सनातन धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह पावन दिन वैदिक काल के पूज्य सप्त ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी विधिपूर्वक उपासना करने के लिए निर्धारित है। सामान्य व्रतों की तुलना में यह पर्व किसी देवी या देवता को नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान और दिशा देने वाले तपस्वी ऋषियों को समर्पित होता है। विशेष रूप से महिलाएं इस दिन उपवास रखकर आत्मशुद्धि, परिवार के कल्याण और अनजाने में हुए दोषों से मुक्ति की प्रार्थना करती हैं।
सप्त ऋषियों का वंदन और गंगा अवतरण से जुड़ी कथा
धार्मिक परंपरा के अनुसार यह साधना सात महान ऋषियों को समर्पित है, जिनमें ऋषि वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज शामिल हैं। पंडित गणेश त्रिपाठी के अनुसार इस व्रत की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि मां गंगा के धराधाम पर अवतरण से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि जब मां गंगा पृथ्वी पर वेग से प्रवाहित हो रही थीं, तब मार्ग में सप्त ऋषि कठोर तपस्या में लीन थे। उनके तप में कोई विघ्न न पड़े, इसलिए मां गंगा ने ऋषियों के सम्मान में अपनी धारा की दिशा बदल दी थी। इसी घटना के स्मरण में इस पावन तिथि पर सप्त ऋषियों की विशेष पूजा की परंपरा स्थापित हुई।
पूजन का शुभ समय और अनुष्ठान की विधि
पंचांग के अनुसार इस व्रत के दिन विशेष उपासना का सबसे फलदायी समय सुबह 11:00 बजे से लेकर दोपहर 1:40 बजे तक रहता है। इस अवधि में साधक पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा जी में स्नान करते हैं या घर पर ही नहाने के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान का संकल्प लेते हैं। इसके बाद पूजा स्थल पर सप्त ऋषियों का आह्वान करके उन्हें फल, फूल, कंदमूल और धूप-दीप अर्पित किए जाते हैं। इस दिन कठिन नियमों और सात्विक आहार के कड़े अनुशासन का पालन करना अनिवार्य माना जाता है, जिससे अंतःकरण शुद्ध होता है।
महिलाओं के लिए व्रत का महत्व और आत्मशुद्धि की मान्यता
पंडित गणेश त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि यह अनुष्ठान मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा पूरे श्रद्धा भाव से संपन्न किया जाता है। हिंदू मान्यताओं में मासिक धर्म के दौरान धार्मिक नियमों या स्पर्श दोष से संबंधित जो गलतियां जाने-अनजाने हो जाती हैं, उनके प्रायश्चित के लिए यह व्रत अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इसके साथ ही सुहागिन महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में परस्पर विश्वास, प्रेम और पति की लंबी आयु की कामना के लिए भी यह अनुष्ठान करती हैं। निष्ठापूर्वक किए गए इस व्रत से सभी पापों का नाश होता है तथा घर में सुख, शांति और ऐश्वर्य का वास होता है।


















