राजस्थान के अजमेर से करीब 16 किलोमीटर दूर बसे तीर्थराज पुष्कर में एक ऐसा शिवालय है जहां एक ही परिसर में 52 भैरव और 64 जोगणिया माताओं की प्रतिमाएं एक साथ विराजमान हैं। पुष्कर वैसे भी अपनी पवित्र झील और भगवान ब्रह्मा के मंदिर के लिए दुनियाभर में जाना जाता है, लेकिन उसी शहर में मौजूद यह 52 भैरव मंदिर अपनी अलग मान्यता और पुराने इतिहास के चलते श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है।
भगवान ब्रह्मा के मंदिर जितना ही अनूठा दर्जा
मंदिर के पुजारी गर्व पराशर के मुताबिक जिस तरह पूरी दुनिया में भगवान ब्रह्मा का इकलौता प्रसिद्ध मंदिर सिर्फ पुष्कर में है, ठीक उसी तरह 52 भैरव का भी यह अपने आप में इकलौता मंदिर माना जाता है। यहां एक साथ 52 भैरव और 64 जोगणिया माताएं मौजूद होने की वजह से मंदिर की धार्मिक अहमियत और बढ़ जाती है, और श्रद्धालु इसे बेहद खास और दुर्लभ स्थान मानते हैं।
स्वयंभू प्रतिमाएं और 500 से 600 साल पुरानी परंपरा
पुजारी बताते हैं कि मंदिर में स्थापित सभी 52 भैरव और 64 जोगणिया माताओं की मूर्तियां स्वयंभू हैं, यानी इन्हें किसी कारीगर ने गढ़ा या स्थापित नहीं किया, बल्कि ये खुद धरती से प्रकट हुई थीं। मंदिर का इतिहास करीब 500 से 600 साल पुराना बताया जाता है और तभी से यहां लगातार पूजा-पाठ की परंपरा चली आ रही है। आज भी पराशर परिवार अपने पुरखों की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मंदिर की सेवा और नियमित पूजा-अर्चना संभाल रहा है।
मन्नत पूरी होने और नशा छुड़ाने की मान्यता
पुजारी के अनुसार जिन लोगों की शादी में बार-बार रुकावटें आ रही हों या जो संतान सुख की कामना लेकर आते हैं, वे यहां भैरव बाबा के सामने अपनी अर्जी लगाते हैं। श्रद्धालुओं का गहरा विश्वास है कि सच्चे दिल से मांगी गई मुराद इस मंदिर में जरूर पूरी होती है। इसके अलावा मंदिर से जुड़ी एक और खास और अनोखी परंपरा है, जिसमें लोग अपनी नशे की लत छुड़ाने की मन्नत मांगते हुए शराब या दूसरे नशीले पदार्थ भगवान को अर्पित करते हैं। मान्यता है कि भैरव बाबा के आशीर्वाद से इंसान धीरे-धीरे नशे की आदत से दूरी बनाने लगता है और उसकी जिंदगी सही और सकारात्मक राह पर लौट आती है।
दो अघोरियों की तपस्या और शिव के 52 दिव्य रूप
मंदिर से जुड़ी कथा के मुताबिक बहुत पुराने समय में यहां दो अघोरियों ने कड़ी और लंबी तपस्या की थी, जो अघोर पंथ की कठिन साधना पद्धति के तहत की जाती है। उनकी बरसों की इस साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें 52 भैरव के स्वरूप में साक्षात दर्शन दिए थे। इसी दिव्य घटना के बाद यह जगह खास धार्मिक महत्व वाला स्थान बन गई और धीरे-धीरे यहां श्रद्धालुओं का आना शुरू हुआ। पुजारी गर्व पराशर बताते हैं कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां इस मंदिर में पूजा-अर्चना करती आई हैं और वे खुद पिछले छह से सात साल से लगातार मंदिर की सेवा और पूजा-पाठ से जुड़े हुए हैं।



















