राजस्थान के बीकानेर शहर के गंगाशहर इलाके में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ है। यहां की नई लाइन निवासी श्रद्धालु अनिता नाहटा ने लगातार अठ्ठाइस दिनों तक बिना खाए-पिए कठिन मासखमण तपस्या को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इस लंबी साधना के पूर्ण होने पर जैन संस्कार विधि के तहत पूरे विधि-विधान और मांगलिक मंत्रों के बीच उनका पारणा कराया गया। इस दौरान वहां मौजूद समाज के लोगों ने तपस्विनी के मजबूत हौसले, संयम और अदम्य इच्छाशक्ति की खुलकर सराहना की तथा उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामनाएं दीं।
मासखमण तप और जैन संस्कार विधि
जैन संस्कार विधि के प्रमुख प्रतिनिधि धर्मेंद्र डाकलिया ने अनिता नाहटा का पारणा कराते हुए अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि लगभग एक महीने तक बिना अन्न के रहना किसी सामान्य व्यक्ति के लिए बहुत बड़ी चुनौती है और यह मजबूत मनोबल, स्वादेंद्रिय पर नियंत्रण तथा अटूट संकल्प शक्ति का बेजोड़ उदाहरण है। आज के दौर में कुछ समय के लिए भी भोजन से दूर रहना कठिन माना जाता है, ऐसे में इतने लंबे समय तक उपवास रखना बहुत बड़ी साधना है। उन्होंने बताया कि जैन परंपरा में तपस्या को आत्मा को पवित्र करने का मुख्य जरिया माना गया है। इसके जरिए इंसान अपने पुराने कर्मों को कम करने की दिशा में आगे बढ़ता है। धर्मेंद्र डाकलिया ने मंत्रोच्चार के साथ इस पूरी साधना को पूरा कराया।
मंगल भावना यंत्र और दैनिक जीवन के संकल्प
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जैन संस्कार विधि को आचार्य तुलसी का बड़ा योगदान बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि यह पद्धति सादगी, अहिंसा और बिना किसी दिखावे के धार्मिक कार्यक्रम करने का संदेश देती है। इस मौके पर समाज के लोगों से आग्रह किया गया कि वे अपने धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में इसी सरल पद्धति को अपनाएं। कार्यक्रम के दौरान सहयोगी संस्कारक देवेंद्र डागा और विपिन बोथरा ने मिलकर मंगल भावना यंत्र की विधि पूरी कराई। इसके साथ ही उन्होंने तपस्या पूरी करने वाली अनिता नाहटा को पारणे के बाद सेहत का ख्याल रखने और दैनिक जीवन में ध्यान देने योग्य जरूरी बातों की जानकारी दी तथा उनसे आवश्यक संकल्प भी कराए।
साधना के दौरान नियमित धार्मिक गतिविधियां
तपस्या के दौरान बरती गई सावधानियों के बारे में जानकारी देते हुए रश्मि दसानी ने बताया कि अनिता नाहटा ने इन अट्ठाइस दिनों के दौरान केवल दिन में यानी सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही सीमित मात्रा में उबले हुए पानी का सेवन किया था। इसके अलावा रोशन नाहटा और कीर्ति नाहटा ने साझा किया कि इस कठिन उपवास के दिनों में उन्होंने लगातार सामायिक, जाप, स्वाध्याय, धर्म-ध्यान और प्रवचन सुनने का काम जारी रखा। इससे उनकी साधना में कोई रुकावट नहीं आई और उनके भाव पूरी तरह निर्मल बने रहे।
साधु-साध्वियों की प्रेरणा और भक्तिमय माहौल
इस बारे में शीलम और भावना ने बताया कि देव, गुरु और धर्म के आशीर्वाद के साथ-साथ गंगाशहर में मौजूद साधु-साध्वियों की नियमित प्रेरणा और दर्शन लाभ की वजह से यह कठिन उपवास आसानी से पूरा हो सका। पूरे आयोजन के दौरान धर्मेंद्र डाकलिया, देवेंद्र डागा और विपिन बोथरा ने कई जैन धार्मिक मंत्रों और आध्यात्मिक गीतों का गान किया जिससे पूरा माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया। अंत में धर्मेंद्र डाकलिया ने वहां मौजूद सभी लोगों से अपनी क्षमता के अनुसार छोटे या बड़े धार्मिक त्याग करने का संकल्प लेने की अपील की।



















