उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित मां बागेश्वरी देवी मंदिर आज के समय में श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और श्रद्धा का एक विशेष केंद्र बन चुका है। यह पावन मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यात्रियों और श्रद्धालुओं को यहां पहुंचने के लिए लखनऊ रोड से मैजापुर की तरफ जाने वाले रास्ते का उपयोग करना पड़ता है। इस धार्मिक स्थल पर न केवल आसपास के स्थानीय लोग बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी भक्त माता रानी के दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। लगभग 10 बिस्वा जमीन के क्षेत्रफल में फैले इस मंदिर का इतिहास किसी एक परिवार की अटूट आस्था, समर्पण और बड़े त्याग की कहानी से जुड़ा हुआ है।
इस मंदिर के निर्माण और इसके इतिहास के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए राम तिलक पांडेय ने बताया कि वर्ष 1985 का वह दौर उनके परिवार के लिए बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण समय था। उस दौरान उनकी खुद की तबीयत काफी ज्यादा खराब रहती थी, जिससे उनके परिवार के सभी सदस्य उनकी सेहत को लेकर लगातार चिंतित और परेशान रहते थे। उनके पिता नियमित रूप से पूजा-पाठ किया करते थे। इसी दौर में एक दिन उनके पिता को सोते समय सपने में माता के दर्शन होने का अनुभव हुआ और उन्होंने इस घटना के बारे में सबको बताया।
सपने का आदेश और जमीन का त्याग
राम तिलक पांडेय के अनुसार, उनके पिता को उस स्वप्न में साक्षात माता की तरफ से इसी खास स्थान पर एक मंदिर का निर्माण करवाने का स्पष्ट संकेत मिला था। परिवार ने इस अनोखे सपने को कोई साधारण बात न मानकर इसे सीधे तौर पर माता रानी का आदेश माना और बिना किसी संकोच के मंदिर का निर्माण करवाने का पक्का निर्णय ले लिया। इसके बाद उनके पिता ने आगे बढ़कर अपनी खुद की लगभग 10 बिस्वा बहुमूल्य जमीन इस धार्मिक कार्य के लिए दान कर दी। खास बात यह है कि जिस जगह पर आज यह मंदिर पूरी भव्यता के साथ खड़ा है, वह मुख्य हाईवे के बेहद करीब है। इस वजह से उस जमीन का बाजार भाव और कमर्शियल कीमत भी काफी ज्यादा थी। इसके बावजूद उनके पिता ने अपनी संपत्ति के आर्थिक मूल्य या नफे-नुकसान के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा और केवल जनहित तथा जनकल्याण को सर्वोपरि रखते हुए वह पूरी जमीन माता के मंदिर के नाम समर्पित कर दी। परिवार का शुरू से यही पक्का विश्वास था कि इस पवित्र स्थान पर मां का मंदिर बन जाने से स्थानीय लोगों को पूजा-पाठ करने और माता के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त होगा।
पिंडी स्थापना से लेकर भव्य मंदिर तक का सफर
राम तिलक पांडेय ने आगे बताया कि इस मंदिर का निर्माण एक ही बार में नहीं हुआ, बल्कि इसे तैयार होने में एक लंबी प्रक्रिया लगी। शुरुआत में इस स्थल पर केवल माता की एक पिंडी स्थापित की गई और उसी रूप में पूजा-पाठ की शुरुआत की गई। इसके बाद जैसे-जैसे समय बीतता गया, स्थानीय लोगों और आने वाले श्रद्धालुओं का सहयोग धीरे-धीरे मिलता चला गया और उसी जनसहयोग के बल पर इस मंदिर के भवन का निर्माण कराया गया। आज के समय में यह पूरा परिसर मां बागेश्वरी देवी मंदिर के रूप में पूरे क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है।
इस मंदिर में सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि के पवित्र दिनों का यहां विशेष महत्व माना जाता है। नवरात्र के पावन पर्व के दौरान यहां भारी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन और अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा सामान्य दिनों में भी विशेषकर प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार के दिन दूर-दराज के इलाकों से लोग माता की पूजा-अर्चना करने और अपनी मनोकामनाएं मांगने के लिए यहां आते हैं।
आस्था का बढ़ता दायरा
शुरुआत में लगभग 10 बिस्वा जमीन पर बने इस मंदिर की नींव भले ही एक परिवार की व्यक्तिगत आस्था से पड़ी हो, लेकिन अब यह केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहा है। समय बीतने के साथ-साथ यह स्थान अब पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए अटूट श्रद्धा का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। इस मंदिर से जुड़ी परिवार की यह पूरी दास्तान यह साबित करती है कि अगर किसी काम की शुरुआत सच्ची आस्था, समर्पण और जनसेवा की पवित्र भावना के साथ की जाए, तो वह छोटा सा प्रयास आगे चलकर अनगिनत लोगों के लिए एक महान धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल बन सकता है।



















