भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर देशभर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर जन्माष्टमी व्रत के साथ-साथ मासिक कालाष्टमी, विन्ध्यवासिनी जयंती और काली जयंती का पर्व भी पड़ रहा है। पंचांग गणना के मुताबिक यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ माना जा रहा है क्योंकि लगभग 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ऐसा शुभ संयोग बना है जब गृहस्थ और स्मार्त परंपरा को मानने वाले लोग एक ही दिन जन्माष्टमी का उपवास रख रहे हैं। इसके साथ ही शुक्रवार का दिन होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण के साथ धन और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी की आराधना का भी विशेष महत्व बन गया है।
तिथि, नक्षत्र और वैदिक योग की स्थिति
वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रात 12:13 बजे (5 सितंबर की शुरुआत) तक प्रभावी रहेगी, जिसके उपरांत नवमी तिथि प्रारंभ होगी। नक्षत्र की बात करें तो रोहिणी नक्षत्र रात 11:04 बजे तक विद्यमान रहेगा, जिसके पश्चात मृगशिरा नक्षत्र का आरंभ होगा। करण में बालव करण दोपहर 01:20 बजे तक रहेगा और इसके बाद कौलव करण रात 12:13 बजे तक चलेगा। दिन के दौरान हर्षण योग दोपहर 03:44 बजे तक रहेगा, जिसके बाद वज्र योग शुरू हो जाएगा। आज के दिन पश्चिम दिशा में दिशाशूल माना गया है, इसलिए इस दिशा में आवश्यक न हो तो यात्रा से बचना चाहिए।
निशीथ काल और पूजा का समय
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा मध्यरात्रि में करने की परंपरा है। पंचांग के विवरण के अनुसार निशीथ काल पूजा का समय रात 11:57 बजे से रात 12:43 बजे तक (निशिता मुहूर्त 11:58 पी एम से 12:44 ए एम, 5 सितंबर) रहेगा। मध्यरात्रि के इसी पहर में बाल गोपाल का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। दिन में अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:01 बजे से 12:50 बजे तक (पंचांग खंड में 11:55 ए एम से 12:46 पी एम) रहेगा, जो दिन का सर्वाधिक शुभ समय माना जाता है। वहीं अमृत काल रात 08:02 बजे से रात 09:32 बजे तक (अमृत काल तालिका में 08:03 पी एम से 09:33 पी एम) उपस्थित रहेगा।
जन्माष्टमी और शुक्रवार व्रत की संयुक्त पूजा विधि
शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। ऐसे में जन्माष्टमी और शुक्रवार का एक साथ होना भक्तों को भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी दोनों की संयुक्त कृपा पाने का अवसर देता है। सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर पूजा स्थल की स्वच्छता करें और व्रत का संकल्प लें। शाम को पूजा गृह में घी का दीपक प्रज्वलित कर दोनों देवी-देवताओं का ध्यान करें। मध्यरात्रि में लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराकर नवीन वस्त्र धारण कराएं। इसके बाद चंदन, सुगंधित पुष्प और तुलसी दल अर्पित करते हुए माखन-मिश्री, मौसमी फल और मिष्ठान का भोग अर्पित करें। माता लक्ष्मी को कमल अथवा ताजे पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित कर आरती और मंत्रों का जाप करें। पारण स्थानीय पंचांग और कुल परंपरा के अनुरूप करना श्रेयस्कर रहता है।
4 सितंबर 2026 के प्रमुख शुभ मुहूर्त
धार्मिक अनुष्ठानों और शुभ कार्यों के संपादन हेतु पंचांग में बताए गए शुभ काल इस प्रकार हैं
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:31 बजे से 05:16 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:46 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 02:27 बजे से 03:18 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:40 बजे से 07:03 बजे तक
- अमृत काल: रात 08:03 बजे से 09:33 बजे तक
- निशिता मुहूर्त: रात 11:58 बजे से 12:44 बजे तक (5 सितंबर)
- शिववास: माता गौरी के साथ रात 12:13 बजे तक (5 सितंबर)
अशुभ समय और वर्जित काल
वैदिक ज्योतिष में किसी भी नए या मांगलिक कार्य के आरंभ हेतु अशुभ समय का त्याग करने का निर्देश दिया गया है
- राहुकाल: सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:21 बजे तक
- यमगण्ड: दोपहर 03:30 बजे से शाम 05:05 बजे तक
- गुलिक काल: सुबह 07:36 बजे से सुबह 09:11 बजे तक
- दुर्मुहूर्त: सुबह 08:33 बजे से 09:24 बजे तक
- वर्ज्य: दोपहर 03:32 बजे से शाम 05:02 बजे तक
- आडल योग: रात 11:04 बजे से अगली सुबह 06:02 बजे तक (5 सितंबर)


















