धरती के महासागरों की सबसे गहरी और अंधेरी परतों में जीवन के ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनसे इंसान आज भी लगभग अनजान है। प्रशांत महासागर के सुदूर इलाके में हाल ही में की गई वैज्ञानिक पड़ताल में एक ऐसा विशाल जैविक संसार सामने आया है जिसने शोधकर्ताओं को चकित कर दिया है। मैक्सिको और हवाई के मध्य फैले क्लेरियन-क्लिपर्टन ज़ोन में समुद्र तल की पड़ताल करते हुए वैज्ञानिकों ने 11,662 नए वायरल समूहों को दर्ज किया है। लगभग 6,000 मीटर तक की गहराई में सूरज की रोशनी की गैरमौजूदगी के बावजूद यह सूक्ष्म जीवन फल-फूल रहा है।
वैश्विक डेटाबेस से मेल नहीं खाती आनुवंशिक संरचना
चोंगकिंग यूनिवर्सिटी के शोध दल ने समुद्र के तल से 60 से ज्यादा सीबेड नमूने जुटाकर उनका प्रयोगशाला में गहन विश्लेषण किया। इन नमूनों के अध्ययन से पता चला कि यहां मिले वायरसों में से 99 प्रतिशत से अधिक ऐसे हैं जिन्हें पहले कभी देखा या समझा नहीं गया। जब इन वायरसों के प्रोटीन समूहों की तुलना दुनिया भर के मौजूदा वैज्ञानिक डेटाबेस से की गई, तो केवल लगभग 4 प्रतिशत प्रोटीन समूहों का ही मिलान हो सका। इस बड़े अंतर के चलते ही वैज्ञानिक इन्हें एलियन वायरस जैसी संज्ञा दे रहे हैं, क्योंकि इनका आनुवंशिक ढांचा मुख्यधारा के जैविक रिकॉर्ड से पूरी तरह अलग नजर आता है।
बैटरी धातुओं की चट्टानें और खनन से जुड़ा संकट
जिस क्लेरियन-क्लिपर्टन ज़ोन में ये सूक्ष्मजीव मिले हैं, वह इलाका व्यावसायिक दृष्टि से भी पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस समुद्री तलहटी पर आलू के आकार की लाखों चट्टानें बिखरी पड़ी हैं, जिन्हें पॉलीमेटैलिक नोड्यूल कहा जाता है। इन चट्टानों में निकल, कोबाल्ट और मैंगनीज जैसी बहुमूल्य धातुओं का विशाल भंडार मौजूद है, जिनकी भारी मांग इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी बनाने के लिए की जा रही है। खनिज कंपनियों की नजरें इस क्षेत्र में गहरे समुद्र में खनन शुरू करने पर टिकी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इस समुद्री तल पर बड़े पैमाने पर मशीनें चलाई गईं, तो वहां की प्राचीन मिट्टी उखड़ जाएगी, जिससे इन अज्ञात वायरसों और उनसे जुड़े पूरे सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन और इंसानी सेहत पर असर
आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इतनी बड़ी संख्या में मिले अनजान वायरस मानव स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा बन सकते हैं। वैज्ञानिक जांच के मुताबिक, फिलहाल इन वायरसों से इंसानों को किसी भी तरह के सीधे नुकसान का कोई प्रमाण नहीं मिला है। इसके विपरीत, गहरे समुद्र के पर्यावरण को जीवंत रखने में इन वायरसों की भूमिका असाधारण मानी जा रही है। ये वायरस वहां मौजूद अन्य सूक्ष्मजीवों की संख्या को नियंत्रित करने का काम करते हैं। इसके अलावा कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और सल्फर के प्राकृतिक चक्र को सुचारू बनाए रखने में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रहती है। इनमें से कुछ वायरस ऐसे विशेष जीन से लैस पाए गए हैं, जो सूक्ष्म जीवों को उस अत्यधिक दबाव और भीषण ठंड वाले कठोर वातावरण में जीवित रहने में मदद करते हैं। यह पड़ताल साबित करती है कि महासागरों के गहरे कोने अभी भी जैव विविधता के अनसुलझे रहस्यों से भरे पड़े हैं।



















