिवासी पुजारी परंपरागत आदिवासी विधि-विधान से सीधे जमीन में विराजमान देवता की पूजा करते हैं। पूजा सामग्री में अरवा चावल, सिंदूर, नारियल और धूना के साथ देसी दारू भी चढ़ाई जाती है। हर दिन सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक ही पूजा-अर्चना का समय तय है, इसी दौरान श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर यहां पहुंचते हैं।

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बलि की पुरानी परंपरा, प्रसाद बाहर ले जाना वर्जित

मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। मन्नत मांगते समय श्रद्धालु काली या लाल मुर्गी अर्पित करते हैं, जबकि मुराद पूरी होने पर सफेद बकरे या सफेद मुर्गी की बलि दी जाती है। मंदिर कमेटी इसके लिए मामूली शुल्क तय करती है, मुर्गी के लिए ₹11 और बकरे के लिए ₹21। बलि के बाद बना प्रसाद परिसर के भीतर ही खाना होता है, इसे बाहर ले जाने की इजाजत नहीं है।

पांच पीढ़ियों से चली आ रही आस्था

मंदिर के पाहन अर्जुन के मुताबिक यहां पांच पीढ़ियों और 100 साल से ज्यादा समय से आदिवासी समाज के पुरखे पूजा करते आ रहे हैं। शुरुआत में यह आस्था सिर्फ ओरदाना गांव तक सीमित थी, लेकिन जिनकी मुरादें पूरी हुईं, उन्होंने अपने रिश्तेदारों और परिचितों को इसके बारे में बताया और धीरे-धीरे खुटा बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। आज बोकारो और रामगढ़ के अलावा झारखंड और बंगाल के दूरदराज इलाकों से भी लोग यहां पहुंचते हैं।

महिलाओं का प्रवेश वर्जित

खुटा बाबा मंदिर से जुड़ी एक और खास परंपरा यह है कि यहां वर्षों से महिलाओं के भीतर जाने पर रोक है। महिला श्रद्धालु मंदिर परिसर के बाहर से ही हाथ जोड़कर आशीर्वाद मांगती हैं। कुछ श्रद्धालुओं की मान्यता है कि अगर कोई महिला अंदर प्रवेश कर जाए, तो उसके साथ कोई अनहोनी हो सकती है या वह मानसिक रूप से बीमार पड़ सकती है।

40 किलोमीटर दूर से पहुंचे श्रद्धालु

पूजा करने आए नितेश बेदिया ने बताया, मैंने अपने गांव के लोगों से खुटा बाबा की महिमा सुनी थी। वह लुदरु बेड़ा गांव से करीब 40 किलोमीटर का सफर तय कर यहां पहुंचे हैं। उनकी तरह हर दिन कई श्रद्धालु सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करके ही खुटा बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच जाते हैं।

सवाल-जवाब

खुटा बाबा मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर झारखंड के बोकारो जिले के पेटरवार प्रखंड स्थित ओरदाना गांव में है।
यह मंदिर कितना पुराना है?
मंदिर 100 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है और यहां पांच पीढ़ियों से पूजा हो रही है।
मंदिर में पूजा कौन करता है?
पूजा पाहन नाम के आदिवासी पुजारी पूरी तरह आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार जमीन में विराजमान देवता की पूजा करते हैं।
मंदिर में क्या-क्या चढ़ाया जाता है?
अरवा चावल, सिंदूर, नारियल, धूना और देसी दारू चढ़ाई जाती है, साथ ही मन्नत मांगने पर काली या लाल मुर्गी और मन्नत पूरी होने पर सफेद बकरा या सफेद मुर्गी की बलि दी जाती है।
बलि के लिए कितना शुल्क लगता है?
मंदिर कमेटी मुर्गी के लिए ₹11 और बकरे के लिए ₹21 शुल्क लेती है।
मंदिर में पूजा का समय क्या है?
यहां रोज सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक ही पूजा होती है।
क्या महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं?
नहीं, वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार महिलाओं का मंदिर परिसर में प्रवेश वर्जित है, वे बाहर से ही आशीर्वाद लेती हैं।
अब यहां कहां-कहां से श्रद्धालु आते हैं?
शुरुआत में यह आस्था सिर्फ ओरदाना गांव तक सीमित थी, लेकिन अब बोकारो, रामगढ़ के अलावा झारखंड और बंगाल के दूरदराज इलाकों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
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