पारंपरिक खेती छोड़ फरीदाबाद के ललित मोहन ने लगाया कीनू का बाग, अब हर सीजन कर रहे लाखों की कमाईमहाभारत काल से जुड़ा है फरीदाबाद का तिलपत गांव, पांडवों की पांच गांवों की मांग और सूरदास मंदिर का गहरा इतिहासमुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना में चित्रकूट का कमाल, 1853 युवाओं को स्वरोजगार देकर बुंदेलखंड में बना नंबर वनसीकर में रबी सीजन से ठीक पहले 7 नए सोलर प्लांट चालू, रोजाना 12 लाख यूनिट सौर ऊर्जा से चमकेगी कृषि बिजली आपूर्तिशाम की चाय के साथ परोसें लखनवी गोल समोसा, जानें आटे और शाही आलू-मटर मसाले की आसान रेसिपीप्रतापगढ़ में मंदसौर रोड के ढाबों और होटलों पर खाद्य सुरक्षा विभाग की सख्त कार्रवाई, कीड़े मकोड़े और सड़ा मांस मिलने से मचा हड़कंपटाटानगर रेलवे स्टेशन पर पार्किंग फीस घटी और ड्रॉपिंग लाइन हुई मुफ्त, देखें नई दरेंआदिलाबाद के जननायक कस्ताला रामकिष्टू की कहानी जिन्होंने निजाम के खिलाफ संघर्ष में बेच दी अपनी संपत्तिभीलवाड़ा की दुर्गा देवी से सीखें पर्युषण पर्व के लिए कच्चे केले की स्वादिष्ट पाव भाजी बनाने की आसान विधिअसम के सोनितपुर में भीषण सड़क हादसा, ट्रक और कार की सीधी टक्कर में 5 लोगों की मौत
चने के दाने से बढ़कर 2 फीट की हुईं मैया, गोंडा के इस मंदिर की अनोखी कहानीधर्म
28 जुल॰ 2026, 7:18 am (46 दिन पहले)· 1

चने के दाने से बढ़कर 2 फीट की हुईं मैया, गोंडा के इस मंदिर की अनोखी कहानी

गोंडा के मां विंध्यवासिनी मंदिर में एक भक्त की प्रार्थना के बाद नीम के पेड़ के नीचे मिला मां का चने के दाने जितना दिव्य स्वरूप अब बढ़कर करीब 1 से 2 फीट का हो चुका है, और साल 1995 में यहां मंदिर बनवाया गया था।

उत्तर प्रदेश के गोंडा शहर में बना मां विंध्यवासिनी मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है। रोजाना यहां भक्तों की भीड़ लगती है, और नवरात्र जैसे खास मौकों पर मंदिर परिसर से बाहर तक दर्शन के लिए लंबी कतारें देखी जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग सुबह-सुबह ही मंदिर पहुंचकर मां का आशीर्वाद लेना पसंद करते हैं। इस मंदिर के पीछे की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प और अनोखी है, जिसे सुनकर लोग आज भी हैरान रह जाते हैं।

हर हफ्ते विंध्याचल जाकर करते थे दर्शन

मंदिर के महंत शशि कुमार के मुताबिक, बरसों पहले गोंडा में रहने वाला एक भक्त मां विंध्यवासिनी का बड़ा उपासक था। शुरुआत में वह हर महीने विंध्याचल जाकर माता के दर्शन किया करता था। धीरे-धीरे उसकी श्रद्धा इतनी गहरी हो गई कि वह महीने में एक बार की जगह हर हफ्ते विंध्याचल पहुंचने लगा। मगर शादी के बाद हालात बदल गए और बार-बार विंध्याचल जाना उसके लिए मुश्किल हो गया।

ये भी पढ़ें

नीम के पेड़ के नीचे मिला मां का चमत्कारी स्वरूप

महंत शशि कुमार बताते हैं कि इसी उलझन में भक्त ने मां विंध्यवासिनी से गुहार लगाई कि अगर वह नियमित दर्शन के लिए नहीं जा पा रहा है, तो माता खुद उसके घर के आसपास विराजमान हो जाएं। मान्यता के अनुसार, कुछ दिन बाद उसके घर के नजदीक एक नीम के पेड़ के नीचे एक कुत्ता जमीन खोदने लगा। जब आसपास के लोगों ने वहां खुदाई की, तो मिट्टी के भीतर से चने के दाने जितना छोटा मां का दिव्य स्वरूप निकला। यह अनोखा नजारा देखकर वहां मौजूद हर कोई चकित रह गया, और इसे माता की असीम कृपा माना गया।

1995 में बना मंदिर, अब 1 से 2 फीट का हुआ स्वरूप

इस घटना के बाद उस जगह की चर्चा आसपास के इलाकों में तेजी से फैलने लगी और श्रद्धालु धीरे-धीरे बड़ी संख्या में वहां पहुंचने लगे। बढ़ती आस्था और भीड़ को देखते हुए साल 1995 में उसी स्थान पर विधिवत मंदिर का निर्माण करवाया गया। बताया जाता है कि तब से लेकर अब तक मां का यह दिव्य स्वरूप लगातार आकार में बढ़ता रहा है, और शुरुआत में चने के दाने जितना दिखने वाला यह स्वरूप आज करीब 1 से 2 फीट तक की ऊंचाई पा चुका है। यही असाधारण बदलाव इस बात की वजह है कि गोंडा के सबसे अनोखे और चमत्कारी धार्मिक स्थलों में इस मंदिर की गिनती होती है।

सच्चे मन से मांगी मुराद होती है पूरी, ऐसी है मान्यता

आज भी दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए इस मंदिर में पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों और भक्तों का पक्का विश्वास है कि जो कोई भी सच्चे दिल से माता की पूजा करके अपनी मनोकामना बताता है, माता उसकी इच्छा जरूर पूरी करती हैं। यही गहरी और अटूट आस्था इस मंदिर को गोंडा की प्रमुख धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा बनाती है।

सवाल-जवाब

मां विंध्यवासिनी मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर उत्तर प्रदेश के गोंडा शहर में स्थित है।
इस मंदिर की शुरुआत कैसे हुई?
मान्यता है कि एक भक्त की प्रार्थना के बाद उसके घर के पास नीम के पेड़ के नीचे मां का दिव्य स्वरूप मिला था।
मंदिर का निर्माण कब हुआ था?
इस स्थान पर विधिवत मंदिर का निर्माण साल 1995 में करवाया गया था।
मां के दिव्य स्वरूप का आकार शुरुआत में कितना था और अब कितना है?
शुरुआत में यह स्वरूप चने के दाने जितना छोटा था, जो अब बढ़कर करीब 1 से 2 फीट ऊंचा हो चुका है।
इस मंदिर से जुड़ी मुख्य मान्यता क्या है?
भक्तों का मानना है कि सच्चे मन से पूजा कर मनोकामना बताने पर माता उसे पूरा करती हैं।
मंदिर के बारे में यह जानकारी किसने दी?
मंदिर के महंत शशि कुमार ने इस पूरी घटना और मंदिर के इतिहास की जानकारी दी।
भक्त पहले कहां दर्शन के लिए जाते थे?
वह भक्त पहले हर महीने और बाद में हर हफ्ते विंध्याचल जाकर मां के दर्शन करते थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR