शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के साथ देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अनूठी लोक परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक बेहद भावुक और आस्था से भरी परंपरा बिहार तथा मिथिलांचल क्षेत्र में प्रचलित है, जिसे मां दुर्गा का खोइछा भरना कहा जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा अपने मायके आती हैं। जिस प्रकार किसी विवाहित बेटी के मायके से ससुराल लौटते समय उसकी झोली में मंगल कामनाओं के साथ उपहार बांधे जाते हैं, ठीक उसी तरह नवमी और अष्टमी के अवसर पर सुहागिन महिलाएं जगतजननी की गोद भरकर उन्हें विदा करती हैं। इस अनुष्ठान का उद्देश्य पति की दीर्घायु, संतान के आरोग्य और पूरे परिवार की सुख-शांति की याचना करना होता है।
खोइछा अनुष्ठान का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
मिथिला संस्कृति में खोइछा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि वात्सल्य और सम्मान का जीवंत प्रतीक है। जब भी घर की बेटी मायके आती है, तो विदाई के समय उसे खाली हाथ विदा नहीं किया जाता। उसकी साड़ी के पल्लू में धान, अक्षत, दूर्वा, हल्दी और सुहाग सामग्री बांधकर सुरक्षित और समृद्ध जीवन का आशीर्वाद दिया जाता है। नवरात्रि में मां दुर्गा को भी साक्षात कुल की बेटी मानकर यह रस्म निभाई जाती है। मान्यता है कि जब माता दुर्गा का विधिपूर्वक खोइछा भरा जाता है, तो देवी प्रसन्न होकर साधक के घर-आंगन को अन्न, धन और अखंड सौभाग्य से परिपूर्ण कर देती हैं।
खोइछा भरने के लिए आवश्यक पूजन सामग्री
इस पावन अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिए शास्त्र और लोक रीति के अनुसार विशेष सामग्री एकत्र की जाती है। इसमें मुख्य रूप से ये वस्तुएं शामिल होती हैं
- एक नया लाल कपड़ा
- सुंदर साड़ी
- संपूर्ण श्रृंगार सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, आलता, नेल पॉलिश इत्यादि)
- ताजे मौसमी फल
- शुद्ध पारंपरिक मिठाई
- 5 साबुत पान के पत्ते
- 5 पूजा की सुपारी
- 1 जटा वाला श्रीफल (नारियल)
- अखंडित अक्षत (चावल)
- हरी दूर्वा घास
- साबुत हल्दी की गांठ
- श्रद्धानुसार दक्षिणा (नकद राशि)
खोइछा बांधने की चरणबद्ध विधि
खोइछा भरने की प्रक्रिया अत्यंत पवित्र मन और शुचिता के साथ पूरी की जाती है। सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष स्वच्छ स्थान पर एक नया लाल वस्त्र बिछाएं। इसके उपरांत उस लाल कपड़े के ऊपर नई साड़ी और सुहाग से जुड़ी सभी वस्तुएं जैसे सिंदूर, कांच की चूड़ियां, महावर या आलता, बिंदी और नेल पॉलिश श्रद्धापूर्वक रखें। इसके साथ ही कपड़े के मध्य भाग में 5 साबुत पान के पत्ते, 5 गोल सुपारी, 1 नारियल, फल, मिष्ठान्न, दूर्वा, हल्दी का टुकड़ा और अक्षत स्थापित करें।
सामग्री सजाने के पश्चात पास में शुद्ध घी का दीपक और सुगंधित धूप प्रज्वलित करें। फिर दोनों हाथ जोड़कर देवी से अपने सुहाग की लंबी उम्र, संतान के कल्याण और परिवार की समृद्धि के लिए मौन प्रार्थना करें। पूजन में यदि अनजाने में कोई त्रुटि रह गई हो, तो उसके लिए देवी से क्षमा याचना करें। अंत में उस लाल कपड़े को सभी सामग्रियों सहित पोटली के रूप में व्यवस्थित तरीके से बांध दें और इस पावन खोइछा को मां दुर्गा के चरणों के समीप अर्पित कर दें।
वर्ष 2026 में महाअष्टमी और महानवमी की तिथियां
खोइछा भरने का विधान मुख्य रूप से नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि को होता है। वर्ष 2026 के पंचांग अनुसार इन दोनों मुख्य तिथियों का समय इस प्रकार निर्धारित है
महाअष्टमी (महा दुर्गाष्टमी): नवरात्रि की अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को प्रातः 8 बजकर 27 मिनट पर प्रारंभ होगी। इस तिथि का समापन 19 अक्टूबर को प्रातः 10 बजकर 51 मिनट पर होगा।
महानवमी: नवरात्रि की नवमी तिथि 19 अक्टूबर को प्रातः 10 बजकर 51 मिनट से शुरू होगी। इस तिथि की समाप्ति 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर होगी। श्रद्धालु इन्हीं पावन मुहूर्तों के मध्य मां दुर्गा का खोइछा भरकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

















