उत्तर प्रदेश के संभल जिले में स्थित मनु श्री कल्कि मंदिर अपनी धार्मिक महत्ता के साथ-साथ ऐतिहासिक रूप से भी काफी अहमियत रखता है। ऐसा माना जाता है कि यह पवित्र स्थल एक हजार साल से भी अधिक पुराना है और इसकी बनावट एक प्राचीन नक्शे में भी दर्ज है, जहां मंदिर की आकृति के साथ इसका नाम मनु श्री कल्कि मंदिर दर्ज मिलता है।
दक्षिण भारतीय शैली और अनूठी वास्तुकला
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी निर्माण शैली है, जिसे दक्षिण भारतीय शैली में तैयार किया गया है और उत्तर भारत में इस तरह की शैली बेहद दुर्लभ मानी जाती है। मंदिर के महंत का दावा है कि यह पूरे देश में भगवान कल्कि का अकेला मंदिर है। यही वजह है कि यहां केवल देश के विभिन्न हिस्सों से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी सैलानी और भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं।
एक हजार साल से अधिक पुराना इतिहास
मंदिर के पुजारी महेंद्र शर्मा का कहना है कि इस धार्मिक स्थल को पहले मनु श्री कल्कि मंदिर के रूप में पुकारा जाता था, जिसे अब केवल कल्कि मंदिर कहा जाता है। उनके पास संभल क्षेत्र का एक हजार साल पुराना नक्शा मौजूद है जिसमें इस मंदिर का साफ तौर पर जिक्र किया गया है। हालांकि इस मंदिर के निर्माण की सही तारीख का पता नहीं चल पाया है, लेकिन यह पूरी तरह तय है कि यह एक हजार साल से भी ज्यादा प्राचीन है। धार्मिक पुराणों के अनुसार, कलियुग के दौरान भगवान विष्णु का दसवां और अंतिम अवतार श्री कल्कि नारायण के रूप में संभल में ही होगा। इसी गहरी मान्यता के चलते करीब एक हजार साल पहले इस मंदिर की स्थापना की गई थी। यह मंदिर आज भी भक्तों की अटूट श्रद्धा का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां लोग अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की आस में हाजिरी लगाते हैं।
तीन सौ साल पहले हुआ था जीर्णोद्धार
इस ऐतिहासिक मंदिर का आखिरी बार जीर्णोद्धार करीब तीन सौ वर्ष पहले इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर की तरफ से करवाया गया था। मंदिर की पूरी शिल्पकला दक्षिण भारतीय परंपरा के मुताबिक गढ़ी गई है, जो इसे उत्तर भारत के बाकी मंदिरों से बिल्कुल अलग पहचान देती है। पुरातत्व विभाग और इतिहासकारों की तरफ से इस मंदिर के स्थापत्य और धार्मिक इतिहास पर अब तक कोई गहरा और विस्तृत शोध नहीं किया गया है, जिसके चलते यह मंदिर आज भी कई रहस्यों के आवरण में छिपा हुआ है। इसके बावजूद, स्थानीय नागरिकों और महंतों की आस्था के मुताबिक यह मंदिर धर्म के साथ-साथ संस्कृति और विरासत के लिहाज से एक अमूल्य थाती है।


















