भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पूरे देश में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर भक्त प्रभु के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से जातक के सभी कष्ट दूर होते हैं और परिवार में सुख, समृद्धि तथा शांति का वास होता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसे सही नियमों और निष्ठा के साथ किया जाए।
इस वर्ष बन रहे हैं कई शुभ संयोग
देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंदकिशोर मुद्गल के अनुसार, इस वर्ष जन्माष्टमी का पावन पर्व 16 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन ग्रहों और नक्षत्रों की चाल बेहद शुभ स्थिति निर्मित कर रही है। पंचांगीय गणना के अनुसार इस तिथि पर कृतिका और रोहिणी नक्षत्र का संयोग रहेगा। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग तथा अमृत सिद्धि योग का दुर्लभ मेल भी बन रहा है, जिससे इस दिन की गई साधना और पूजा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
किन्हें उपवास करना चाहिए और किन्हें छूट है
धार्मिक परंपराओं में जन्माष्टमी के व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की कृपा पाने के लिए श्रद्धालु दिनभर निर्जला या फलाहारी उपवास रखते हैं। हालांकि शास्त्रों में शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कुछ लोगों को व्रत से छूट प्रदान की गई है। ज्योतिषाचार्य स्पष्ट करते हैं कि सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति को यह उपवास अवश्य करना चाहिए। घर के अत्यंत बुजुर्ग, गंभीर बीमारियों से पीड़ित महिला या पुरुष तथा छोटे बच्चों को व्रत रखने की बाध्यता नहीं है, क्योंकि उनके लिए स्वास्थ्य रक्षा ही सर्वोपरि धर्म माना गया है।
संकल्प, साधना और खानपान से जुड़े नियम
जन्माष्टमी व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त से होती है। इस दिन तड़के उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर पवित्र जल से स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। खानपान के मामले में बेहद कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। व्रत के दौरान अन्न और साधारण नमक का सेवन पूरी तरह वर्जित रहता है। साथ ही घर में किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन नहीं बनना चाहिए।
उपवास के दौरान केवल दूध और मौसमी फलों का सेवन किया जा सकता है। इसमें भी एक प्रमुख नियम यह है कि भक्त केवल उसी सामग्री को ग्रहण करें जिसे पहले लड्डू गोपाल को भोग के रूप में अर्पित किया गया हो। प्रभु को माखन, मिश्री और सात्विक फलाहार अर्पित करने के बाद ही उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना श्रेष्ठ माना जाता है।
पारण का समय और सही तरीका
जन्माष्टमी के व्रत का समापन यानी पारण भी विशेष नियमों के तहत ही संपन्न होता है। आधी रात को कान्हा के जन्म और महापूजा के तुरंत बाद व्रत नहीं खोला जाता। इस उपवास का पारण अगले दिन सूर्योदय से पहले किया जाता है। अगले दिन भोर में उठकर स्नान करें, प्रभु की आरती करें और उसके बाद ही सात्विक तरीके से पारण कर व्रत को पूर्ण करें। सही तरीके से किया गया पारण ही व्रत के संपूर्ण फल की प्राप्ति कराता है।



















