उत्तर प्रदेश के गोंडा शहर में बना मां विंध्यवासिनी मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है। रोजाना यहां भक्तों की भीड़ लगती है, और नवरात्र जैसे खास मौकों पर मंदिर परिसर से बाहर तक दर्शन के लिए लंबी कतारें देखी जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग सुबह-सुबह ही मंदिर पहुंचकर मां का आशीर्वाद लेना पसंद करते हैं। इस मंदिर के पीछे की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प और अनोखी है, जिसे सुनकर लोग आज भी हैरान रह जाते हैं।
हर हफ्ते विंध्याचल जाकर करते थे दर्शन
मंदिर के महंत शशि कुमार के मुताबिक, बरसों पहले गोंडा में रहने वाला एक भक्त मां विंध्यवासिनी का बड़ा उपासक था। शुरुआत में वह हर महीने विंध्याचल जाकर माता के दर्शन किया करता था। धीरे-धीरे उसकी श्रद्धा इतनी गहरी हो गई कि वह महीने में एक बार की जगह हर हफ्ते विंध्याचल पहुंचने लगा। मगर शादी के बाद हालात बदल गए और बार-बार विंध्याचल जाना उसके लिए मुश्किल हो गया।
नीम के पेड़ के नीचे मिला मां का चमत्कारी स्वरूप
महंत शशि कुमार बताते हैं कि इसी उलझन में भक्त ने मां विंध्यवासिनी से गुहार लगाई कि अगर वह नियमित दर्शन के लिए नहीं जा पा रहा है, तो माता खुद उसके घर के आसपास विराजमान हो जाएं। मान्यता के अनुसार, कुछ दिन बाद उसके घर के नजदीक एक नीम के पेड़ के नीचे एक कुत्ता जमीन खोदने लगा। जब आसपास के लोगों ने वहां खुदाई की, तो मिट्टी के भीतर से चने के दाने जितना छोटा मां का दिव्य स्वरूप निकला। यह अनोखा नजारा देखकर वहां मौजूद हर कोई चकित रह गया, और इसे माता की असीम कृपा माना गया।
1995 में बना मंदिर, अब 1 से 2 फीट का हुआ स्वरूप
इस घटना के बाद उस जगह की चर्चा आसपास के इलाकों में तेजी से फैलने लगी और श्रद्धालु धीरे-धीरे बड़ी संख्या में वहां पहुंचने लगे। बढ़ती आस्था और भीड़ को देखते हुए साल 1995 में उसी स्थान पर विधिवत मंदिर का निर्माण करवाया गया। बताया जाता है कि तब से लेकर अब तक मां का यह दिव्य स्वरूप लगातार आकार में बढ़ता रहा है, और शुरुआत में चने के दाने जितना दिखने वाला यह स्वरूप आज करीब 1 से 2 फीट तक की ऊंचाई पा चुका है। यही असाधारण बदलाव इस बात की वजह है कि गोंडा के सबसे अनोखे और चमत्कारी धार्मिक स्थलों में इस मंदिर की गिनती होती है।
सच्चे मन से मांगी मुराद होती है पूरी, ऐसी है मान्यता
आज भी दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए इस मंदिर में पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों और भक्तों का पक्का विश्वास है कि जो कोई भी सच्चे दिल से माता की पूजा करके अपनी मनोकामना बताता है, माता उसकी इच्छा जरूर पूरी करती हैं। यही गहरी और अटूट आस्था इस मंदिर को गोंडा की प्रमुख धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा बनाती है।



















