अमेरिका के नॉनफार्म पेरोल आंकड़ों से पहले सोने की चमक थमी, बाजार की नजरें नीतिगत फैसलों परकुल्लू-मनाली फोरलेन पर हिमाचल पुलिस और आबकारी विभाग का बड़ा एक्शन, पंजाब से लाई जा रही 7200 बीयर बोतलें जब्तमौसम बदलते ही बदलें अपनी खान-पान की आदतें, आयुर्वेद विशेषज्ञ से जानें सही तरीकाभारतीय वायुसेना ने किया खगांतक-243 ग्लाइड बम का सफल परीक्षण, निजी क्षेत्र की भागीदारी से बदला रक्षा उत्पादन का परिदृश्यघर पर बनाएं रेस्टोरेंट जैसा चिकन राइस, जानिए स्वाद बढ़ाने का अनोखा तरीकाजन्माष्टमी व्रत का पारण कब और कैसे करें, जानिए उपवास खोलने के नियम और सही समयएसयूवी बाजार में मैनुअल गियरबॉक्स का जलवा बरकरार, 71 प्रतिशत खरीदार दे रहे हैं पसंदशिक्षक दिवस पर गुरुजनों को भेजें ये शानदार संदेश, इन कोट्स से चहक उठेगा उनका मनऑस्ट्रेलियन डॉलर में तेजी, चार साल के उच्चतम स्तर 0.7280 के करीब पहुंचने की उम्मीदव्हाट्सएप पर शुरू हुई बिल पेमेंट सेवा, अब बिजली और पानी के बिल भरना हुआ आसान
हिमालयी झीलों पर मंडराया संकट, अरुणाचल प्रदेश में GLOF की चेतावनी से बढ़ी चिंताविज्ञान
4 सित॰ 2026, 4:42 pm (19 मिनट पहले)· 2

हिमालयी झीलों पर मंडराया संकट, अरुणाचल प्रदेश में GLOF की चेतावनी से बढ़ी चिंता

अरुणाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से बदलती जलवायु और पिघलते ग्लेशियरों के बीच वैज्ञानिकों ने गंभीर चेतावनी जारी की है। हालिया शोध के अनुसार, राज्य की दर्जनों झीलें खतरनाक रूप ले चुकी हैं, जिससे निचले इलाकों में भारी तबाही का अंदेशा जताया जा रहा है।

हिमालयी श्रृंखलाओं में तेजी से बदलते मौसम और लगातार पिघलती बर्फ के बीच भारत के पहाड़ी राज्यों के लिए एक नया और गंभीर खतरा सामने आया है। ताजा वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित कई जलस्त्रोत अत्यधिक संवेदनशील स्थिति में पहुंच चुके हैं। इन जलाशयों के अप्रत्याशित रूप से फटने की आशंका के चलते ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा मंडराने लगा है। विशेषज्ञों की ओर से किए गए हालिया अध्ययन में राज्य की दो प्रमुख झीलों को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है, जबकि अन्य छत्तीस झीलों को मध्यम खतरे के दायरे में आंका गया है।

सैकड़ों झीलों का व्यापक अध्ययन और जोखिम वर्गीकरण

साइंस जर्नल डिस्कवर हैजार्ड्स में प्रकाशित इस वैज्ञानिक शोध में अरुणाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फैली कुल एक सौ सत्ताईस झीलों के GLOF जोखिम का बारीकी से विश्लेषण किया गया। इस विस्तृत मूल्यांकन के बाद नवासी झीलों को न्यूनतम जोखिम वाली श्रेणी में जगह मिली, जो फिलहाल सुरक्षित मानी जा रही हैं। इसके विपरीत, छत्तीस जलाशयों को मध्यम श्रेणी में और दो जलसंसाधनों को सर्वोच्च जोखिम वाली सूची में दर्ज किया गया है।

ये भी पढ़ें

शोध रिपोर्ट के अनुसार, मध्यम और उच्च श्रेणी के खतरे वाली अधिकांश झीलें अपर दिबांग वैली, पश्चिम कामेंग और तवांग जैसे संवेदनशील भौगोलिक इलाकों में फैली हुई हैं। यह स्थिति इसलिए भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि इन दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली नदियां आगे चलकर घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों से गुजरती हैं। इसके अलावा, इन नदी मार्गों पर कई महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाएं और अन्य बुनियादी ढांचागत इकाइयां भी स्थापित हैं, जो किसी भी आपदा की स्थिति में सीधे प्रभावित हो सकती हैं।

तीन दशकों में झीलों के क्षेत्रफल और संख्या में भारी इजाफा

उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने वर्ष 1988 से 2020 के बीच के तीस वर्षों के दौरान अरुणाचल प्रदेश की झीलों में आए भौगोलिक बदलावों का गहराई से परीक्षण किया। इन आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि इस लंबी समयावधि के दौरान राज्य में जल भंडारों की कुल संख्या और उनके भू-भाग के दायरे में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।

आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 1988 में पूरे प्रदेश में कुल एक हजार चार सौ सत्तासी झीलों की मैपिंग की गई थी, जिनका कुल क्षेत्रफल सात हजार नौ सौ इक्कीस दशमलव नौ पांच हेक्टेयर था। हालांकि, वर्ष 2020 तक आते-आते इन झीलों की कुल संख्या बढ़कर एक हजार नौ सौ पचासी पर पहुंच गई और इनका कुल क्षेत्रफल ग्यारह हजार एक सौ चौंतीस दशमलव पांच एक हेक्टेयर तक फैल गया। इस प्रकार, तीन दशकों के इस अंतराल में सैकड़ों नई जल संरचनाएं अस्तित्व में आईं और पर्वतीय अंचलों में पानी से आच्छादित भूभाग का दायरा हजारों हेक्टेयर तक बढ़ गया।

नॉन-ग्लेशियल झीलों का सबसे तेज विस्तार

वैज्ञानिक विश्लेषण में यह बात भी सामने आई कि सबसे तीव्र गति से विस्तार उन जल भंडारों में दर्ज किया गया जो सीधे तौर पर ग्लेशियरों से नहीं जुड़े हैं। इस विशेष श्रेणी की झीलों की संख्या में चार सौ सत्तानवे की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि उनका कुल क्षेत्रफल तीन हजार दो सौ बारह दशमलव पांच छह हेक्टेयर बढ़ गया। वहीं, हिमनदों के ठीक पास स्थित प्रोग्लेशियल झीलों की संख्या चौबीस से घटकर बाईस जरूर रह गई, लेकिन उनका कुल क्षेत्रफल एक सौ दस दशमलव सात दो हेक्टेयर से बढ़कर वर्ष 2020 तक एक सौ पच्चीस दशमलव नौ तीन हेक्टेयर हो गया।

दूसरी तरफ, ग्लेशियरों से प्रत्यक्ष रूप से न जुड़ी हुई अन्य ग्लेशियल झीलों की संख्या एक सौ छत्तीस से बढ़कर दो सौ पांच तक पहुंच गई, हालांकि इस वर्ग के जलाशयों का कुल क्षेत्रफल मामूली रूप से कम दर्ज किया गया। इन तमाम बदलावों ने पर्यावरणविदों की चिंता को और अधिक बढ़ा दिया है।

चार से पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर सबसे बड़े बदलाव

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में रेखांकित किया कि अधिकतर नई जल संरचनाएं समुद्र तल से चार हजार से पांच हजार मीटर की अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पनप रही हैं। यह भौगोलिक परिदृश्य पूर्वी हिमालय के सबसे ऊंचे और नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र में तेजी से हो रहे पर्यावरणीय परिवर्तनों की तरफ स्पष्ट संकेत करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं और पिघलती हुई बर्फ के कारण नए जलाशयों का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही कई पुराने जल स्रोतों का आकार भी लगातार विक्सित हो रहा है, जो आने वाले समय में बड़ी आपदाओं के लिए जमीन तैयार कर रहा है।

क्या होती है GLOF की विनाशकारी घटना?

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड उस आपदा को कहा जाता है जब किसी ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र या हिमनद के पास बनी झील का पानी किसी कारणवश अचानक बहुत बड़ी मात्रा में बाहर निकल जाता है। ऐसी स्थिति तब बनती है जब पानी को रोक कर रखने वाला प्राकृतिक मलबा या चट्टानों का बांध कमजोर होकर अचानक टूट जाता है। इसके परिणामस्वरूप पानी का एक भयंकर सैलाब नीचे की ओर दौड़ पड़ता है।

इस जलप्रलय के दौरान केवल पानी ही नहीं बहता, बल्कि अपने साथ भारी मात्रा में चट्टानें, बर्फ, कीचड़ और मलबा भी तेज रफ्तार से नीचे की घाटियों में तबाही मचाते हुए बढ़ता है। यह तूफानी बहाव नदी के पारंपरिक मार्ग को पूरी तरह बदल सकता है और निचले बस्तियों में अचानक जलस्तर को खतरनाक स्तर तक बढ़ा देता है।

ब्रह्मपुत्र बेसिन तक पहुंच सकता है आपदा का असर

इस वैज्ञानिक अध्ययन में यह चेतावनी भी दी गई है कि अरुणाचल प्रदेश के इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों से निकलने वाली जलधाराएं आगे चलकर विशाल ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती हैं। ऐसे में यदि किसी ऊपरी झील से अचानक भारी मात्रा में पानी बाहर निकलता है, तो उसका घातक प्रभाव केवल तात्कालिक पर्वतीय इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा।

विशाल जलराशि के साथ बहकर आने वाला मलबा और तलछट नदियों के बहाव के साथ बहुत दूर तक सफर तय कर सकते हैं। इसके कारण नदी के तल में भारी बदलाव आ सकता है, बड़े पैमाने पर सिल्ट जमा हो सकती है और निचले मैदानी इलाकों में बाढ़ का संकट कई गुना अधिक गंभीर हो सकता है।

खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

इस शोध से जुड़े कॉटन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ नबाजित हजारिका का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश या उसके निचले मैदानी क्षेत्रों में नेपाल जैसी अत्यंत भीषण तबाही की आशंका थोड़ी कम हो सकती है, क्योंकि पहचानी गई उच्च जोखिम वाली अधिकांश झीलें मानव बस्तियों से काफी अधिक दूरी पर स्थित हैं।

लेकिन उन्होंने इस बात पर भी कड़ा जोर दिया कि केवल झील और आबादी के बीच की भौतिक दूरी को देखकर ही खतरे का पूर्ण आकलन नहीं किया जा सकता है। असल और बड़ा सवाल यह है कि जलाशय के फटने के बाद पानी, कीचड़ और तलछट बहकर कितनी दूर तक मार करते हैं और संकरी घाटियों में फैलकर कितना व्यापक नुकसान पहुंचाते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि नीचे की तरफ बसे इलाकों में अचानक जलस्तर बढ़ने का गंभीर संकट हमेशा बना रह सकता है।

सतर्कता और आधुनिक तकनीकों की सख्त जरूरत

वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में मौजूद सभी संभावित खतरनाक झीलों की कोई अंतिम या पूर्ण सूची नहीं है। इसके अलावा भी कई ऐसे अनछुए जलाशय हो सकते हैं जिनका विस्तृत जोखिम मूल्यांकन अभी तक नहीं किया गया है।

इसी वजह से अध्ययन में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि संवेदनशील पर्वतीय इलाकों में लगातार निगरानी रखी जानी चाहिए, समय-समय पर नए सिरे से जोखिम का आकलन होना चाहिए और आधुनिक सैटेलाइट डेटा का भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जानकारों का सुझाव है कि अति संवेदनशील क्षेत्रों में शीघ्र चेतावनी प्रणालियों की स्थापना, स्थानीय निवासियों को जागरूक करना और जलविद्युत परियोजनाओं समेत तमाम महत्वपूर्ण ढांचों को सुरक्षित रखना अब बेहद अनिवार्य हो गया है ताकि किसी भी संभावित अनहोनी से समय रहते निपटा जा सके।

सवाल-जवाब

अरुणाचल प्रदेश में कितनी झीलों का अध्ययन किया गया है?
वैज्ञानिक अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश की कुल 127 ऊंचाई वाली झीलों का आकलन किया गया है।
कितनी झीलों को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है?
इस अध्ययन में राज्य की दो झीलों को हाई रिस्क श्रेणी में और 36 झीलों को मध्यम जोखिम वाला बताया गया है।
यह अध्ययन किस समयावधि के सैटेलाइट डेटा पर आधारित है?
यह वैज्ञानिक अध्ययन 1988 से 2020 के बीच के तीन दशकों के सैटेलाइट आंकड़ों पर आधारित है।
मध्यम और उच्च जोखिम वाली झीलें मुख्य रूप से कहां स्थित हैं?
ये झीलें मुख्य रूप से अपर दिबांग वैली, पश्चिम कामेंग और तवांग जैसे पर्वतीय इलाकों में स्थित हैं।
GLOF का पूरा मतलब क्या है?
GLOF का मतलब ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड है, जो ग्लेशियर झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ को कहा जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR