जीवन की जटिल बाधाओं और ग्रह दोषों से छुटकारा पाने की चाह रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए तेलंगाना का एक पावन स्थल निरंतर आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है। संगारेड्डी जिले के मधुरा गांव में स्थित दत्ताचल क्षेत्रम करीब साढ़े छह शताब्दियों पुराना तीर्थ है। लगभग 650 वर्ष पुराने इस स्वयंभू दत्तात्रेय मंदिर के बारे में यह लोकमान्यता प्रचलित है कि जो भी व्यक्ति यहाँ पूर्ण निष्ठा के साथ शीश नवाता है, उसके जीवन की कठिन से कठिन अड़चनों का समाधान सहज ही निकल जाता है। वैवाहिक जीवन में आने वाले लगातार विलंब, राहु के दुष्प्रभाव और संतान सुख की प्राप्ति में रुकावटों से जूझ रहे लोग विशेष रूप से इस पवित्र भूमि पर अपनी अर्जी लगाने आते हैं।
सर्प दोष मुक्ति और नाग प्रतिष्ठा का धार्मिक महत्व
मंदिर के मुख्य पुजारी ने बताया कि इस देवस्थान में एक पुरातन दिव्य सर्प की उपस्थिति मानी जाती है। इसी अलौकिक प्रभाव के चलते जन्मकुंडली के गंभीर सर्प दोषों के साथ-साथ राहु और केतु से उत्पन्न संकटों के निवारण हेतु यह तीर्थ असाधारण रूप से फलदायी माना जाता है। ऐसे युवक और युवतियां जिनके रिश्ते तय होने में बार-बार बाधाएं आ रही हों, अथवा ऐसे विवाहित जोड़े जो संतान की बाट जोह रहे हों, वे यहाँ पहुंचकर विशिष्ट उपासना करते हैं। इसके अतिरिक्त, मंदिर प्रांगण में शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार नाग प्रतिष्ठा अनुष्ठान कराने का भी बहुत पुराना विधान है, जिसमें भक्त बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
गुफा में बारह वर्षों की घोर साधना और दिव्य दर्शन
धार्मिक परंपराओं में दत्ताचल क्षेत्रम का अतीत बेहद अलौकिक और तपस्या से परिपूर्ण रहा है। मान्यता के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय के प्रमुख अवतार स्वरूप पूज्य नृसिंह सरस्वती स्वामी जी ने इसी स्थल की एक प्राकृतिक गुफा के भीतर लगातार 12 वर्षों की अत्यंत कठिन साधना की थी। इस दीर्घकालिक तप के पूर्ण होने के पश्चात उन्होंने गाणगापुर की ओर प्रस्थान किया था। कालांतर में इसी गुरु परंपरा से ताल्लुक रखने वाले नामधारक ने भी इसी कंदरा में गहन ध्यान लगाया था, जिसके फलस्वरूप भगवान दत्तात्रेय ने उन्हें प्रत्यक्ष रूप से अपने दर्शन दिए थे। गुफा के पाषाण शिलाखंड पर प्राकृतिक रूप से अंकित श्री चक्र तथा अभय मुद्रा वाली विग्रह छवि आज भी दर्शनार्थियों के आकर्षण और भक्ति का मुख्य केंद्र है।
नियमित धार्मिक अनुष्ठान, रात्रि प्रवास और ब्रह्मोत्सव
दत्ताचल क्षेत्रम के आंगन में प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या की पावन तिथियों पर भारी जनसमूह उमड़ता है। पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रातःकाल और निशाकाल में विशिष्ट पूजन, चंडी हवन और रुद्र होम की आहुतियां दी जाती हैं। वहीं अमावस्या की तिथि पर महामृत्युंजय होम का आयोजन विधिवत संपन्न कराया जाता है। अंतरमन की शांति और मनोवांछित फल की प्राप्ति की आस में बहुत से श्रद्धालु इन विशेष तिथियों पर रात भर मंदिर परिसर में रुककर रात्रि प्रवास का संकल्प पूरा करते हैं। देवस्थान पर पधारने वाले प्रत्येक आगंतुक के लिए प्रतिदिन अन्नप्रसाद की सुव्यवस्थित व्यवस्था संचालित रहती है। आगामी 15 से 24 दिसंबर के मध्य आयोजित किए जाने वाले भव्य ब्रह्मोत्सव के उपलक्ष्य में सुब्रमण्य स्वामी कल्याणम और सहस्र चंडी याग जैसे वृहद धार्मिक यज्ञ संपन्न किए जाएंगे।



















