पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के जलक्षेत्र में असामान्य रूप से गहराता ताप इस वर्ष दुनिया भर के वायुमंडलीय संतुलन को हिला रहा है। हर कुछ वर्षों के अंतराल पर उभरने वाली अल नीनो की यह मौसमी प्रणाली इस बार अपने तमाम ऐतिहासिक चरम स्तरों को पार करती दिख रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र की यह उफनती गर्मी महज एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि इसका असर समूची पृथ्वी की आबोहवा पर एक बड़ी जंजीर की तरह पड़ता है। जैसे ही प्रशांत महासागर का विशाल जल भंडार भारी मात्रा में गर्मी छोड़ता है, वायुमंडल में तेज उथल-पुथल शुरू हो जाती है, जिससे विभिन्न महाद्वीपों में स्थापित मौसमी चक्र अचानक बिगड़ने लगते हैं।
प्रशांत महासागर में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और अनुमान
अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन के अनुमानों के मुताबिक, दिसंबर के अंत तक इस अल नीनो के प्रचंड बने रहने की संभावना पूरी 100 प्रतिशत है। इतना ही नहीं, एजेंसी का गणित यह भी बताता है कि फरवरी तक इसके अत्यधिक तीव्र बने रहने के आसार 80 प्रतिशत से अधिक हैं। उपलब्ध आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि इस चक्र ने समुद्र की दैनिक गर्मी के मामले में पहले ही कई कीर्तिमान तोड़ दिए हैं, जहां हाल ही में तापमान का अंतर 3.4 डिग्री सेल्सियस के शिखर तक दर्ज किया गया।
अमेरिकी एजेंसी अपने निष्कर्षों को तीन महीने के गतिशील औसत के आधार पर तैयार करती है। उसके अनुमान दर्शाते हैं कि अक्टूबर से दिसंबर की अवधि के दौरान तापमान सामान्य से 2.7 डिग्री सेल्सियस अधिक रह सकता है, जबकि कुछ स्थितियों में इसके 3 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर निकल जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि आने वाले महीनों में यह रुझान बरकरार रहा, तो यह 1982-1983 के चक्र में बने 2.4 डिग्री सेल्सियस के पुराने उच्चतम स्तर को काफी पीछे छोड़ देगा।
ग्लोबल वार्मिंग और अल नीनो का जटिल तालमेल
मौसम विज्ञान जगत के सामने अब सबसे गंभीर सवाल यह खड़ा हुआ है कि जीवाश्म ईंधन जलाने से गर्म होती धरती इस समुद्री बदलाव को किस तरह प्रभावित कर रही है। इंडियाना यूनिवर्सिटी से जुड़े जलवायु शोधकर्ता क्रिस्टोफर कैलाहन का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सीधी प्रतिक्रिया देने के बजाय कई गहरे वैज्ञानिक सवाल उठते हैं, जिनके जवाब तलाशना बाकी है। यह संबंध इस समय शोध का एक प्रमुख विषय बना हुआ है, और मौजूदा दौर का यह समुद्री तूफान विज्ञान को नए सुराग दे सकता है।
मेक्सिको के राष्ट्रीय स्वायत्त विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन अनुसंधान कार्यक्रम के समन्वयक फ्रांसिस्को एस्ट्राडा का आकलन है कि पिछले 60 वर्षों में इस चक्र की तीव्रता, पुनरावृत्ति और दुनिया भर में इसके फैलाव के तरीके में साफ बदलाव आया है। उनके मुताबिक, इसे प्राकृतिक अल नीनो बनाम जलवायु परिवर्तन जनित घटना के रूप में बांटने के बजाय दोनों के आपसी घालमेल के रूप में देखा जाना चाहिए। एस्ट्राडा के शब्दों में, "आप अल नीनो को ग्लोबल वार्मिंग से अलग नहीं कर सकते, वे अटूट रूप से जुड़े हुए हैं।"
विभिन्न कंप्यूटर सिमुलेशन यह संकेत दे रहे हैं कि धरती का तापमान बढ़ने के साथ यह मौसमी उभार और अधिक उग्र हो सकता है। यद्यपि कई मॉडलिंग प्रणालियों को पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में लंबी अवधि के तापीय रुझानों को सटीक रूप से पकड़ने में मुश्किलें आती हैं, फिर भी व्यापक ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात की गवाही देते हैं कि गर्म होती दुनिया में इसकी शक्ति बढ़ रही है। कैलाहन ने रेखांकित किया है, "अधिकांश जलवायु मॉडल कहते हैं कि गर्म होती जलवायु में अल नीनो का आयाम बढ़ना चाहिए।"
अगस्त के महीने में सामने आए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने प्राचीन मूंगों से जुटाए गए आंकड़ों के जरिए पिछली एक सहस्राब्दी की स्थिति का विश्लेषण किया। इस पड़ताल में सामने आया कि अल नीनो के फैलाव और तीव्रता में जो हालिया तेजी आई है, उसका कालखंड ठीक उसी दौर से मेल खाता है जब इंसानों ने हवा में ग्रीनहाउस गैसों की भारी मात्रा छोड़ना शुरू किया था। हालांकि अध्ययनकर्ताओं ने उस बदलाव को सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग के मत्थे मढ़ने से परहेज किया, लेकिन इस वर्ष दर्ज हो रहे आंकड़े अनुसंधानकर्ताओं को दोनों कड़ियों को जोड़ने में काफी मदद करेंगे।
बदलते वायुमंडलीय संपर्कों का बढ़ता दायरा
इस पूरे परिदृश्य का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अल नीनो किस तरह पहले से गर्म हो चुकी दुनिया के संकट को कई गुना बढ़ा रहा है। कैलाहन का कहना है कि भले ही समुद्र की सतह पर मौजूद तापीय विसंगतियां पूरी तरह प्राकृतिक हों, लेकिन जब वे मानव-निर्मित ग्लोबल वार्मिंग से तप रहे वायुमंडल के संपर्क में आती हैं, तो उनके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं।
मौसम विज्ञान में टेलीकनेक्शन के नाम से पहचानी जाने वाली दूरगामी कड़ियां पहले से भली-भांति दर्ज हैं। इनके चलते अमेज़न के जंगलों और इंडोनेशिया के द्वीपों में भीषण सूखे का खतरा मंडराने लगता है, अमेरिकी दक्षिण-पश्चिम में अत्यधिक बारिश दर्ज की जाती है, जबकि अटलांटिक महासागर में उठने वाले तूफानों की आवृत्ति धीमी पड़ जाती है। लेकिन जब एक प्रचंड अल नीनो गर्म हो चुकी धरती के ऊपर सक्रिय होता है, तो ये स्थापित पैटर्न अप्रत्याशित रूप से उग्र हो जाते हैं। एस्ट्राडा ने आगाह करते हुए कहा है, "ग्रह के विभिन्न हिस्सों में मौसम और जलवायु के रूप में अल नीनो कैसे प्रकट होता है, उस ऐतिहासिक डेटा पर अब हम उतना भरोसा नहीं कर सकते।"
मानव समाज, अर्थव्यवस्था और कोरल रीफ पर मंडराता खतरा
जोखिम प्रबंधन के जानकारों के लिए सबसे बड़ी चिंता केवल इस चक्र की रिकॉर्ड गर्मी नहीं है, बल्कि इसका एक गंभीर रूप से गर्म हो चुके ग्रह से टकराना है। एस्ट्राडा का तर्क है कि जब आप आपदा से निपटने की तैयारी कर रहे होते हैं, तो अप्रत्याशित झटके सबसे खतरनाक साबित होते हैं।
कैलाहन के आर्थिक व पर्यावरणीय विश्लेषण बताते हैं कि ऐसे चरम चक्र मानव बस्तियों और आजीविका को भारी चोट पहुंचाते हैं। पूर्व के अत्यधिक तीव्र घटनाक्रमों ने वैश्विक जीडीपी को खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाया है। प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र भी इसकी मार से अछूते नहीं रहते, विशेष रूप से समुद्र के भीतर पाए जाने वाले कोरल रीफ, जो बड़े पैमाने पर ब्लीचिंग और विनाश का सामना कर रहे हैं।
बिगड़ती परिस्थितियों को भांपते हुए संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक संगठनों ने संकटग्रस्त आबादी और संवेदनशील पर्यावरण को बचाने के लिए तुरंत अनुकूलन कदम उठाने का आह्वान किया है। कैलिफोर्निया जैसे क्षेत्रों ने पहले ही एहतियाती तौर पर पिछले महीने आपातकाल घोषित कर दिया है। पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने आगाह करते हुए कहा था, "अल नीनो की स्थितियां तपती दुनिया की आग में घी डालने का काम करेंगी।" दुनिया भर के नीति-निर्माताओं के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इस दोहरी मार से अपने बुनियादी ढांचे, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रणालियों को सुरक्षित करने की है।



















