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भाद्रपद में सप्त ऋषियों की आराधना का पर्व ऋषि पंचमी, जानिए पूजन मुहूर्त और महिलाओं के लिए इसका धार्मिक महत्वअध्यात्म
16 अक्तू॰ 2026, 1:51 am (26 मिनट पहले)· 0

भाद्रपद में सप्त ऋषियों की आराधना का पर्व ऋषि पंचमी, जानिए पूजन मुहूर्त और महिलाओं के लिए इसका धार्मिक महत्व

ऋषि पंचमी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पंचमी को सप्त ऋषियों के सम्मान में रखा जाता है, जिसमें महिलाएं प्रायश्चित और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ कठिन नियमों का पालन करती हैं।

सनातन धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह पावन दिन वैदिक काल के पूज्य सप्त ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी विधिपूर्वक उपासना करने के लिए निर्धारित है। सामान्य व्रतों की तुलना में यह पर्व किसी देवी या देवता को नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान और दिशा देने वाले तपस्वी ऋषियों को समर्पित होता है। विशेष रूप से महिलाएं इस दिन उपवास रखकर आत्मशुद्धि, परिवार के कल्याण और अनजाने में हुए दोषों से मुक्ति की प्रार्थना करती हैं।

सप्त ऋषियों का वंदन और गंगा अवतरण से जुड़ी कथा

धार्मिक परंपरा के अनुसार यह साधना सात महान ऋषियों को समर्पित है, जिनमें ऋषि वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज शामिल हैं। पंडित गणेश त्रिपाठी के अनुसार इस व्रत की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि मां गंगा के धराधाम पर अवतरण से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि जब मां गंगा पृथ्वी पर वेग से प्रवाहित हो रही थीं, तब मार्ग में सप्त ऋषि कठोर तपस्या में लीन थे। उनके तप में कोई विघ्न न पड़े, इसलिए मां गंगा ने ऋषियों के सम्मान में अपनी धारा की दिशा बदल दी थी। इसी घटना के स्मरण में इस पावन तिथि पर सप्त ऋषियों की विशेष पूजा की परंपरा स्थापित हुई।

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पूजन का शुभ समय और अनुष्ठान की विधि

पंचांग के अनुसार इस व्रत के दिन विशेष उपासना का सबसे फलदायी समय सुबह 11:00 बजे से लेकर दोपहर 1:40 बजे तक रहता है। इस अवधि में साधक पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा जी में स्नान करते हैं या घर पर ही नहाने के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान का संकल्प लेते हैं। इसके बाद पूजा स्थल पर सप्त ऋषियों का आह्वान करके उन्हें फल, फूल, कंदमूल और धूप-दीप अर्पित किए जाते हैं। इस दिन कठिन नियमों और सात्विक आहार के कड़े अनुशासन का पालन करना अनिवार्य माना जाता है, जिससे अंतःकरण शुद्ध होता है।

महिलाओं के लिए व्रत का महत्व और आत्मशुद्धि की मान्यता

पंडित गणेश त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि यह अनुष्ठान मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा पूरे श्रद्धा भाव से संपन्न किया जाता है। हिंदू मान्यताओं में मासिक धर्म के दौरान धार्मिक नियमों या स्पर्श दोष से संबंधित जो गलतियां जाने-अनजाने हो जाती हैं, उनके प्रायश्चित के लिए यह व्रत अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इसके साथ ही सुहागिन महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में परस्पर विश्वास, प्रेम और पति की लंबी आयु की कामना के लिए भी यह अनुष्ठान करती हैं। निष्ठापूर्वक किए गए इस व्रत से सभी पापों का नाश होता है तथा घर में सुख, शांति और ऐश्वर्य का वास होता है।

सवाल-जवाब

ऋषि पंचमी का व्रत किस माह और तिथि को रखा जाता है?
यह पावन व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को रखा जाता है।
ऋषि पंचमी के दिन पूजा का शुभ समय क्या है?
इस दिन विशेष पूजा का सबसे महत्वपूर्ण समय सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:40 बजे तक रहता है।
यह व्रत किन ऋषियों को समर्पित होता है?
यह व्रत सप्त ऋषियों यानी वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज को समर्पित है।
महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत मुख्य रूप से क्यों करती हैं?
महिलाएं अनजाने में हुए पापों के निवारण, मासिक धर्म के दौरान हुए दोषों से मुक्ति और पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं।
मां गंगा और सप्त ऋषियों से जुड़ी क्या मान्यता है?
मान्यता है कि गंगा के धरती पर अवतरण के समय ऋषियों को तपस्या में लीन देखकर मां गंगा ने अपना मार्ग बदल लिया था।
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