राजस्थान के नागौर जिले में लोक मान्यताओं, धर्म और प्राचीन इतिहास से जुड़े अनेक ऐसे दर्शनीय स्थल मौजूद हैं जिनकी कहानियां आज भी लोगों को हैरान करती हैं। मेड़ता तहसील के निकट स्थित पांडूखां गांव में बना श्री कुंती माता का प्राचीन मंदिर ऐसा ही एक ऐतिहासिक धाम है। इस पावन स्थल को स्थानीय निवासी पांडवा ओरण के नाम से भी पुकारते हैं। पुरातात्विक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार यह धार्मिक स्थल लगभग 1500 वर्ष पुराना है। पौराणिक गाथाओं में उल्लेख मिलता है कि अपने अज्ञातवास और वनवास की अवधि के दौरान महाभारत काल के पांडवों ने इस स्थान पर समय बिताया था और कठोर तपस्या की थी। मंदिर परिसर के ठीक सामने स्थित विशाल बावड़ी के निर्माण का श्रेय भी पांडवों को ही दिया जाता है। वर्षा ऋतु के बाद जब गांव का तालाब सूख जाता है, तब यह प्राचीन बावड़ी अपने मूल पुरातात्विक स्वरूप में स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
प्राचीन शिलालेख और बावड़ी से निकले दुर्लभ ऐतिहासिक अवशेष
मंदिर के वर्तमान पुजारी कुंतीदास के अनुसार इस प्राचीन परिसर में इतिहास की गवाही देते कई महत्वपूर्ण अवशेष आज भी सुरक्षित मौजूद हैं। प्रवेश द्वार पर माता के दर्शन से पहले स्थापित दो सिंहों की पत्थर की मूर्तियां मंदिर के सुदीर्घ इतिहास को दर्शाती हैं। इन मूर्तियों में से एक सिंह का मस्तक खंडित है, जबकि दूसरे सिंह का पैर टूटा हुआ है। इसके अतिरिक्त परिसर में जगह-जगह प्राचीन लिपि में उकेरे गए शिलालेख रखे हुए हैं। लगभग आठ साल पहले जब मंदिर के सामने स्थित बावड़ी की सफाई और जल स्तर घटने की प्रक्रिया हुई, तब वहां से 1260 ईस्वी का एक दुर्लभ पत्थर का अवशेष प्राप्त हुआ था। इसी बावड़ी से एक विशेष धातु की बाल्टी भी निकाली गई थी, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सदियों तक पानी में रहने के बाद भी उस पर आज तक जंग का एक निशान भी नहीं लगा है।
गर्भगृह का स्वरूप और पांडूखां नामकरण की गाथा
श्री कुंती माता मंदिर के गर्भगृह में भक्तों के दर्शन के लिए तीन मुख्य प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। गर्भगृह के मध्य भाग में महिषासुर मर्दिनी माता की भव्य मूर्ति विराजमान है। इनके बाईं ओर माता कुंती की दिव्य प्रतिमा स्थापित है, जबकि दाईं ओर संगमरमर के पत्थर से तराशी गई सिंहवाहिनी दुर्गा माता की प्रतिमा सुशोभित है। गर्भगृह के भीतर बाईं तरफ स्थापित गणेशजी की मूर्ति के समीप भी एक अति प्राचीन शिलालेख को सुरक्षित रखा गया है। क्षेत्र के बड़े-बुजुर्गों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पांडवों के प्रवास और कुंती माता के इस धाम की बढ़ती ख्याति के कारण ही कालांतर में इस पूरे गांव का नाम पांडूखां पड़ा।
ब्रह्म मुहूर्त की आरती और शारदीय नवरात्रि का विशाल मेला
इस ऐतिहासिक धाम की सबसे अनूठी विशेषता यहां सदियों से निभाई जा रही पूजा की परंपरा है। मंदिर में प्रतिदिन सुबह 4 बजे ब्रह्म मुहूर्त के समय दिन की पहली आरती संपन्न होती है। पुजारी बताते हैं कि यह समय और अनुष्ठान पीढ़ियों पुराना है तथा उनके पूर्वज भी इसी पावन बेला में माता की सेवा-अर्चना करते आ रहे हैं। दिन भर धार्मिक गतिविधियों के पश्चात रात 9 बजे मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। विशेष पर्वों और मांगलिक अवसरों पर माता को पारंपरिक राजस्थानी व्यंजन लापसी तथा दाल-बाटी का भोग अर्पित किया जाता है। इसके अलावा शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर मंदिर प्रांगण में एक विशाल धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें सम्मिलित होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
धार्मिक पर्यटन और कुलदेवी के रूप में मान्यता
हालांकि 1500 साल पुराना यह पावन धाम अभी तक राज्य के मुख्य पर्यटन मानचित्र पर व्यापक पहचान नहीं बना पाया है, लेकिन स्थानीय लोगों की आस्था इसमें अटूट है। नागौर और राजसमंद जिलों के अलावा राजस्थान के विभिन्न हिस्सों तथा पड़ोसी राज्यों से अनेक परिवार अपनी कुलदेवी के रूप में श्री कुंती माता के दर्शन करने यहां नियमित रूप से आते हैं। पांडवों के वनवास काल की लोककथाओं और रहस्यमयी पुरातात्विक साक्ष्यों को समेटे यह मंदिर आज भी अपनी प्राचीन विरासत को पूरी निष्ठा के साथ जीवंत बनाए हुए है।



















