पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में पिछले कुछ समय से हालात गंभीर बने हुए हैं, जहां बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों, नागरिकों की मौतों और प्रशासन की सख्त कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चिंता जताई जाने लगी है। इसी कड़ी में ब्रिटेन की संसद के 70 से अधिक सदस्यों ने एकजुट होकर संयुक्त राष्ट्र संघ का दरवाजा खटखटाया है। सांसदों ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को एक औपचारिक पत्र भेजकर पीओके में जारी दमन, मानवाधिकार उल्लोंघनों और संचार नेटवर्क पर लगाई गई पाबंदियों को खत्म कराने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। पत्र में कहा गया है कि आम लोगों के जीवन की रक्षा करने और क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सक्रिय होना बेहद जरूरी है।
पीओके के ताजा घटनाक्रम पर ब्रिटिश सांसदों का कड़ा रुख
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को यह पत्र 21 अगस्त को भेजा गया था। इस कूटनीतिक पहल की मुख्य अगुआई ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड ईस्ट क्षेत्र से लेबर पार्टी के सांसद और कश्मीर पर ऑल-पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप के चेयरमैन इमरान हुसैन ने की। पत्र में 70 से ज्यादा ब्रिटिश सांसदों के हस्ताक्षर शामिल हैं, जिन्होंने पीओके में सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की बिगड़ती स्थिति पर गहरा शोक और चिंता व्यक्त की है। सांसदों ने उल्लेख किया कि ब्रिटेन में रहने वाला एक बड़ा कश्मीरी समुदाय इस हिंसा के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव में है, क्योंकि उन्हें पीओके में रह रहे अपने परिजनों और रिश्तेदारों की सलामती की कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है। प्रशासन द्वारा प्रदर्शनकारियों पर किए जा रहे हमलों, मनमानी गिरफ्तारियों और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोकने से वहां मानवीय संकट गहरा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र से मांगी गई मुख्य राहतें और तात्कालिक कदम
संयुक्त राष्ट्र के समक्ष रखे गए मांग पत्र में ब्रिटिश सांसदों ने महासचिव से अपील की है कि वे अपनी कूटनीतिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए क्षेत्र में जारी खून-खराबे और नागरिक उत्पीड़न को रुकवाएं। सांसदों की ओर से पेश की गई प्रमुख मांगों में शामिल हैं
- इंटरनेट और संचार सेवाओं की तत्काल बहाली: पूरे पीओके क्षेत्र में बंद पड़े टेलीफोन और इंटरनेट नेटवर्क को तुरंत बहाल किया जाए, ताकि नागरिक अपने परिवारों से संपर्क बना सकें और स्थिति में पारदर्शिता बनी रहे।
- मानवीय सहायता और आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति: राशन, खाद्यान्न, आवश्यक दवाओं और जीवन रक्षक चिकित्सा सामग्रियों की आवाजाही पर लगी सभी रोक हटाई जाएं।
- मनमानी गिरफ्तारियों का अंत और कानूनी सहायता: शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के आरोप में हिरासत में लिए गए सभी नागरिकों को तुरंत रिहा किया जाए अथवा उन्हें निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया और वकील की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार पर्यवेक्षकों की तैनाती: स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं और मध्यस्थता करने में सक्षम पर्यवेक्षकों को पीओके में स्थिति का जायजा लेने के लिए निर्बाध प्रवेश दिया जाए।
- अत्यधिक बल प्रयोग की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच: हिंसा के दौरान हुई प्रदर्शनकारियों की मौतों, घायलों और सुरक्षा बलों द्वारा किए गए अत्यधिक बल प्रयोग के मामलों की एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच कराई जाए।
यूएन के हालिया बयानों पर प्रतिक्रिया और निरंतर कार्रवाई का आह्वान
ब्रिटिश जनप्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पीओके की स्थिति पर हाल में जारी किए गए बयानों का स्वागत किया है। उन्होंने विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क के उस बयान का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने, राजनीतिक बातचीत शुरू करने, इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह चालू करने और अभिव्यक्ति की आजादी तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान करने का आग्रह किया था। इसके साथ ही सांसदों ने यूएन महासचिव के उप प्रवक्ता द्वारा दिए गए उस वक्तव्य को भी याद दिलाया, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को नुकसान पहुंचाने वाले दोषियों की जवाबदेही तय करने की बात कही गई थी। हालांकि, सांसदों का कहना है कि सिर्फ मौखिक बयान और औपचारिक अपीलें काफी नहीं हैं, बल्कि धरातल पर शांति लाने के लिए निरंतर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव की जरूरत है।
कश्मीर विवाद, सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 47 और दीर्घकालिक समाधान
पत्र में केवल वर्तमान में जारी हिंसा का ही जिक्र नहीं किया गया, बल्कि कश्मीर के ऐतिहासिक और व्यापक राजनीतिक विवाद की ओर भी संयुक्त राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया गया है। सांसदों का मानना है कि मानवाधिकार किसी भी राजनीतिक एजेंडे से ऊपर हैं और केवल प्रतिबंधों या दमनकारी नीतियों के जरिए दीर्घकालिक शांति हासिल नहीं की जा सकती। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 47 और इसके बाद पारित अन्य संबंधित प्रस्तावों का हवाला देते हुए महासचिव से सवाल किया कि सुरक्षा परिषद और यूएन की अन्य संस्थाएं तनाव को कम करने और सार्थक संवाद शुरू कराने के लिए क्या ठोस कदम उठा रही हैं। सांसदों ने जोर देकर कहा कि कश्मीर के निवासियों को भय, हिंसा और निरंतर बनी रहने वाली अस्थिरता से मुक्त होकर गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है।



















