अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता की परीक्षा सिर्फ मैदान पर नहीं होती, बल्कि पर्दे के पीछे उनके खान-पान की जरूरतों को पूरा करना भी आयोजकों के लिए एक विशाल परीक्षा साबित होता है। जापान की धरती पर आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 के औपचारिक आगाज के साथ ही विभिन्न मुल्कों के सत्रह हजार से ज्यादा खिलाड़ी और उनके सहयोगी दल यहां पहुंच चुके हैं। 16 दिनों की इस मैराथन खेल प्रतियोगिता में 43 विभिन्न स्पर्धाओं के भीतर पदकों की होड़ मचेगी। हालांकि खिलाड़ियों के रहने के इंतजाम को लेकर शुरुआती तौर पर कुछ नाराजगी देखने को मिली है, लेकिन उनके आहार और खान-पान के मोर्चे पर बेहद भव्य और सटीक व्यवस्था खड़ी की गई है।
रसोई का महाविस्तार और रोजाना खपने वाली विशाल रसद
इस बड़े पैमाने की प्रतियोगिता में खिलाड़ियों के पोषण को बनाए रखने के लिए खाद्य सामग्री की खपत हैरान करने वाले आंकड़ों तक पहुंच चुकी है। हर चौबीस घंटे के भीतर खिलाड़ियों के भोजन कक्ष में साठ हजार केले, दो टन चिकन और एक टन चावल की खपत दर्ज की जा रही है। इसके साथ ही पैंतीस हजार पीस ब्रेड और तीस किलोग्राम बादाम प्रतिदिन रसोइयों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। खिलाड़ियों को उनके मनपसंद स्वाद के साथ आवश्यक कैलोरी और पोषण देने के मकसद से रोजाना 450 अलग-अलग प्रकार के व्यंजन परोसने की योजना अमल में लाई जा रही है।
तड़के पांच बजे से देर रात तक सक्रिय रहने वाला संचालन तंत्र
इतने बड़े दल के लिए भोजन जुटाना किसी साधारण बावर्चीखाने का काम नहीं, बल्कि घड़ी की सुइयों के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाला एक जटिल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क है। ग्लोबल हॉस्पिटैलिटी ग्रुप के संस्थापक पीटर राइट के मुताबिक यह महज थाली में खाना सजाना नहीं बल्कि एक विशालकाय आपूर्ति श्रृंखला का संचालन है। यह व्यवस्था सुबह तड़के 5 बजे भोजन की पहली खेप बाहर भेजने के साथ सक्रिय होती है और लगातार काम करते हुए देर रात 1 बजे जाकर थमती है। इस जटिल कार्यप्रणाली को सुचारू बनाए रखने के लिए 25 मुल्कों से आए 80 मुख्य शेफ दिन-रात जुटे हुए हैं, जबकि उनके साथ लगभग 200 कर्मचारियों का कार्यबल सहयोग कर रहा है। भोजन की सूची को दिनभर में चार बार बदला जाता है, जिसमें प्रातःकालीन नाश्ता, दोपहर का मुख्य भोजन, रात का डिनर और देर रात की हल्की खुराक शामिल है।
घरेलू स्वाद और भावनात्मक जुड़ाव की अहमियत
खिलाड़ियों के खान-पान की विविधता पर चर्चा करते हुए पीटर राइट ने बताया कि जब कोई नया खिलाड़ी पहली दफा विदेश आता है, तो वह उसी स्वाद को तलाशता है जो उसे अपनी मां के हाथ से मिलता रहा है या जो उसका स्थानीय खाना रहा है। यही वजह है कि आयोजन भले ही जापानी जमीन पर हो रहा हो, पर खाने की मेज केवल सुशी अथवा साशिमी तक सीमित नहीं है। मेन्यू में थाई, कोरियाई, चीनी, मलेशियन, पश्चिम एशियाई और भारतीय पकवानों को व्यापक जगह दी गई है। भारतीय दल और एशियाई उपमहाद्वीप के खिलाड़ियों के लिए रोगन जोश, गाढ़ी दालें, तीखी करी, ताजा चटनी, गर्मागर्म नान और पारंपरिक बिरयानी का पुख्ता प्रबंध किया गया है।
धार्मिक पाबंदियां और रसोई के सूक्ष्म नियम
इस बहुराष्ट्रीय रसोई में विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों की खान-पान मान्यताओं का भी पूरी बारीकी से सम्मान किया जा रहा है। मांस की आपूर्ति में झटका और हलाल दोनों प्रकार के विकल्पों को अलग-अलग रखा गया है ताकि किसी भी दल की भावनाएं आहत न हों। इसके अलावा रसोइयों के बीच सूक्ष्म सामग्रियों को लेकर होने वाले मतभेदों का भी खास ध्यान रखा गया है। विभिन्न एशियाई व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाले सोया सॉस के मामले में जापानी, कोरियाई और चीनी शेफ अपनी-अपनी मूल रेसिपी के हिसाब से अलग सॉस का इस्तेमाल करते हैं। चार दशकों से अधिक का तजुर्बा रखने वाले पीटर राइट पहले सिडनी, बीजिंग और रियो ओलंपिक के अलावा वैंकूवर शीतकालीन खेलों और दो कॉमनवेल्थ गेम्स में भोजन प्रबंधन संभाल चुके हैं, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय रसोइयों के मिजाज की गहरी समझ है।
बिरयानी की प्रामाणिकता और मेलबर्न का वह पुराना सबक
स्वाद की इसी मौलिकता को लेकर पीटर राइट वर्ष 1992 के उस चर्चित लम्हे को याद करते हैं जब मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में इंग्लैंड और पाकिस्तान की टीमें विश्व कप के खिताबी मुकाबले में आमने-सामने थीं। उस मैच के दिन पाकिस्तानी टीम प्रबंधन की तरफ से बिरयानी की खास फरमाइश आई थी। तब युवा शेफ रहे राइट ने अनुभव न होने के बावजूद यह दावा कर दिया था कि वे इसे आसानी से बना लेंगे। इंटरनेट के अभाव वाले उस दौर में राइट ने अपनी टीम में शामिल एक भारतीय रसोइए की मां को एमसीजी के किचन में आमंत्रित किया, जिन्होंने पूरी टीम को पारंपरिक विधि सिखाई। मैच समाप्त होने पर जब पाकिस्तानी मैनेजर से स्वाद का जायजा लिया गया, तो उन्होंने कहा कि यह खाना अच्छा था लेकिन यह पाकिस्तानी बिरयानी के बजाय भारतीय बिरयानी थी। तब राइट को लगा था कि दोनों में कोई खास अंतर नहीं होता, मगर मैनेजर ने साफ किया कि दोनों का स्वाद और संरचना भिन्न है। राइट के अनुसार उस दिन उन्हें पकवानों की क्षेत्रीय पहचान और उनकी असल प्रामाणिकता का सबसे बड़ा सबक मिला था, जो आज इस खेल महाकुंभ में भी काम आ रहा है।



















