झारखंड के बोकारो जिले में एक ऐसा मंदिर है, जहां न मूर्ति है, न कोई भव्य इमारत, फिर भी यहां हर दिन दूर-दूर से लोग अपनी मुराद लेकर पहुंचते हैं। पेटरवार प्रखंड के ओरदाना गांव में बना यह खुटा बाबा मंदिर 100 साल से भी पुराना बताया जाता है और बोकारो, रामगढ़ समेत आसपास के इलाकों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।
जमीन में बसते हैं भगवान, आदिवासी रीति से होती है पूजा
यहां आम मंदिरों की तरह कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। पूजा पाहन यानी आदिवासी पुजारी परंपरागत आदिवासी विधि-विधान से सीधे जमीन में विराजमान देवता की पूजा करते हैं। पूजा सामग्री में अरवा चावल, सिंदूर, नारियल और धूना के साथ देसी दारू भी चढ़ाई जाती है। हर दिन सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक ही पूजा-अर्चना का समय तय है, इसी दौरान श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर यहां पहुंचते हैं।
बलि की पुरानी परंपरा, प्रसाद बाहर ले जाना वर्जित
मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। मन्नत मांगते समय श्रद्धालु काली या लाल मुर्गी अर्पित करते हैं, जबकि मुराद पूरी होने पर सफेद बकरे या सफेद मुर्गी की बलि दी जाती है। मंदिर कमेटी इसके लिए मामूली शुल्क तय करती है, मुर्गी के लिए ₹11 और बकरे के लिए ₹21। बलि के बाद बना प्रसाद परिसर के भीतर ही खाना होता है, इसे बाहर ले जाने की इजाजत नहीं है।
पांच पीढ़ियों से चली आ रही आस्था
मंदिर के पाहन अर्जुन के मुताबिक यहां पांच पीढ़ियों और 100 साल से ज्यादा समय से आदिवासी समाज के पुरखे पूजा करते आ रहे हैं। शुरुआत में यह आस्था सिर्फ ओरदाना गांव तक सीमित थी, लेकिन जिनकी मुरादें पूरी हुईं, उन्होंने अपने रिश्तेदारों और परिचितों को इसके बारे में बताया और धीरे-धीरे खुटा बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। आज बोकारो और रामगढ़ के अलावा झारखंड और बंगाल के दूरदराज इलाकों से भी लोग यहां पहुंचते हैं।
महिलाओं का प्रवेश वर्जित
खुटा बाबा मंदिर से जुड़ी एक और खास परंपरा यह है कि यहां वर्षों से महिलाओं के भीतर जाने पर रोक है। महिला श्रद्धालु मंदिर परिसर के बाहर से ही हाथ जोड़कर आशीर्वाद मांगती हैं। कुछ श्रद्धालुओं की मान्यता है कि अगर कोई महिला अंदर प्रवेश कर जाए, तो उसके साथ कोई अनहोनी हो सकती है या वह मानसिक रूप से बीमार पड़ सकती है।
40 किलोमीटर दूर से पहुंचे श्रद्धालु
पूजा करने आए नितेश बेदिया ने बताया, मैंने अपने गांव के लोगों से खुटा बाबा की महिमा सुनी थी। वह लुदरु बेड़ा गांव से करीब 40 किलोमीटर का सफर तय कर यहां पहुंचे हैं। उनकी तरह हर दिन कई श्रद्धालु सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करके ही खुटा बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच जाते हैं।




















