रामनगरी अयोध्या में इन दिनों चारों तरफ हर हर महादेव और बम बम भोले के जयकारे गूंज रहे हैं। एक तरफ जहां विभिन्न मठों और मंदिरों में प्रभु श्रीराम की आराधना हो रही है, वहीं दूसरी तरफ शहर के प्राचीन शिवालयों में भी श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त निरंतर जलाभिषेक और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। अयोध्या के इन्हीं प्रमुख स्थलों में सिद्धपीठ श्री नागेश्वरनाथ मंदिर शामिल है, जिसे नगरी का सबसे प्राचीन और सिद्ध शिव मंदिर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सरयू तट पर स्थित इस पावन धाम का संबंध त्रेतायुग और प्रभु राम के परिवार से है।
त्रेतायुग से जुड़ा ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
श्री नागेश्वरनाथ मंदिर अयोध्या की पौराणिक और आध्यात्मिक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। धार्मिक शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के पुत्र महाराज कुश ने कराया था। अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इस मंदिर के दर्शन का विशेष महत्व है। इसे नगरी की शिव उपासना का सबसे मुख्य केंद्र माना जाता है, जहां हर दिन हजारों भक्त शीश नवाते हैं।
सरयू नदी में बाजूबंद गिरने की पौराणिक घटना
नागेश्वरनाथ मंदिर की स्थापना के पीछे एक अत्यंत दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। मंदिर के पुजारी प्रभाकर चतुर्वेदी के अनुसार, त्रेतायुग में एक बार महाराज कुश अयोध्या पहुंचे थे। वे स्वर्गद्वार क्षेत्र में स्थित पवित्र सरयू नदी में स्नान कर रहे थे। उसी दौरान जल की तेज धारा में उनका अनमोल बाजूबंद या कंकण अचानक छूटकर गिर गया।
सरयू नदी की गहराई में गिरा वह बाजूबंद नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदिनी के हाथ लग गया, और उन्होंने उसे अपने पास रख लिया। जब महाराज कुश को पता चला कि उनका बाजूबंद नदी में गिर गया है और उसे नागकन्या ने ले लिया है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। महाराज कुश ने तुरंत धनुष उठाकर नागकन्या पर बाण चलाने का संकल्प ले लिया।
नागराज की प्रार्थना और भगवान शिव का प्रकटीकरण
जब नागराज कुमुद ने देखा कि महाराज कुश अपनी पुत्री पर बाण चलाने जा रहे हैं, तो वे अपनी संतान की रक्षा के लिए भयभीत हो गए। नागराज ने तुरंत भगवान शिव की कठोर तपस्या और आराधना शुरू कर दी। अपने परम भक्त की पुकार सुनकर देवों के देव महादेव स्वयं उस स्थान पर प्रकट हो गए। भगवान शिव ने महाराज कुश से नागकन्या को क्षमा करने और उसे अभयदान देने का अनुरोध किया।
साक्षात भगवान शिव के दर्शन पाते ही महाराज कुश का समस्त क्रोध शांत हो गया। उन्होंने महादेव के वचनों का सम्मान करते हुए नागकन्या कुमुदिनी को क्षमा कर दिया और अपना बाण वापस ले लिया। इसके बाद महाराज कुश ने भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना की। महाराज कुश ने महादेव से प्रार्थना की कि नागों पर विशेष कृपा बरसाने के कारण वे इस पावन स्थान पर सदैव नागेश्वरनाथ के नाम से जाने जाएं। भगवान शिव ने इस प्रार्थना को स्वीकार किया, और तभी से यह मंदिर नागेश्वरनाथ धाम के नाम से पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुआ।
मनोकामना पूर्ति की मान्यताएं और धार्मिक परंपराएं
अयोध्या के स्वर्गद्वार क्षेत्र में सरयू नदी के किनारे स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की अटूट आस्था का प्रतीक है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, जो भी श्रद्धालु यहां आकर सच्चे मन से भगवान नागेश्वरनाथ का जलाभिषेक या रुद्राभिषेक करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसके साथ ही जीवन में आने वाले सभी प्रकार के कष्ट, शारीरिक रोग और मानसिक बाधाएं भी दूर हो जाती हैं।
मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की एक विशेष विशेषता यह है कि यह नागों के आभूषणों से सुसज्जित है। इस पवित्र शिवलिंग को अत्यंत फलदायी और चमत्कारी माना जाता है। वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है, लेकिन सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि तथा अन्य प्रमुख धार्मिक त्योहारों के अवसर पर यहां भक्तों का विशाल जनसैलाब उमड़ता है। अयोध्या की प्राचीन शिव परंपरा को संजोए यह मंदिर प्रभु राम की नगरी का एक महान आध्यात्मिक धरोहर है।



















