अंतरिक्ष में गहराई से देखने पर वैज्ञानिकों को एक ऐसे मृत तारे के अवशेष मिले हैं, जो यह समझने में मदद कर सकते हैं कि अरबों साल बाद हमारे सौरमंडल का क्या हश्र होगा। यूरोपीय साउदर्न ऑब्जर्वेटरी के वेरी लार्ज टेलीस्कोप से की गई ताजा निगरानी में सफेद बौने तारे J1328−1450 के चारों ओर गैस और धूल से बना एक बेहद असामान्य डिस्क देखा गया है। इस डिस्क की सबसे खास बात यह है कि इसमें गैस के दो अलग-अलग छल्ले मौजूद हैं, जिनके बीच में एक साफ खाली जगह यानी गैप दिखाई देता है।
प्राचीन ग्रहों के टूटने से बना मलबे का घेरा
यह मृत तारा पृथ्वी से लगभग 1,600 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। खगोलीय तारा-मानचित्रण सूचियों की बदौलत वैज्ञानिक इस तारे से पहले से ही परिचित थे, लेकिन इसके आसपास मौजूद मलबे की अनोखी बनावट अब सामने आई है। इस घेरे में मौजूद सामग्री असल में उन प्राचीन ग्रहों और चट्टानी पिंडों के बचे हुए टुकड़े माने जा रहे हैं, जो कभी इस तारे की परिक्रमा करते थे। जब तारे का मुख्य ईंधन समाप्त हुआ और वह रेड जायंट यानी लाल दानव चरण में पहुंचा, तो उसने अपने नजदीकी ग्रहों को नष्ट कर दिया। इसके बाद जब तारा सिकुड़कर एक सफेद बौना बना, तब तीव्र और चरम वातावरण के संपर्क में आए चट्टानी अवशेष टूटकर गैस और मलबे के इस दोहरे डिस्क में तब्दील हो गए।
लगभग 5 अरब साल बाद सूर्य और पृथ्वी का क्या होगा
इस दूरस्थ प्रणाली में जो कुछ भी घटा, वही प्रक्रिया भविष्य में हमारे अपने सौरमंडल में भी दोहराई जा सकती है। आज से करीब 5 अरब साल बाद हमारा सूर्य भी अपने मूल ईंधन को पूरी तरह खत्म कर देगा और एक विशाल लाल दानव का रूप ले लेगा। उस भयानक फैलाव के दौरान सूर्य अपने सबसे करीबी ग्रहों को पूरी तरह निगल सकता है। कालक्रम में सूर्य अपनी बाहरी गैस की परतों को अंतरिक्ष में बिखेर देगा और केंद्र में केवल एक ठंडा पड़ता सफेद बौना तारा शेष रह जाएगा। उस उथल-पुथल से बचने वाले चट्टानी पिंड बाद में टूटकर बिखर सकते हैं और ठीक इसी तरह मृत सूर्य के चारों ओर एक मलबे की डिस्क बना सकते हैं।
छिपे हुए पिंडों और छल्लों के बनने का रहस्य
वैज्ञानिकों का ध्यान इस बात पर विशेष रूप से टिका है कि मलबे का यह घेरा दो अलग छल्लों में क्यों बंटा हुआ है। जुटाए गए डेटा से संकेत मिलता है कि तारे के भयानक रूपांतरण के बाद भी उस प्रणाली के मलबे में कम से कम दो ग्रहीय पिंड किसी तरह सुरक्षित बच गए होंगे। हालांकि, इन पिंडों को अभी सीधे तौर पर देखा नहीं जा सका है, लेकिन उनकी गुरुत्वाकर्षण गतिविधि ही इस खाली जगह और दोनों छल्लों को आकार दे रही हो सकती है।
अनुमान के अनुसार, ये दोनों पिंड आकार में एक-दूसरे से काफी अलग हो सकते हैं। सफेद बौने के सबसे पास मौजूद पिंड का व्यास केवल कुछ किलोमीटर हो सकता है, जबकि बाहरी छोर पर मौजूद पिंड प्लूटो या हमारे चंद्रमा जितना बड़ा हो सकता है। आसपास के मलबे के साथ इन पिंडों की आपसी अंतःक्रिया ही दो छल्लों की संरचना को स्पष्ट करती है। हालांकि, अलग-अलग पिंडों के होने की अभी पूर्ण पुष्टि नहीं हुई है। दूसरा संभावित पहलू यह भी है कि यह पूरी संरचना किसी एक ही ग्रह जैसे पिंड की पपड़ी और कोर जैसे विभिन्न हिस्सों के अलग-अलग टूटने से तैयार हुई हो।



















