धार्मिक नगरी चित्रकूट को भगवान श्रीराम की पावन तपोभूमि के रूप में सर्वत्र जाना जाता है। पौराणिक एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रभु श्रीराम ने अपने 14 वर्षों के वनवास काल में से लगभग साढ़े ग्यारह वर्ष का समय इसी पावन क्षेत्र में व्यतीत किया था। इस दौरान माता सीता और श्री लक्ष्मण जी भी उनके साथ चित्रकूट में निवास करते थे। यही कारण है कि चित्रकूट के प्रत्येक क्षेत्र और कण कण में रामायण काल की स्मृतियां समाहित हैं। इसी पावन धारा पर मंदाकिनी नदी के तट पर जानकी कुंड अवस्थित है, जहां आज भी प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु माता सीता के पावन चरण चिह्नों के दर्शन करने और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं।
मंदाकिनी तट पर अंकित माता सीता के चरण चिह्न
मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित जानकी कुंड को सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र स्थल का दर्जा प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वनवास के दौरान माता जानकी इसी कुंड के निर्मल जल में नित्य स्नान करती थीं। जनश्रुति एवं धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि माता सीता के चरण इतने अति कोमल थे कि उनके पदचिह्न वहां की कठोर शिलाओं पर भी सदा के लिए अंकित हो गए। वर्तमान समय में भी यहां आने वाले श्रद्धालु सबसे पहले शिला पर उभरे माता सीता के इन दिव्य चरण चिह्नों के दर्शन करते हैं। इसके उपरांत वे मंदाकिनी नदी के जल का आचमन कर विधि विधानपूर्वक पूजा अर्चना संपन्न करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।
हवन कुंड का निर्माण और गायत्री मंत्र का पावन जाप
जानकी कुंड की धार्मिक पृष्ठभूमि और गतिविधियों के विषय में पुजारी राम अवतार ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि वनवास काल के दौरान स्नान ध्यान के पश्चात माता सीता यहां नियमित रूप से देव पूजन और हवन कार्य करती थीं। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपने पावन कर कमलों से स्वयं यहां एक विशेष हवन कुंड का निर्माण किया था। स्नान के उपरांत माता सीता इसी निर्मित हवन कुंड के समक्ष बैठकर गायत्री मंत्र का निरंतर जाप करते हुए आहुतियां देती थीं और हवन संपन्न करती थीं। इस स्थल पर बनी हवन की वेदी आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष श्रद्धा और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
श्रृंगार स्थल की परंपरा और जानकी कुंड का नामकरण
स्नान तथा पूजा हवन की प्रक्रिया पूरी करने के पश्चात माता सीता जानकी कुंड के समीप बैठकर अपना श्रृंगार करती थीं। इस ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा के कारण ही कुंड के पास स्थित एक विशेष स्थान को माता सीता के श्रृंगार स्थल के नाम से मान्यता प्राप्त है। विशेष रूप से महिला श्रद्धालु यहां पहुंचकर अखंड सौभाग्य और सुखमय जीवन की प्रार्थना करते हुए विशेष पूजन करती हैं। प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साढ़े ग्यारह वर्षों के लंबे प्रवास के दौरान माता जानकी ने अनगिनत बार इस स्थान पर स्नान एवं पूजन किया। माता जानकी के नाम से जुड़ने के कारण ही इस पवित्र जल कुंड का नाम जानकी कुंड प्रसिद्ध हुआ।



















