अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर रविवार को एक ऐसी सैन्य बैठक होने जा रही है जो अपनी तरह की पहली बैठक मानी जा रही है। भारत और चीन के सेना अधिकारी ईस्टर्न सेक्टर में पहली बार कोर कमांडर स्तर पर सीधे आमने-सामने बैठेंगे। यह अहम बैठक वाचा-दमाई बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर प्रस्तावित है और सीमा पर बने मौजूदा हालात को देखते हुए इसे बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
ताकसिंग में तनाव के बाद बनी बातचीत की जरूरत
दरअसल पिछले कुछ दिनों से अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताकसिंग इलाके से भारत और चीन की सेनाओं के बीच तनातनी की खबरें सामने आ रही थीं। इसी घटनाक्रम ने दोनों देशों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को सीधे मेज पर लाने की जमीन तैयार की। मकसद साफ है, सीमा पर मौजूदा स्थिति पर खुलकर बात करना और तनाव को आगे बढ़ने से पहले ही थाम लेना। चूंकि ईस्टर्न सेक्टर में इस स्तर की कोर कमांडर वार्ता अब तक कभी नहीं हुई थी, इसलिए सैन्य और कूटनीतिक हलकों में इस बैठक पर खास नजर बनी हुई है।
भारतीय पक्ष की कमान लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया के हाथ
भारतीय सेना की ओर से इस बातचीत का नेतृत्व लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया करेंगे। वह सेना की 3 Corps, यानी स्पीयर कॉर्प्स के कमांडर हैं। इस कोर का मुख्यालय नागालैंड के रंगापहार में स्थित है और यही कोर अरुणाचल प्रदेश के मध्य व पूर्वी हिस्सों में LAC से जुड़े ऑपरेशनल क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालती है। यानी ताकसिंग जैसा संवेदनशील इलाका भी इसी कोर के कार्यक्षेत्र में आता है, यही वजह है कि बातचीत की अगुआई इसी कोर के कमांडर को सौंपी गई है।
पूर्व सीडीएस अनिल चौहान की चेतावनी भरी टिप्पणी
ठीक इसी दौर में पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान का एक बयान भी सामने आया है, जिसमें उन्होंने चीन को भारत के लिए एक दीर्घकालिक और व्यापक चुनौती करार दिया। उनके मुताबिक भारत और चीन के बीच सीमा विवाद अब तक पूरी तरह सुलझा नहीं है और वास्तविक नियंत्रण रेखा की सही स्थिति को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच पूरी पारस्परिक सहमति नहीं बन पाई है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि भारत-चीन रिश्तों को सिर्फ सीमा विवाद के चश्मे से देखना सही नहीं होगा।
जनरल चौहान ने यह बात शनिवार को तीन मूर्ति भवन परिसर में आयोजित एक व्याख्यान में कही, जिसका विषय था 'भारत की सुरक्षा के लिए खतरे और चुनौतियां'। उन्होंने कहा कि चीन, भारत के सामने एक अलग तरह की और लंबे समय तक बनी रहने वाली चुनौती पेश करता है। उनका तर्क था कि चीन और भारत दोनों एशिया की बड़ी ताकतें हैं, दोनों की अर्थव्यवस्था बड़ी है और दोनों प्राचीन सभ्यताओं वाले देश हैं, इसलिए दोनों के आपसी रिश्तों को केवल सीमा विवाद तक समेट कर देखना ठीक नहीं होगा।
सहयोग भी, प्रतिस्पर्धा भी, इसलिए बातचीत जरूरी
पूर्व सीडीएस ने आगे कहा कि भारत और चीन एक-दूसरे के साथ सहयोग भी करते हैं और प्रतिस्पर्धा भी। क्षेत्रीय और वैश्विक व्यवस्था को लेकर दोनों देशों के नजरिए में साफ फर्क है, इसलिए चीन के साथ संवाद और संपर्क का सिलसिला बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार सतर्कता बरतनी होगी, भरोसेमंद सैन्य क्षमताएं तैयार रखनी होंगी और जो भी समझौते हों वे बिल्कुल स्पष्ट हों तथा उनका लगातार और ईमानदारी से पालन हो। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में कोशिशें जारी रहनी चाहिए, लेकिन साथ ही दोनों देशों के बीच बातचीत की प्रक्रिया को भी रुकना नहीं चाहिए।
इस बैठक के संभावित मायने
सैन्य जानकारों के मुताबिक ईस्टर्न सेक्टर में कोर कमांडर स्तर की यह पहली वार्ता इसलिए भी अहम है क्योंकि अब तक इस तरह की उच्चस्तरीय बातचीत ज्यादातर दूसरे सेक्टरों में ही होती रही है। ताकसिंग इलाके में हाल की तनातनी के बाद दोनों पक्षों का सीधे मेज पर आना यह संकेत देता है कि फिलहाल दोनों देश विवाद को बढ़ने देने के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाने को तरजीह दे रहे हैं। वाचा-दमाई बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर होने वाली इस बैठक में सीमा पर गश्त, सैनिकों की तैनाती और आपसी भरोसा बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, हालांकि इसका पूरा एजेंडा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।


















