उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के लरवक गांव में एक बेहद प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पावन स्थल पर भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने मात्र से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। वाराणसी के प्रसिद्ध कर्मदेश्वर महादेव मंदिर से काफी हद तक मेल खाने वाले इस मंदिर की स्थापना और इसके मूल निर्माता के बारे में आज तक कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल पाई है, लेकिन इसके बावजूद यहां हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
सातवीं शताब्दी से जुड़ा है इतिहास
मंदिर के पुजारी नंदलाल गोस्वामी के अनुसार, इस प्राचीन स्थल के निर्माण काल को लेकर कई तरह की लोक कथाएं प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी के दौरान किया गया था। इस मंदिर का सीधा जुड़ाव मां गंगा से माना जाता है और साल 1978 की विनाशकारी बाढ़ के दौरान तो मां गंगा स्वयं भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए मंदिर परिसर तक पहुंच गई थीं।
अद्भुत वास्तुकला और सावन का मेला
नंदलाल गोस्वामी ने बताया कि इस मंदिर की दीवारों और वास्तुकला पर बेहद अद्भुत नक्काशी की गई है। पवित्र सावन महीने के दौरान यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, जहां लोग रुद्राभिषेक के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। सावन के पूरे एक महीने तक यहां एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
औरंगजेब का आक्रमण और नंदी को क्षति
स्थानीय मान्यताओं और मंदिर के पुजारी के बयानों के मुताबिक, इस भव्य मंदिर को नेस्तनाबूद करने के लिए मुगल शासक औरंगजेब खुद यहां आया था। औरंगजेब ने अपनी तलवार से भगवान शिव के वाहन नंदी के सिर को खंडित कर दिया था और इसके अलावा मंदिर के अन्य विग्रहों को भी काफी नुकसान पहुंचाया था। इतिहास के पन्नों में यह भी दर्ज है कि इस मंदिर से लेकर चुनार के किले तक एक गुप्त सुरंग हुआ करती थी।
पुरातत्व विभाग की देखरेख और अपठनीय लिपि
इस मंदिर की दीवारों पर कई जगहों पर ऐसे रहस्यमयी शब्द या अभिलेख उकेरे गए हैं, जिन्हें आज तक कोई भी पढ़ नहीं पाया है। मंदिर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इसे भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित घोषित किया जा चुका है। विभाग की तरफ से मंदिर परिसर में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने पर सख्त रोक लगाई गई है और सुरक्षा के मद्देनजर कर्मचारी हमेशा तैनात रहते हैं। पुरातत्व विभाग के संरक्षणकर्मी आनंद पटेल ने जानकारी दी कि यहां वर्ष 1669 ईस्वी में औरंगजेब के आगमन के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं। यह देश के अति प्राचीन मंदिरों में से एक है और इसके पत्थरों पर खुदी हुई प्राचीन लिपि आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है।



















