प्रशांत महासागर की सतह पर तापमान में होने वाले असामान्य उछाल ने वैश्विक मौसम तंत्र को हिलाकर रख दिया है। वायुमंडलीय परिस्थितियों में आ रहे तीव्र बदलावों के बीच एक अत्यधिक शक्तिशाली मौसमी परिघटना, जिसे सुपर अल नीनो कहा जाता है, दुनिया के विशाल भूभाग पर गंभीर मानवीय संकट का कारण बन सकती है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, जून 2026 से मार्च 2027 की अवधि के दौरान असामान्य रूप से पड़ने वाली भीषण गर्मी वैश्विक स्तर पर करीब 8.57 लाख लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इस चिंताजनक परिदृश्य में भारत को भी अत्यंत संवेदनशील माना गया है, जहां आने वाले छह महीनों के दौरान 55,000 से अधिक लोगों की जान जाने की आशंका व्यक्त की गई है।
तापमान और मृत्यु दर के संबंधों को मापने के लिए शिकागो यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब द्वारा एक विशेष मॉडल आधारित अध्ययन संचालित किया गया, जिसे अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर नाम दिया गया है। इस अध्ययन का केंद्रीय लक्ष्य यह रेखांकित करना है कि अल नीनो के प्रभाव से उत्पन्न तीव्र ऊष्मा दुनिया के किन देशों और भौगोलिक सीमाओं में सबसे अधिक प्राणघातक प्रभाव डाल सकती है। ट्रैकर द्वारा जारी किए गए अनुमानों के मुताबिक, जून से सितंबर 2026 के बीच ही दुनिया भर में असहनीय गर्मी के थपेड़ों से संबंधित लगभग 4.84 लाख लोगों की जान जा चुकी है। वहीं दूसरी ओर, इसके बाद के छह महीनों की समयसीमा में लगभग 3.72 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया है, जो इस आपदा की निरंतरता को दर्शाता है।
सांख्यिकीय मॉडल का स्वरूप और आधार रेखा
अध्ययनकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि प्रस्तुत किए गए आंकड़े किसी निश्चित भविष्यसूचक घटनाक्रम की अंतिम संख्या नहीं हैं, बल्कि यह एक जटिल सांख्यिकीय जलवायु मॉडल पर टिका हुआ वैज्ञानिक अनुमान है। इस विश्लेषण में वर्ष 1996 से वर्ष 2005 के बीच दर्ज की गई औसत मृत्यु दर को एक तुलनात्मक आधार रेखा बनाया गया है। इस आधार रेखा की तुलना में जलवायु चक्र के दौरान बढ़ने वाले तापमान और उससे जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले दबाव को मापकर ही संभावित अतिरिक्त मृत्यु दर का गणित तैयार किया गया है।
मॉडल की गणना प्रणाली के कारण कुछ राष्ट्रों की सूची में सांख्यिकीय आंकड़े असमान नजर आते हैं। उदाहरण के तौर पर, चीन के लिए छह महीनों का प्रारंभिक अनुमान नकारात्मक दृष्टिगोचर होता है, जबकि चाड जैसे देश का छह महीने का सांख्यिकीय आंकड़ा पूरी अवधि के कुल अनुमान से भी अधिक दिखता है। यह असमानता दरअसल अलग-अलग समय अंतरालों, मौसमी विविधताओं और निर्धारित आधार रेखा के सापेक्ष होने वाले स्थानिक परिवर्तनों की तकनीकी गणना का परिणाम है। इसलिए शोधकर्ता इन आंकड़ों को वास्तविक मौतों की प्रत्यक्ष गिनती के बजाय संभावित जोखिम का सूचक मानने का परामर्श देते हैं।
भारत पर मंडराता संकट और जनस्वास्थ्य चुनौतियां
इस वैश्विक अध्ययन में भारत को उन प्रमुख देशों की श्रेणी में रखा गया है जहां मौसम का यह थपेड़ा सबसे ज्यादा विनाशकारी रूप ले सकता है। जून 2026 से मार्च 2027 तक के पूरे चक्र में भारत के भीतर अत्यधिक तापमान से जुड़ी लगभग 1.60 लाख अतिरिक्त मौतों का अंदेशा जताया गया है। इस कुल आंकड़े में से आगामी छह महीनों के दौरान ही लगभग 55,200 लोगों की असमय मौत होने की आशंका व्यक्त की गई है, जो निकट भविष्य में भीषण लू और उमस का स्पष्ट संकेत है।
भारतीय संदर्भ में यह चेतावनी विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि देश के विस्तृत मैदानी और प्रायद्वीपीय इलाकों में गर्मी पहले से ही एक जटिल स्वास्थ्य चुनौती बनी रही है। पारे की अत्यधिक ऊंचाई समाज के सबसे कमजोर तबकों पर भारी पड़ती है, जिनमें विशेष रूप से वृद्ध नागरिक, छोटे बच्चे, खुले आसमान के नीचे शारीरिक श्रम करने वाले कामगार और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीज शामिल हैं। जब उच्च तापमान का दौर हफ्तों और महीनों तक लगातार खिंचता है, तो अस्पताल, आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं और स्थानीय प्रशासनिक ढांचा अत्यधिक दबाव में आ जाते हैं, जिससे नियमित चिकित्सा सुविधाएं भी प्रभावित होने लगती हैं।
वैश्विक परिदृश्य में नाइजीरिया, चीन और इंडोनेशिया की स्थिति
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब द्वारा तैयार आंकड़ों के अनुसार नाइजीरिया इस सूची में सर्वाधिक प्रभावित देश के तौर पर उभरा है। अफ्रीकी महाद्वीप के इस देश में सिर्फ आगामी छह महीनों के भीतर ही उच्च तापमान से जुड़ी करीब 56,100 अतिरिक्त मौतों की आशंका जताई गई है, जबकि जून 2026 से मार्च 2027 की समूची अवधि का कुल अनुमान 69,700 दर्ज किया गया है। अत्यधिक जनसंख्या और सीमित बुनियादी ढांचा इस जोखिम को और अधिक संवेदनशील बना देता है।
कुल संभावित मृत्यु दर के तराजू पर भारत के साथ चीन भी सबसे अग्रिम पायदान पर खड़ा दिखाई देता है। आंकड़ों के अनुसार, चीन में जून से मार्च की इस समूची अवधि में लगभग 85,400 अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान लगाया गया है। इसी प्रकार दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख द्वीपीय देश इंडोनेशिया में इस निर्धारित अवधि के दौरान लगभग 49,500 मौतों का आकलन है, जिनमें से करीब 29,300 मौतें आने वाले छह महीनों के भीतर ही दर्ज की जा सकती हैं। अध्ययन इस तथ्य को पुख्ता करता है कि वैश्विक स्तर पर होने वाली कुल अतिरिक्त मौतों का एक तिहाई से भी अधिक हिस्सा अकेले भारत, चीन और नाइजीरिया में केंद्रित हो सकता है।
सुपर अल नीनो की आंतरिक कार्यप्रणाली और तापमान में उछाल
अल नीनो मूल रूप से मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के जलक्षेत्र में घटित होने वाली एक चक्रीय प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। सामान्य अल नीनो की घटनाएं प्रायः दो से सात वर्षों के अनियमित अंतराल पर सतह पर आती हैं। हालांकि, जब प्रशांत महासागर की ऊपरी समुद्री सतह का तापमान सामान्य औसत की तुलना में काफी ज्यादा बढ़ जाता है और यह गर्मी कई महीनों तक स्थिर बनी रहती है, तो मौसम वैज्ञानिक इस प्रचंड स्वरूप को सुपर अल नीनो का नाम देते हैं। ऐसे असाधारण रूप से तीव्र सुपर अल नीनो के चक्र आमतौर पर 10 से 15 साल के लंबे अंतराल के बाद ही उभरते हैं।
इस मौसमी घटना के सक्रिय होते ही समुद्री सतह का असामान्य रूप से गर्म पानी वायुमंडल में ऊष्मा और वाष्प की विशाल मात्रा छोड़ना शुरू कर देता है। समुद्र में संचित यह अतिरिक्त ताप वायुमंडलीय परिसंचरण तंत्र में प्रवेश कर वैश्विक तापमान को एकदम से नई ऊंचाइयों पर धकेल देता है। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में मानसूनी हवाओं, वर्षा वितरण, आंधियों और तूफानों का स्थापित संतुलन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि दुनिया में महसूस की जा रही बेतहाशा तपन के लिए सिर्फ प्राकृतिक अल नीनो जिम्मेदार नहीं है, बल्कि दशकों से जारी मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग इस प्राकृतिक चक्र के प्रभाव को कई गुना अधिक हिंसक बना रहे हैं।
वर्षा, सूखा और दावानल का बदला हुआ वैश्विक भूगोल
सुपर अल नीनो का भौगोलिक असर दुनिया के विभिन्न कोनों में सर्वथा विपरीत रूपों में दृष्टिगोचर होता है। एक ओर जहां यह दुनिया के कुछ हिस्सों में जलप्रलय लाता है, वहीं दूसरी ओर कई महाद्वीपों को भीषण सूखे की आग में झोंक देता है। सामान्य जलवायु रुझानों के तहत इसके प्रभाव से अमेरिका के कई क्षेत्रों, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के विशाल हिस्सों में शरद ऋतु तथा शीतकाल के दौरान अप्रत्याशित भारी बारिश, जलभराव और भयानक तूफानी मौसम का सामना करना पड़ सकता है।
इसके ठीक उलट, दक्षिणी गोलार्ध और एशियाई भूभाग में स्थिति बिल्कुल विपरीत करवट लेती है। ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण एशिया के व्यापक क्षेत्रों में इसके कारण मानसूनी वर्षा में भारी व्यवधान आ सकता है और लंबे समय तक बने रहने वाले भीषण सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इंडोनेशिया जैसे वनाच्छादित क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी से जंगलों और पीट की दलदली भूमि में विनाशकारी दावानल भड़कने का अंदेशा रहता है। इन जंगलों की आग से उठने वाला जहरीला धुआं और धुंध सीमाएं लांघकर पड़ोसी राष्ट्रों सिंगापुर और मलेशिया तक फैल जाता है, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है और आबादी में सांस तथा फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का प्रसार बढ़ जाता है।



















