भाई और बहन के पवित्र रिश्ते के प्रतीक रक्षाबंधन के पर्व से पहले देश के कई हिस्सों में अनूठी परंपराएं निभाई जाती हैं। राजस्थान के जालोर जिले में इन दिनों एक ऐसी ही लोक परंपरा का विशेष महत्व है, जहां बहनें अपने भाई की अच्छी सेहत, लंबी उम्र और खुशहाली के लिए खास उपवास रखती हैं। इस पारंपरिक अनुष्ठान को वीर फूली का व्रत कहा जाता है। साल में केवल एक बार आने वाला यह व्रत रक्षाबंधन से ठीक पहले पड़ने वाले किसी भी रविवार या मंगलवार को किया जाता है। इस बार रक्षाबंधन से पहले मंगलवार का दिन आने के कारण महिलाओं ने विधि-विधान के साथ इस व्रत को पूरा किया है।
सालों से चली आ रही है अनूठी परंपरा
इस व्रत की गहराई और महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महिलाएं इसे पूरी निष्ठा के साथ वर्षों से निभाती आ रही हैं। इस व्रत को पिछले 50 वर्षों से लगातार करती आ रही संतोष देवी ने बताया कि यह उपवास हर साल रक्षाबंधन से पहले रविवार या मंगलवार के दिन रखा जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की रक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। दिनभर के उपवास के बाद शाम के समय सभी महिलाएं एकत्र होकर व्रत की कथा सुनती हैं। कथा के दौरान गेहूं के दानों की मदद से विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाई जाती हैं। कथा का वाचन समाप्त होने के बाद महिलाएं उस कथा में उपयोग किए गए गेहूं में से थोड़ा-थोड़ा हिस्सा अपने साथ अपने घर लेकर लौटती हैं।
तवे पर गेहूं सेंकने की खास रस्म
घर लौटने के बाद इस व्रत की सबसे महत्वपूर्ण और दिलचस्प रस्म शुरू होती है। महिलाएं चूल्हे पर तवा गर्म करती हैं और कथा के दौरान साथ लाई गईं गेहूं की दानों को उस पर सेंकती हैं। इस दौरान एक विशेष पारंपरिक कहावत बोली जाती है, जिसके बोल हैं, फूली सेकूं धाणी सेकूं, मारे विरा री वेरी सेकूं। इस कहावत और प्रक्रिया के पीछे गहरा भाव यह होता है कि भाई के जीवन में आने वाले सभी संकटों और शत्रुओं को इन गेहूं के दानों की तरह ही तवे पर सेंककर नष्ट कर दिया जाए, ताकि उनके भाई को किसी भी प्रकार की हानि न उठानी पड़े।
आधुनिक दौर में भी जीवित है लोक संस्कृति
आज के आधुनिक और बदलते दौर में भले ही त्योहारों को मनाने के तरीके काफी बदल गए हों, लेकिन जालोर की महिलाओं ने अपनी पुरानी सांस्कृतिक जड़ों को आज भी मजबूती से थाम रखा है। वीर फूली व्रत इस बात का प्रमाण है कि लोक परंपराएं किस तरह पीढ़ियों से चली आ रही हैं। रक्षाबंधन से पहले निभाई जाने वाली यह अनूठी रस्म भाई और बहन के रिश्ते में मौजूद अटूट स्नेह, गहरे विश्वास और सुरक्षा के उस भाव को जीवंत करती है, जो हर विपरीत परिस्थिति में भाई की ढाल बनकर खड़ा रहता है।



















