हिंदू पंचांग के अनुसार सावन मास के मंगलवार को समर्पित मंगला गौरी व्रत का सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्व माना गया है। माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और पति की लंबी उम्र की प्राप्ति होती है। व्रत की शुरुआत करने के बाद अक्सर महिलाओं के मन में यह सवाल आता है कि इस परंपरा को आखिर कितने वर्षों तक लगातार जारी रखना चाहिए।
व्रत की समयावधि और उद्यापन
धार्मिक परंपराओं के अनुसार विवाहित महिलाओं को विवाह के पश्चात लगातार 5 वर्षों तक सावन महीने के प्रत्येक मंगलवार को यह उपवास रखना होता है। पांचवें साल सावन के आखिरी मंगलवार के दिन विधि-विधान से पूजा और हवन के साथ इस व्रत का उद्यापन करने का नियम है। हालांकि देश के अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं के आधार पर इस अवधि में भिन्नता भी देखने को मिलती है, जहां कुछ परिवारों में महिलाएं इसे पूरे 7 वर्षों तक भी निभाती हैं।
अविवाहित कन्याओं के लिए नियम
केवल सुहागिन महिलाएं ही नहीं बल्कि अविवाहित लड़कियां भी अपनी मनचाहे जीवनसाथी और अच्छे वर की प्राप्ति के लिए मंगला गौरी का उपवास रख सकती हैं। वे अपनी व्यक्तिगत श्रद्धा के अनुसार इस व्रत को करने का संकल्प ले सकती हैं। इसके अलावा कई क्षेत्रों की मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि कन्याएं विवाह होने तक इस परंपरा का पालन कर सकती हैं।
इस साल का अंतिम व्रत
वर्ष 2026 में सावन मास का चौथा और इस साल का आखिरी मंगला गौरी व्रत 25 अगस्त 2026, मंगलवार को रखा जाएगा। इस विशेष दिन पर शिव परिवार की आराधना कर दांपत्य जीवन में मधुरता और प्रेम बनाए रखने के लिए प्रार्थना की जाती है।
पूजन की संपूर्ण विधि
व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल और सफेद रंग के कपड़े बिछाए जाते हैं। सफेद वस्त्र पर चावल के माध्यम से नवग्रह बनाए जाते हैं और लाल वस्त्र पर गेहूं से सोलह माताओं की आकृति बनाई जाती है। इसके पश्चात गणेश जी की स्थापना की जाती है और दूसरी तरफ जल से भरा हुआ कलश स्थापित किया जाता है। आटे से निर्मित चौमुखी दीपक में चार बत्तियां प्रज्वलित की जाती हैं।
पूजन की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाती है। उन्हें जल, रोली, मौली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, पुष्प, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, फल, मेवे और दक्षिणा अर्पित की जाती है। इसके बाद कलश, नवग्रह और सोलह माताओं का पूजन संपन्न होता है। फिर माता मंगला गौरी की प्रतिमा को जल, दूध और दही से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। माता को रोली, चंदन, सिंदूर, मेहंदी, काजल और सोलह शृंगार की सामग्री समर्पित की जाती है। इसके बाद पुष्प माला, फल, मेवे और सुपारी अर्पित किए जाते हैं।
इसके पश्चात मंगला गौरी व्रत की कथा का श्रवण किया जाता है और अंत में आरती की जाती है। विवाहित महिलाओं द्वारा अपनी सास और ननद को सोलह लड्डू देने की परंपरा का पालन किया जाता है। साथ ही ब्राह्मण को प्रसाद और पूजन सामग्री दान देने का भी विधान है। अंतिम व्रत के अगले दिन यानी बुधवार के दिन देवी मंगला गौरी की प्रतिमा को सभी नियमों का पालन करते हुए किसी पवित्र नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।



















