दक्षिण अमेरिका के घने वर्षावनों से घिरे अमेजन बेसिन में हर भोर होते ही कुदरत का एक अनूठा दृश्य उभरता है। हजारों की तादाद में रंग-बिरंगे तोते, मैकाओ और पैराकीट्स नदियों के बहाव से कटी मिट्टी की खड़ी चट्टानों पर मंडराने लगते हैं। कुछ ही देर में यह पूरा तट पक्षियों की चहचहाहट और पंखों के रंगों से सराबोर हो जाता है, जहां ये पक्षी चट्टान की सतह से मिट्टी खुरचते और बड़े चाव से चाटते दिखाई देते हैं। इस अजूबे को अपनी आंखों से देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक और वन्यजीव वैज्ञानिक खिंचे चले आते हैं। शाकाहारी जीवन जीने वाले और पेड़ों के फल-बीज पर निर्भर रहने वाले इन परिंदों को मिट्टी में ऐसा क्या मिल जाता है, यह सवाल लंबे समय तक प्रकृति प्रेमियों के लिए एक अनसुलझी पहेली बना रहा।
प्रकृति की पुरानी आदत और जियोफैगिया का विज्ञान
जानवरों और पक्षियों का जमीन से मिट्टी, कंकड़ या खनिजों को खाना कोई नई परिघटना नहीं है। आधुनिक जीव विज्ञान में इस आदत को जियोफैगिया कहा जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो ईसा पश्चात दूसरी सदी में मशहूर यूनानी चिकित्सक गैलेन ने भी इस व्यवहार का उल्लेख किया था। उन्होंने पाया था कि घायल अथवा अस्वस्थ जंगली जीव अपनी सेहत सुधारने के लिए स्वेच्छा से मिट्टी का सेवन करते हैं। अमेजन के विशाल जंगलों में तोतों की विभिन्न प्रजातियां अनगिनत पीढ़ियों से इस दिनचर्या को दोहराती आ रही हैं, जिसके कारण इस रहस्य पर कई तरह के वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामने आए।
पाचन से जुड़ी पुरानी धारणाओं का खारिज होना
शुरुआती दशकों में शोधकर्ताओं का अनुमान था कि तोते शायद भोजन पचाने के लिए कंकड़-पत्थर निगलते हैं। आमतौर पर कई पक्षी अपने पेट में भोजन को पीसने के लिए छोटे पत्थर खाते हैं, जिसे गैस्ट्रोलिथ कहा जाता है। कुछ का यह भी मानना था कि पक्षी भूख मिटाने के लिए ऐसा करते होंगे। हालांकि, गहन परीक्षणों के बाद यह विचार टिक नहीं सका। तोतों की घुमावदार और बेहद मजबूत चोंच प्रकृति का ऐसा औजार है, जो कड़े से कड़े अखरोट और सख्त बीजों को भी पलक झपकते तोड़ डालती है। जब पक्षी अपने भोजन को चबाने और तोड़ने में खुद सक्षम हैं, तो पेट में कंकड़ से भोजन पीसने वाली थ्योरी पूरी तरह आधारहीन साबित हो गई।
जहर को बेअसर करने की सुरक्षात्मक ढाल
साल 2000 के आसपास वैज्ञानिक जेम्स गिलार्डी ने इस पहेली को सुलझाने के लिए एक नया नजरिया पेश किया, जिसे डिटॉक्सिफिकेशन थ्योरी कहा गया। अमेजन के जंगलों में फलने-फूलने वाले पेड़-पौधे अपने बीजों को असमय खाए जाने से बचाने के लिए उनमें जहरीले रसायन भर देते हैं। जब तोते इन कच्चे फलों और बीजों को खाते हैं, तो उनके शरीर में स्ट्रिकनिन, क्विनिन और टैनिन जैसे तीखे और खतरनाक टॉक्सिन पहुंच जाते हैं। जेम्स गिलार्डी के अध्ययन के अनुसार, नदी तट की मिट्टी में अत्यंत सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं। यह चिकनी मिट्टी पक्षियों की आंतों में पहुंचते ही एक सुरक्षात्मक आवरण तैयार कर देती है। मिट्टी के ये कण जहरीले रसायनों से चिपक जाते हैं और उन्हें खून में अवशोषित होने से रोक देते हैं, जिससे जहर का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
प्रयोगशाला के परीक्षणों में पुख्ता हुए परिणाम
वैज्ञानिकों ने जेम्स गिलार्डी की इस परिकल्पना को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रयोगशाला में कई कड़े प्रयोग किए। एक प्रयोग के तहत समुद्री झींगों को जहरीले बीजों के सत्व वाले पानी में रखा गया, जहां वे टॉक्सिन के असर से तुरंत मर गए। इसके विपरीत, जब उसी जहरीले घोल में नदी किनारे वाली मिट्टी मिलाई गई, तो विषैले तत्वों का घातक असर 70% तक घट गया और झींगे जीवित बच गए। इसी तरह का परीक्षण जब तोतों पर किया गया, तो नतीजे चौंकाने वाले रहे। जहरीली दवा देने के बाद जिन तोतों को मिट्टी खिलाई गई, उनके खून में विषैले तत्वों की सांद्रता में 60% की भारी गिरावट दर्ज की गई। इसने साफ कर दिया कि मिट्टी वास्तव में एक प्राकृतिक एंटीडोट की तरह काम करती है।
पौधों और पक्षियों का प्राकृतिक संघर्ष
विकासवादी दृष्टिकोण से देखें तो जंगल में पौधों और परिंदों के बीच सदियों से एक जैविक होड़ चल रही है। पौधे चाहते हैं कि उनके बीज पकने के बाद ही दूर तक फैलें, इसलिए वे अपनी रक्षा के लिए उनमें कड़वाहट और घातक जहर भरते हैं। दूसरी तरफ, अमेजन के तोतों ने इस रक्षा प्रणाली को धता बताने का नायाब तरीका ढूंढ लिया। मिट्टी चाटकर जहर को निष्प्रभावी बनाने की कला सीखकर इन पक्षियों ने जंगल के उन विशाल खाद्य भंडारों तक अपनी पहुंच बना ली, जिन्हें छूने की हिम्मत दूसरे जानवर नहीं कर सकते। इस अनुकूलन ने तोतों को जंगल के कड़े मुकाबले में भोजन का एक बड़ा फायदा दिलाया।
नमक और सोडियम की भारी कमी का समाधान
डिटॉक्सिफिकेशन थ्योरी बेहद मजबूत थी, लेकिन इसके बाद भी एक अहम सवाल वैज्ञानिकों को उलझाए रहा। दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय जंगलों में तोते कच्चे फल और जहरीले बीज खाते हैं, लेकिन नियमित तौर पर मिट्टी की चट्टानों पर जमा होने का यह नजारा केवल अमेजन बेसिन में ही इतना व्यापक क्यों है? इस पहेली का उत्तर साल 2017 में सामने आया। शोधकर्ता एलिजाबेथ हॉबसन और डोनाल्ड ब्राइटस्मिथ ने क्षेत्रीय अध्ययन में पाया कि अमेजन की मिट्टी में सोडियम यानी नमक की मात्रा आसपास के सामान्य पौधों की तुलना में 40 गुना अधिक होती है। लगातार होने वाली मूसलाधार बारिश के कारण अमेजन के अंदरूनी इलाकों की जमीन से जरूरी नमक बहकर निकल जाता है, जिससे वहां के शाकाहारी जीवों में सोडियम का भारी संकट पैदा हो जाता है। अतः तोते न केवल जहर से बचने के लिए, बल्कि अपने शरीर में नमक और खनिजों की जीवनरक्षक कमी को पूरा करने के लिए भी हर सुबह इन मिट्टी की दीवारों पर जुटते हैं।


















