मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से लेकर आधुनिक समय तक इंसान की अभिव्यक्ति के तरीकों में व्यापक बदलाव आए हैं। वर्तमान समय में संपूर्ण पृथ्वी पर लगभग 7,500 भाषाएं प्रयोग में लाई जाती हैं, जिनमें अंग्रेजी, मंदारिन चीनी, हिंदी, स्पेनिश, अरबी तथा फ्रेंच प्रमुख रूप से शामिल हैं। हालांकि, प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक शोध के अनुसार मानव इतिहास में एक ऐसा दौर भी मौजूद था जब दुनिया भर के अलग-अलग भूभागों में 30 हजार से लेकर 75 हजार से भी अधिक भाषाएं बोली जाती थीं। अमेरिका स्थित येल यूनिवर्सिटी में भाषाविज्ञान और मानवशास्त्र विभाग की प्रोफेसर क्लेयर बॉवर्न के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने इस ऐतिहासिक भाषाई गिरावट के कारणों और आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
गणितीय मॉडल और 12 हजार साल पुराना भाषाई ढांचा
अतीत के उस दौर को समझने के लिए जब कोई लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं थे, शोधकर्ताओं को अनूठा तरीका अपनाना पड़ा। वैज्ञानिकों ने अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैली 171 ऐसी शिकारी-संग्रहकर्ता जनजातियों का अध्ययन किया जो आज भी काफी हद तक प्राचीन जीवनशैली का पालन करती हैं। इन समुदायों की जनसंख्या संरचना, उनके भाषाई फैलाव और उस दौर की अनुमानित वैश्विक आबादी का मिलान करने के लिए जटिल गणितीय मॉडलिंग, मानवशास्त्र, भाषाविज्ञान एवं जनसांख्यिकी के आंकड़ों को एक साथ जोड़ा गया। इससे पता चला कि आज से करीब 12 हजार वर्ष पूर्व, जब अंतिम हिमयुग समाप्त हो रहा था और होलोसीन काल की शुरुआत हो रही थी, तब दुनिया भर में छोटे-छोटे खानाबदोश समूहों द्वारा लगभग 4,500 से 6,200 के बीच भाषाएं बोली जाती थीं।
भाषाओं का स्वर्णकाल और वैश्विक प्रसार
जैसे-जैसे इंसानी आबादी में बढ़ोतरी हुई और नए-नए कबीलों तथा बस्तियों का निर्माण हुआ, वैसे-वैसे भाषाओं का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व (1000 BC) से लेकर पहली सहस्राब्दी ईस्वी (1000 AD) के मध्य का समय भाषाई विविधता के दृष्टिकोण से सबसे चरम दौर था। शोधकर्ताओं ने इस विशिष्ट कालखंड को भाषाओं के स्वर्णकाल की संज्ञा दी है। उस समय भौगोलिक अलगाव के कारण हर छोटे-बड़े समुदाय के पास अपनी एक स्वतंत्र बोली थी। इस तरह एक ही कालखंड में पृथ्वी पर 30,000 से लेकर 75,000 से भी अधिक भाषाएं एक साथ जीवित थीं।
लिखित भाषा का उदय और मेसोपोटामिया की देन
मानव इतिहास के शुरुआती दौर में सभी भाषाएं केवल मौखिक रूप से बोली जाती थीं और उनका कोई लिखित रूप उपलब्ध नहीं था। चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता ने सबसे पहले क्यूनिफॉर्म लिपि का आविष्कार करके लिखित भाषा की नींव रखी। इसके पश्चात मिस्र, चीन और मेसोअमेरिका जैसी महान सभ्यताओं ने भी स्वतंत्र रूप से अपनी-अपनी लेखन प्रणालियों का विकास किया। लेखन प्रणाली के आगमन से प्रशासनिक और व्यापारिक कार्यों को गति मिली, परंतु इसने धीरे-धीरे अनलिखी स्थानीय बोलियों को हाशिए पर धकेलना भी शुरू कर दिया।
साम्राज्यवादी विस्तार और उपनिवेशवाद का प्रभाव
हजारों बोलियों के समाप्त होने के पीछे मुख्य रूप से बड़े साम्राज्यों का उद्भव और युद्ध जिम्मेदार रहे। जब विशाल साम्राज्य अपनी सीमाओं का विस्तार करते थे, तब पराजित क्षेत्रों की स्थानीय बोलियों को दबाकर शासकों की भाषा को प्रशासनिक कामकाज पर थोप दिया जाता था। इसके अलावा, बीते कुछ सौ सालों के दौरान यूरोपीय उपनिवेशवाद ने दुनिया भर की स्थानीय भाषाओं के विनाश में केंद्रीय भूमिका निभाई। औपनिवेशिक ताकतों ने स्थानीय निवासियों को अपनी पारंपरिक मातृभाषा छोड़कर शासकों की भाषा अपनाने पर विवश कर दिया, जिससे असंख्य भाषाएं हमेशा के लिए विलुप्त हो गईं।
भाषा के लुप्त होने के सामाजिक व जैविक कारण
प्रोफेसर क्लेयर बॉवर्न के अनुसार, किसी भाषा का महत्व सिर्फ रोजमर्रा के संवाद तक सीमित नहीं होता है, बल्कि वह किसी भी समाज के इतिहास, परंपराओं, यादों और ज्ञान की धरोहर होती है। जब कोई भाषा समाप्त होती है तो उसके साथ कई पीढ़ियों का संचित सांस्कृतिक अनुभव भी खत्म हो जाता है। युद्धों, भीषण महामारियों या व्यापक हिंसा की वजह से जब किसी बोली को बोलने वाले पूरे समुदाय का सफाया हो जाता है, तब भाषाएं अचानक दम तोड़ देती हैं। दूसरी ओर, कई बार आर्थिक उन्नति, राजनीतिक दबाव, सरकारी नीतियों तथा आधुनिक शिक्षा प्रणालियों के चलते नई पीढ़ी अपनी पुरानी मातृभाषा बोलना बंद कर देती है, जिससे धीरे-धीरे वह भाषा इतिहास के पन्नों में सिमट जाती है।
वर्तमान संकट और बची हुई भाषाओं का भविष्य
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, आज दुनिया में बची हुई 7,500 भाषाओं में से लगभग आधी गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि दुनिया की 90 प्रतिशत जनसंख्या केवल 10 प्रतिशत सबसे प्रचलित भाषाओं का प्रयोग करती है। इसका अर्थ यह है कि बची हुई 90 प्रतिशत भाषाओं को बोलने वालों की संख्या बहुत सीमित बची है। यदि इन संकटग्रस्त बोलियों के संरक्षण के लिए कोई त्वरित और ठोस वैज्ञानिक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले कुछ दशकों में इनमें से एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगा।



















