भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को लोलार्क छठ के पावन अवसर पर काशी के भदैनी क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड में आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है। देशभर से लाखों विवाहित जोड़े संतान प्राप्ति की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं। सूर्य उपासना के इस महापर्व पर कुंड में स्नान को लेकर शास्त्रों में बेहद कड़े और स्पष्ट नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना हर श्रद्धालु के लिए अनिवार्य माना जाता है।
स्नान से जुड़े महत्वपूर्ण नियम और पूजा विधि
कुंड के पुजारी शशि भूषण उपाध्याय के अनुसार, लोलार्क कुंड में स्नान करने का आध्यात्मिक फल तभी प्राप्त होता है जब दंपति पूरी निष्ठा से तय विधान का पालन करें। इस दौरान पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक साथ पवित्र जल में डुबकी लगानी होती है। जल में प्रवेश करते समय और डुबकी लगाते वक्त भगवान सूर्य का सच्चे मन से ध्यान करना चाहिए।
स्नान के उपरांत कुंड में कद्दू, लौकी या बेल जैसे फलों का दान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु जिस फल का त्याग या दान कुंड में करते हैं, मनोकामना पूरी होने तक उन्हें उस फल का सेवन करने की सख्त मनाही होती है। इसके अलावा, स्नान के बाद पहने हुए पुराने वस्त्रों को वहीं छोड़ दिया जाता है। नए वस्त्र धारण करने के पश्चात दंपति लोलकेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन के लिए जाते हैं।
बीएचयू के वैज्ञानिकों का शोध और कुंड का प्रभाव
केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से भी लोलार्क कुंड का विशेष महत्व माना जा रहा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिक इस कुंड के पानी और भौगोलिक बनावट पर निरंतर शोध कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, कुंड का विशिष्ट आकार, गंगा जल की उपस्थिति और सूर्य की किरणों का कोण मिलकर एक अनोखा प्राकृतिक संयोग बनाते हैं।
बीएचयू के प्रोफेसर प्रवीण सिंह राणा ने अध्ययन के आधार पर बताया कि लोलार्क छठ के पावन अवसर पर कुंड का जल असाधारण रूप से गुणकारी हो जाता है, जिससे स्नान करने वाले के शरीर में एक विशेष सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। एक सर्वेक्षण के आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि यहां पूरे विधि-विधान से स्नान करने वाले लगभग 60 फीसदी श्रद्धालुओं की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है।



















