हिमाचल प्रदेश की प्राचीन नगरी मंडी में सावन के महीने का आरंभ होते ही धार्मिक रौनक देखने को मिल रही है। निर्मल ब्यास नदी के तट पर बसे इस शहर के प्रमुख शिवालयों में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है और चारों तरफ गूंज रहे मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया है। इस दौरान शहर के प्रसिद्ध मंदिरों जैसे बाबा भूतनाथ, नीलकंठ महादेव, महामृत्युंजय मंदिर और पंचवक्त्र मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो चुका है।
एकादश रुद्र मंदिर में अखंड पाठ
ब्यास नदी के पावन किनारे पर स्थित प्राचीन एकादश रुद्र महादेव मंदिर में सावन मास के अवसर पर विशेष अनुष्ठान का श्रीगणेश किया गया है। यहां भगवान शिव की आराधना के लिए ओम नमो शिवाय का अखंड पाठ आरंभ कर दिया गया है। यह निरंतर चलने वाला जाप पूरे महीनेभर दिन और रात अनवरत रूप से जारी रहेगा, जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
छोटी काशी की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान
राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से हिमाचल प्रदेश का यह जिला बेहद खास माना जाता है। लगभग अस्सी छोटे और बड़े मंदिरों की मौजूदगी के कारण ही इस पूरे क्षेत्र को छोटी काशी के नाम से पुकारा जाता है। यहां का अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव और सावन का पूरा महीना अत्यंत हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। सनातन धर्म में इस पवित्र मास का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि यह समय देवों के देव महादेव को अतिप्रिय माना जाता है।
अनोखा महामृत्युंजय मंदिर
इस पावन नगरी के प्राचीन मंदिरों में महामृत्युंजय मंदिर का विशेष स्थान है। यहां भगवान शिव की प्रतिमा एक अनोखे स्वरूप में कमलासन पर विराजमान है जो दिनभर में पांच बार अपनी मुख मुद्राएं बदलती है। पूरे एशिया महाद्वीप में भगवान शिव का यह इकलौता ऐसा अनोखा मंदिर माना जाता है, जहां काले रंग की यह अद्भुत मूर्ति अत्यंत मनोहारी और आकर्षक प्रतीत होती है।
बाबा भूतनाथ मंदिर और शहर का इतिहास
स्थानीय इतिहास के अनुसार मंडी शहर की स्थापना स्वयं बाबा भूतनाथ मंदिर के निर्माण के बाद ही हुई थी। किंवदंती है कि एक काल में एक ब्राह्मण की गाय रोज जंगल में जाकर एक निश्चित स्थान पर अपना सारा दूध स्वतः गिरा दिया करती थी। एक दिन तत्कालीन राजा अजबर सेन उस ब्राह्मण के साथ उस गाय का पीछा करते हुए उस जगह पहुंचे और उन्होंने स्वयं चमत्कार देखा कि गाय अपनी धार से बाबा भूतनाथ की पिंडी का अभिषेक कर रही थी। इस अलौकिक दृश्य को देखने के बाद राजा ने उसी स्थान पर इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था।



















