सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ का उपवास अत्यंत पावन और अटूट आस्था का पर्व माना जाता है। इस विशेष अवसर पर महिलाएं अपने जीवनसाथी की दीर्घायु, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और परिवार की समृद्धि के लिए पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करके निर्जला व्रत रखती हैं। सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा के अनुसार, रात्रि के समय चंद्रमा का दीदार करने, उन्हें विधि-विधान से अर्घ्य समर्पित करने और फिर पति के हाथों जल पीकर ही यह कठिन उपवास संपन्न किया जाता है। हालांकि, चक्रवाती तूफान अर्नब के प्रभाव से कई राज्यों में मूसलाधार वर्षा और ठंडी हवाओं का दौर चल रहा है। दिल्ली-एनसीआर में भी सुबह से बादल छाए रहने और पानी बरसने के कारण शाम को आकाश में चंद्रमा के स्पष्ट दर्शन होने पर संशय बना हुआ है। ऐसी विषम परिस्थिति में व्रती महिलाओं को परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं में चंद्र दर्शन न होने पर पारण के कई सर्वमान्य और सरल विधान मौजूद हैं।
भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा का ध्यान
यदि घने बादलों अथवा प्रतिकूल मौसम के कारण आकाश में चंद्रदेव प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर नहीं हो पा रहे हैं, तो व्रती महिलाएं देवाधिदेव महादेव का ध्यान कर सकती हैं। भगवान शिव अपनी जटाओं में चंद्रमा को धारण करते हैं, इसलिए उन्हें चंद्रशेखर भी कहा जाता है। इस स्थिति में भगवान शिव और चंद्रदेव की संयुक्त आराधना करते हुए मन ही मन प्रार्थना की जा सकती है। कई परिवारों में यह परंपरा प्रचलित है कि भोलेनाथ के मस्तक पर विराजमान चंद्रदेव को मानसिक रूप से अर्घ्य अर्पित करके श्रद्धापूर्वक पूजा संपन्न की जाती है और उसके पश्चात व्रत का पारण कर लिया जाता है।
उदय की दिशा में मुख करके आह्वान और पूजन
खगोलीय नियम के तहत चंद्रमा का उदय सामान्य रूप से पूर्व दिशा से होता है और वे पश्चिम की ओर अस्त होते हैं। भले ही घने मेघों के कारण दृष्टि साफ न हो, लेकिन निर्धारित समय पर चंद्रदेव का उदय अपने क्रम से अवश्य होता है। ऐसे में महिलाएं पंचांग के अनुसार चंद्रोदय के संभावित समय और दिशा की जानकारी प्राप्त करके पूर्व दिशा की ओर मुख कर सकती हैं। उस दिशा में चंद्रदेव की उपस्थिति की भावना के साथ उनका श्रद्धापूर्वक आह्वान करें, जल से अर्घ्य दें और अपने निर्जला व्रत को पूर्ण करें।
वीडियो कॉल के माध्यम से दर्शन का आधुनिक माध्यम
आज की तकनीक भी धार्मिक परंपराओं के निर्वहन में सहायक सिद्ध हो रही है। यदि आपके स्थानीय क्षेत्र अथवा शहर में मौसम बिगड़ा हुआ है और आकाश पूरी तरह ढका है, जबकि किसी अन्य शहर या रिश्तेदार के यहां चांद साफ दिखाई दे रहा है, तो वहां मौजूद पारिवारिक सदस्यों से वीडियो कॉल के जरिए संपर्क किया जा सकता है। स्क्रीन पर चंद्रमा का दीदार करके पूजन की प्रक्रिया पूरी करने का विकल्प भी कई लोग अपनाते हैं।
अक्षत से चंद्र आकृति का निर्माण
पूजा घर अथवा किसी स्वच्छ स्थान पर साबुत अक्षत यानी चावल के दानों की सहायता से चंद्रमा का सुंदर प्रतीकात्मक आकार बनाया जा सकता है। इस चावल से निर्मित आकृति को साक्षात चंद्रदेव का रूप मानकर धूप, दीप और गंध से विधिपूर्वक पूजा की जा सकती है। इसके उपरांत इस प्रतीकात्मक स्वरूप को अर्घ्य देकर उपवास खोला जा सकता है।
जल पात्र और दीपक की लौ को बनाएं माध्यम
एक स्वच्छ और पवित्र पात्र में शुद्ध जल भरकर उसे पूजा वेदी पर स्थापित किया जा सकता है। इस जल में चंद्रदेव के तेज का स्मरण करते हुए प्रार्थना की जाती है। इसी प्रकार, कुछ परिवारों में जलते हुए दीपक की पवित्र ज्योति को चंद्रदेव का तेज मानकर उसके समक्ष प्रार्थना करने और अर्घ्य की औपचारिकता पूरी करने का नियम भी अपनाया जाता है।
चांदी के सिक्के और दर्पण का प्रतिबिंब विधान
एक पूजा की थाली में थोड़ा साफ जल डालें और उसमें एक शुद्ध चांदी का सिक्का रखें। इसके बाद दर्पण अथवा शीशे की मदद से उस सिक्के का प्रतिबिंब देखकर चंद्रदेव का ध्यान करें। शास्त्रों में चांदी को चंद्र ग्रह का कारक माना गया है, इसलिए इस प्रतीकात्मक दर्शन से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है और इसके पश्चात व्रत खोला जा सकता है।
रात 8 बजकर 39 मिनट पर चंद्रोदय का अनुमान
पंचांग की गणनाओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा के उदय का समय रात्रि 8 बजकर 39 मिनट के करीब आंका गया है। यदि मौसम बाधा बनता है, तो इस निर्धारित समय के पश्चात बताए गए किसी भी प्रतीकात्मक उपाय का चयन करके सुहागिनें पूरे भक्ति भाव से अपनी पूजा संपन्न कर सकती हैं।



















