फेडरल रिजर्व की सख्ती और पश्चिम एशिया में खिंचाव के बीच अमेरिकी डॉलर दो हफ्ते के शीर्ष पर, वैश्विक बाजारों में हलचलकांवर यात्रा के कड़े नियम जानकर कांप जाएगी रूह, कोई छोड़ देता है अन्न-पानी तो कोई नहीं बैठता पूरी यात्रा मेंढाबा स्टाइल सोंधा आलू-बैंगन चोखा घर पर बनाने की आसान रेसिपी और सीक्रेट तरीकाकच्चे तेल में तेजी से बैंक ऑफ कनाडा पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव, दिसंबर में भी कदम उठाने की संभावनाचक्रवाती तूफान अर्नब की आहट से सहमा रेल यातायात, 6 राज्यों में दर्जनों एक्सप्रेस व पैसेंजर ट्रेनें रद्ददक्षिण कोरियाई सीमा पर उत्तर कोरिया की हलचल, तोपों की तैनाती से बढ़ा तनावरणबीर कपूर की 'रामायण' के खौफ से टली अंशुमान झा की 'लकड़बग्घा 2', जानिए अब कब आएगी फिल्मसावन पुत्रदा एकादशी 5 अगस्त को, संतान प्राप्ति के लिए इस शुभ योग में करें पूजाशरद पूर्णिमा पर सुई-धागे का अचूक उपाय और ज्योतिषीय टोटके, दिवाली से पहले घर में बरसेंगी खुशियांमैक्सिकन पेसो में हालिया तेज गिरावट अब सीमित रहने के आसार, कमर्जबैंक का आकलन
डाकोर के रणछोड़राय धाम का अलौकिक इतिहास, जब भक्त बोदना के प्रेम में द्वारका छोड़ बैलगाड़ी पर सवार हुए थे भगवान कृष्णधर्म
3 सित॰ 2026, 9:01 am (55 दिन पहले)· 3

डाकोर के रणछोड़राय धाम का अलौकिक इतिहास, जब भक्त बोदना के प्रेम में द्वारका छोड़ बैलगाड़ी पर सवार हुए थे भगवान कृष्ण

गुजरात के खेड़ा स्थित डाकोर में रणछोड़राय मंदिर का इतिहास अद्भुत है। जानिए कैसे 72 वर्ष के भक्त बोदना के अनन्य प्रेम के कारण भगवान कृष्ण द्वारका का गर्भगृह छोड़कर साधारण बैलगाड़ी में डाकोर चले आए।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोग में 4 सितंबर को देशभर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर द्वारकाधीश के अनेक स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित डाकोर के रणछोड़राय मंदिर का इतिहास अत्यंत अद्भुत और भावविभोर करने वाला है। यह केवल एक विशाल और भव्य देवालय की कहानी नहीं है, बल्कि उस अगाध भक्ति का प्रमाण है जिसकी खातिर स्वयं जगत के स्वामी भगवान श्री कृष्ण ने राजसी ठाट-बाट छोड़कर एक साधारण बैलगाड़ी में सवार होकर द्वारका से डाकोर तक की यात्रा की थी।

गोकुल के ग्वाले विजयआनंद से डाकोर के बोदना तक का आध्यात्मिक सफर

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलियुग में भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त के रूप में प्रसिद्ध हुए बोदना पूर्व जन्म में गोकुल के विजयआनंद नामक ग्वाले थे। गोकुल की पवित्र भूमि पर जन्म लेने के कारण उनके हृदय में बाल गोपाल के प्रति निश्चल प्रेम बसा हुआ था। समयांतर में उनका जन्म गुजरात की पावन धरा पर बोदना के रूप में हुआ, जहाँ उनकी धर्मपत्नी गंगाबाई ने भी उनके भक्ति मार्ग में पूरा सहयोग दिया। बोदना का जीवन पूर्णतः श्री कृष्ण की साधना को समर्पित था। वे बिना किसी स्वार्थ या भौतिक कामना के निरंतर प्रभु नाम का संकीर्तन करते रहते थे।

ये भी पढ़ें

हाथों में तुलसी का पौधा लेकर हर छह महीने में 72 वर्ष तक द्वारका पदयात्रा

बोदना की भक्ति की पराकाष्ठा इस बात से सिद्ध होती है कि वे प्रत्येक छह माह में अपने हाथों में तुलसी का पौधा लेकर डाकोर से द्वारका की कठिन यात्रा पर पैदल निकलते थे। द्वारकाधीश के दर्शन करके वे अत्यंत आदर एवं प्रेम से तुलसी दल प्रभु के चरणों में अर्पित करते थे। यह नियम उन्होंने वर्षों तक अनवरत निभाया। जब बोदना की आयु 72 वर्ष के समीप पहुँची, तो वृद्धावस्था के कारण उनका शरीर जर्जर होने लगा और लंबी पदयात्रा करना उनके लिए लगभग असंभव हो गया। शारीरिक असमर्थता के बावजूद उनके मन में द्वारकाधीश के दर्शन की तीव्र उत्कंठा बनी रही। भक्त की इस विवशता और निष्काम प्रेम को देखकर भगवान कृष्ण द्रवित हो उठे। मान्यताओं के अनुसार, प्रभु ने बोदना को साक्षात दर्शन दिए और निर्देश दिया कि जब वे अगली बार द्वारका आएँ, तो अपने साथ एक साधारण बैलगाड़ी लेकर आएँ, क्योंकि वे स्वयं उनके साथ डाकोर चलने वाले हैं।

आधी रात को स्वतः खुले गर्भगृह के द्वार और डाकोर की ओर प्रस्थान

प्रभु की आज्ञा पाकर वृद्ध बोदना अत्यंत हर्षित हुए और एक बैलगाड़ी का प्रबंध करके द्वारका पहुँचे। जब द्वारकाधीश मंदिर के पुजारियों ने एक निर्धन वृद्ध को बैलगाड़ी के साथ देखा, तो उन्होंने कौतुकवश कारण पूछा। बोदना ने सरलता से उत्तर दिया कि वे अपने प्रभु को अपने साथ डाकोर ले जाने आए हैं। पुजारियों ने इसे एक वृद्ध का भ्रम समझकर उपहास उड़ाया और रात्रि में नियम अनुसार गर्भगृह के विशाल कपाट बंद करके ताला लगा दिया। परंतु आधी रात के समय एक अद्भुत चमत्कार घटित हुआ। बंद मंदिर के भारी द्वार स्वतः ही खुल गए। भगवान कृष्ण ने गर्भगृह से बाहर आकर सोए हुए बोदना को जगाया और स्वयं बैलगाड़ी में विराजमान हो गए। बोदना परम आनंदित होकर प्रभु की प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर डाकोर की दिशा में निकल पड़े।

बिलेश्वर महादेव के समीप विश्राम और मीठी नीम की अलौकिक गाथा

द्वारका से डाकोर की यात्रा के दौरान रास्ते में डाकोर के निकट बिलेश्वर महादेव मंदिर के समीप बोदना और भगवान कृष्ण ने कुछ समय विश्राम किया। लोककथा के अनुसार, वहाँ विश्राम के दौरान भगवान कृष्ण ने नीम के वृक्ष की एक शाखा का स्पर्श किया था। स्पर्श होते ही उस विशाल नीम के पेड़ की वह विशेष शाखा चमत्कारिक रूप से मीठी हो गई, जबकि वृक्ष की अन्य सभी शाखाएँ अपने स्वाभाविक कड़वे स्वाद में ही रहीं। आज भी डाकोर आने वाले श्रद्धालु इस मीठी नीम के पेड़ का दर्शन करते हैं और यह अलौकिक प्रसंग गुजरात की लोक परंपराओं में बड़े श्रद्धाभाव से सुनाया जाता है।

गोमती तालाब में प्रतिमा का जलप्रवेश और पुजारियों के साथ विवाद

दूसरी ओर, जब द्वारका के पुजारियों को प्रातःकाल मंदिर का गर्भगृह खाली मिला और भगवान की प्रतिमा गायब दिखी, तो वे समझ गए कि बोदना सत्य कह रहे थे। क्रोध और चिंता में भरकर पुजारियों ने तुरंत बोदना का पीछा किया और डाकोर पहुँच गए। पुजारियों को आते देख बोदना भयभीत हो गए। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के निर्देश पर बोदना ने प्रतिमा को डाकोर स्थित गोमती तालाब के जल में सुरक्षित छिपा दिया। जब द्वारका से आए पुजारियों ने बोदना को घेरा और विवाद बढ़ा, तो धक्का-मुक्की और तनाव के बीच वयोवृद्ध बोदना का देहांत हो गया।

सोने की नथ का अलौकिक चमत्कार और डाकोर में रणछोड़राय का स्थायी वास

बोदना के चले जाने के बाद भी द्वारका के पुजारी भगवान की प्रतिमा को वापस ले जाने पर अड़े रहे। तब भगवान कृष्ण ने बोदना की शोकाकुल पत्नी गंगाबाई को स्वप्न में दर्शन दिए। प्रभु ने गंगाबाई से कहा कि वे पुजारियों को प्रतिमा के भार के बराबर सोना देकर संतुष्ट कर दें। गंगाबाई अत्यंत निर्धन थीं और उनके पास स्वर्ण के नाम पर केवल एक छोटी-सी सोने की नथ थी। परंतु जैसे ही उस नथ को तराज़ू के एक पलड़े पर रखा गया और दूसरे पलड़े पर भारी पाषाण प्रतिमा को रखा गया, भगवान के चमत्कार से प्रतिमा इतनी हल्की हो गई कि उसका भार ठीक उस नथ के बराबर ही निकला। इस अद्भुत घटना से चकित पुजारियों का अहंकार चूर-चूर हो गया। भगवान ने पुजारियों को आश्वस्त किया कि छह माह पश्चात द्वारका के एक कुएं में उनकी प्रतिमा का ही एक प्रतिरूप प्राप्त हो जाएगा। इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण हमेशा के लिए रणछोड़राय स्वरूप में डाकोर में विराजमान हो गए।

सवाल-जवाब

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 में कब मनाई जाएगी?
कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर को रोहिणी नक्षत्र और भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के शुभ संयोग में देशभर में मनाया जाएगा।
डाकोर का रणछोड़राय मंदिर गुजरात के किस जिले में स्थित है?
डाकोर का प्रसिद्ध रणछोड़राय मंदिर गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित है।
भक्त बोदना पूर्व जन्म में कौन थे?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भक्त बोदना पूर्व जन्म में गोकुल के विजयआनंद नामक ग्वाला थे।
भगवान कृष्ण द्वारका से डाकोर किस वाहन में बैठकर आए थे?
भगवान कृष्ण अपने भक्त बोदना के साथ किसी राजसी रथ में नहीं बल्कि एक साधारण बैलगाड़ी में बैठकर डाकोर आए थे।
बिलेश्वर महादेव के पास किस पेड़ की शाखा मीठी हो गई थी?
भगवान कृष्ण के स्पर्श से बिलेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित नीम के पेड़ की एक शाखा मीठी हो गई थी।
बोदना की पत्नी गंगाबाई ने पुजारियों को क्या अर्पित किया था?
गंगाबाई ने अपनी छोटी-सी सोने की नथ तराज़ू पर रखी थी, जो चमत्कारिक रूप से भगवान की भारी प्रतिमा के वजन के बराबर सिद्ध हुई।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp