जब न्यूरोसाइंस की दुनिया में यादों के ठिकाने तलाशने की बात आती है, तब आमतौर पर दिमाग के न्यूरॉन्स और जटिल सिनैप्टिक नेटवर्क की चर्चा सबसे आगे रहती है। लेकिन कई वैज्ञानिक ऐसे जीवों की पड़ताल में जुटे हैं जो बिना किसी जटिल मस्तिष्क तंत्र के भी अपने अनुभवों को सहेजने की क्षमता दिखाते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर सैम गेर्शमैन और उनके शोध दल ने साठ के दशक के एक बेहद चर्चित और विवादास्पद सवाल को सुलझाने की ठानी। सवाल यह था कि क्या किसी जीव को दी गई सीख या उसकी स्मृति को किसी दूसरे जीव के भीतर शारीरिक रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है। इस पहेली की जड़ें साठ साल पहले हुए उन सनसनीखेज दावों से जुड़ी हैं जिनमें चपटे कीड़ों यानी प्लेनेरियन वर्म्स को बिजली के झटके देकर रोशनी से डरना सिखाया गया था, और फिर उन्हें काटकर या उनके अर्क को दूसरे कीड़ों को खिलाकर उसी याददाश्त को नए जीवों में ट्रांसफर करने का दावा किया गया था।
नदियों और झीलों से जुटाए गए जंगली कीड़े
इस ऐतिहासिक प्रयोग की असलियत परखने के लिए गेर्शमैन की लैब से जुड़े शोध सहायक केल्सो को ताजे पानी के प्लेनेरियन कीड़ों की सख्त जरूरत थी। प्लेनेरियन ऐसे चपटे कीड़े होते हैं जिनका सिर तीर के आकार का होता है और वे उन सबसे शुरुआती साधारण जीवों में गिने जाते हैं जिनके पास इंसानों की तरह दोनों तरफ संतुलित नर्वस सिस्टम और एक बेहद बुनियादी दिमाग होता है। आमतौर पर वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं ऐसे जीवों को बायोलॉजिकल सप्लाई कंपनियों से सीधे ऑर्डर करके मंगाती हैं। लेकिन जब सप्लायरों से मिले कीड़े उम्मीद पर खरे नहीं उतरे, तो शोध दल ने खुद जाकर प्रकृति से जंगली कीड़े पकड़ने का फैसला किया।
केल्सो को कड़ाके की ठंड में चार्ल्स नदी के बर्फीले किनारों पर भेजा गया, जहां वे हथौड़े से बर्फ तोड़कर पानी के भीतर से कीड़े तलाश रहे थे। यह कवायद सिर्फ एक नदी तक सीमित नहीं रही। मार्च 2025 में ओरेगॉन के यूजीन इलाके के प्राकृतिक झरनों और धाराओं में खोजबीन की गई। इसके बाद जून के महीने में वे मिशिगन की झीलों में कमर तक के पानी में वाटरप्रूफ कपड़े पहनकर उतरे, जहां किनारे पर पिकनिक मना रहे आम परिवार उन्हें हैरानी से देख रहे थे। पत्थरों को पलटने, धागे से बंधी मांस की बोटियों से चारा डालने और मिशिगन के मीठे पानी के जीवों पर लिखी पुरानी गाइडबुक के नक्शों का सहारा लेने के बावजूद नतीजा वही रहा। कीड़े तो भारी तादाद में हाथ लगे, लेकिन लैब में लाते ही उनमें से कोई भी उम्मीद के मुताबिक बर्ताव करने को तैयार नहीं था।
साठ के दशक का अनोखा प्रयोग और कैनिबलिज्म का दावा
इस पूरे मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1960 के दशक से जुड़ी है, जब बिहेवियरल साइकोलॉजिस्ट जेम्स मैककोनेल ने वैज्ञानिक जगत में एक बड़ा तहलका मचा दिया था। उन्होंने दावा किया था कि प्लेनेरियन कीड़ों को क्लासिकल कंडीशनिंग के जरिए रोशनी और हल्के बिजली के झटके के बीच संबंध जोड़ना सिखाया जा सकता है। जब कीड़ों पर तेज रोशनी डाली जाती और तुरंत बिजली का करंट दिया जाता, तो वे सिकुड़ जाते थे। बार-बार ऐसा करने पर वे सिर्फ रोशनी चमकने पर ही करंट के डर से अपने शरीर को सिकोड़ने लगे।
प्लेनेरियन जीवों की एक अनोखी शारीरिक खूबी यह भी है कि यदि उन्हें चाकू से बीच से दो टुकड़ों में काट दिया जाए, तो दोनों टुकड़े दोबारा नए कीड़े बन जाते हैं। सिर वाला हिस्सा नई पूंछ उगा लेता है और पूंछ वाला हिस्सा नया सिर तैयार कर लेता है। कीड़े का 1/279 जितना छोटा सा हिस्सा भी कुछ हफ्तों के भीतर एक पूरा वयस्क कीड़ा बना सकता है। मैककोनेल ने इसी खूबी का इस्तेमाल करते हुए सीखे हुए कीड़ों के सिर कलम कर दिए। हैरान करने वाली बात यह रही कि नए सिर उगाने वाली पूंछ वाले कीड़ों को भी पुरानी सीख याद थी। इससे यह धारणा बनी कि यादें केवल दिमाग में नहीं, बल्कि पूरे शरीर में रासायनिक रूप से दर्ज होती हैं। इसके बाद जब ट्रेंड कीड़ों का बारीक पेस्ट बनाकर अप्रशिक्षित कीड़ों को खिलाया गया, तो इन आदमखोर यानी कैनिबल कीड़ों ने भी तुरंत रोशनी के प्रति वही प्रतिक्रिया दिखाई, मानो उन्होंने याददाश्त को खाकर पचा लिया हो।
मशहूर पत्रिका और बाद में उपजा गहरा विवाद
उस दौर में डीएनए की खोज के बाद वैज्ञानिक जगत यह मानने को तैयार हो रहा था कि सूचनाएं प्रोटीन्स और न्यूक्लिक एसिड के भीतर दर्ज होती हैं। मैककोनेल का मानना था कि स्मृतियां आरएनए के ढांचे में एनकोड होती हैं। इस खोज ने उन्हें मीडिया का चमकता हुआ सितारा बना दिया। वे रेडियो और टेलीविजन शो पर पहुंचे और खुद को एक मजाकिया अंदाज में पेश किया। उन्होंने भविष्य में पियानो सीखने की गोलियां या ज्ञान देने वाले बर्गर बनने की भविष्यवाणियां तक कर डालीं। अपनी लैब से वे एक अनोखा प्रकाशन निकालते थे जिसका नाम द वर्म रनर्स डाइजेस्ट था। इसमें गंभीर वैज्ञानिक शोधपत्रों के साथ-साथ व्यंग्य, कॉमिक्स, साइंस फिक्शन और कविताएं भी छपती थीं।
हालांकि यही हल्कापन और गैर-परंपरागत अंदाज आगे चलकर उनके पतन की वजह भी बना। साठ के दशक के मध्य में जब दूसरे बड़े वैज्ञानिकों ने इन प्रयोगों को दोहराने की कोशिश की, तो परिणाम विरोधाभासी आए। नोबेल पुरस्कार विजेता बायोकेमिस्ट मेल्विन केल्विन ने 1965 में मैककोनेल के ही उपकरणों और सहयोगियों की मदद से प्रयोग दोहराने का प्रयास किया, लेकिन वे पूरी तरह नाकाम रहे। इसके बाद कीड़ों को संभालने और परिणामों के सही होने पर तीखी बहस शुरू हो गई। सत्तर का दशक आते-आते वैज्ञानिकों की रुचि चूहों और बिल्लियों जैसे बड़े जीवों पर आरएनए ट्रांसफर के प्रयोगों की ओर मुड़ गई और प्लेनेरियन का किस्सा धीरे-धीरे भुला दिया गया। मैककोनेल ने 1971 में अपनी लैब बंद कर दी और 1990 में उनका निधन हो गया।
आधुनिक दौर में क्यों नाकाम साबित हुए कीड़े
हार्वर्ड की टीम ने अप्रैल 2026 में बायोरकाइव डॉट ओआरजी पर अपने शुरुआती नतीजे साझा करते हुए बताया कि वे प्लेनेरियन कीड़ों को रोशनी के साथ शरीर सिकोड़ना तक नहीं सिखा पाए। मेमोरी ट्रांसफर की जांच तो बहुत दूर की बात थी, कीड़े पहली बुनियादी सीख को भी ग्रहण करने में असमर्थ रहे। उन्होंने अलग-अलग तरीके के उद्दीपन आजमाए, पुराने इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों की जांच की और वीडियो फुटेज का मशीन लर्निंग एल्गोरिदम से विश्लेषण भी कराया, मगर कोई सफलता नहीं मिली।
केल्सो और उनकी साथी स्नाइडर ने उस दौर के गवाह रहे डैनियल किंबल और उनकी पत्नी रीवा से ओरेगॉन जाकर मुलाकात की, जो मैककोनेल के साथ काम कर चुके थे। नब्बे की उम्र पार कर चुके इस बुजुर्ग वैज्ञानिक दंपत्ति के पास उस दौर के प्रकाशनों का पूरा संग्रह मौजूद था और वे पूरी तरह आश्वस्त थे कि उनके पुराने प्रयोग सच थे। आधुनिक शोधकर्ताओं का मानना है कि शायद साठ के दशक में वैज्ञानिक कीड़ों के सामान्य मुड़ने की हरकत को डर में सिकुड़ना समझ बैठे थे और व्यक्तिपरक पूर्वाग्रहों के कारण नतीजे सकारात्मक मान लिए गए। दूसरी संभावना यह भी हो सकती है कि पिछले साठ सालों में पर्यावरण प्रदूषण या जेनेटिक बदलावों के चलते कीड़ों की प्रकृति में कुछ बदलाव आया हो, हालांकि इसकी संभावना बेहद कम नजर आती है।
सी एलिगेंस और समुद्री स्लग पर नई उम्मीदें
भले ही प्लेनेरियन कीड़े आधुनिक लैब में कुछ भी नया सीखने में विफल रहे हों, लेकिन जेनेटिक याददाश्त के इस पूरे सिद्धांत को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। 2018 में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया लॉस एंजिल्स के न्यूरोसाइंस विशेषज्ञ डेविड ग्लैंजमैन ने एप्लिसिया कैलिफोर्निका नाम के समुद्री स्लग पर सफल प्रयोग किए। बिजली के झटके सहने वाले स्लग से जेनेटिक सामग्री लेकर जब अनजान स्लग में डाली गई, तो उसने भी वही सतर्कता दिखाई, जिससे आरएनए में यादें दर्ज होने की बात को बल मिला।
इसके बाद 2021 में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की जेनेटिक्स विशेषज्ञ कोलीन मर्फी ने पाया कि महज 302 न्यूरॉन्स वाले गोल कृमि यानी सी एलिगेंस भी खतरनाक बैक्टीरिया से बचना सीख सकते हैं। प्रशिक्षित कीड़ों के शरीर के अर्क को खाने या उनके संपर्क में आने से यह जानकारी अगली पीढ़ी और साथी कीड़ों तक पहुंचती है। इसमें सर1 नाम के जंपिंग जीन सेगमेंट की भूमिका सामने आई। बाद में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के शोधकर्ताओं ने भी पाया कि प्रशिक्षित सी एलिगेंस छोटे लिपिड कणों यानी एक्स्ट्रासेलुलर वेसिकल्स के जरिए यह जेनेटिक जानकारी दूसरे कीड़ों तक पहुंचाते हैं। इन्हीं नए नतीजों को देखते हुए हार्वर्ड की टीम अब प्लेनेरियन के बजाय सी एलिगेंस पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, ताकि यह समझा जा सके कि कोशिकाएं बिना दिमाग के कैसे अनुभवों को याद रखती हैं।



















