अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भारतीय खिलाड़ियों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है और इसी कड़ी में जूडोका अस्मिता डे ने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्णिम सफलता हासिल की है। ग्लासगो के मैट पर अपनी तकनीकी दक्षता और मानसिक मजबूती का परिचय देते हुए अस्मिता ने हर बाउट में अपनी छाप छोड़ी। अपने इस पहले कॉमनवेल्थ गेम्स अभियान में उन्होंने न केवल विरोधी खिलाड़ियों की चुनौतियों को ध्वस्त किया बल्कि कठिन समय में संयम बनाए रखते हुए देश के लिए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे कड़े अभ्यास, कोच के सही दिशा-निर्देश और विपरीत परिस्थितियों में न हार मानने वाले जज्बे का बड़ा योगदान रहा है।
सेमीफाइनल में मेजबान स्कॉटलैंड की खिलाड़ी और अंपायरिंग की चुनौती
सेमीफाइनल मुकाबला अस्मिता के लिए मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, जहां उनका सामना मेजबान स्कॉटलैंड की नंबर एक जूडोका से था। मैच के शुरुआती चरण में ही रेफरी ने अस्मिता के खिलाफ दो फाउल दे दिए। अस्मिता के अनुसार पहला फाउल नियमानुसार सही था, लेकिन दूसरा निर्णय विवादास्पद और अनुचित महसूस हुआ। घरेलू दर्शक और अंपायरिंग के दबाव के बीच एक पल के लिए आशंका हुई कि शायद उनके साथ पक्षपात किया जा रहा है। हालांकि, अस्मिता ने अपने घबराहट पर जल्द ही काबू पा लिया और रणनीति बदलते हुए आक्रामक खेल अपनाने का फैसला किया।
जूडो के नियमों के मुताबिक निर्धारित चार मिनट के मुख्य समय में नतीजा न निकलने पर मुकाबला 'गोल्डन स्कोर' दौर में चला जाता है। इस चरण में जो खिलाड़ी पहले अंक हासिल करता है, उसे तुरंत विजेता घोषित कर दिया जाता है। अस्मिता ने अपनी एकाग्रता भंग नहीं होने दी और गोल्डन स्कोर पीरियड में शानदार दांव लगाते हुए स्कॉटलैंड की मजबूत दावेदार को पछाड़कर फाइनल में प्रवेश कर लिया।
फाइनल में कनाडा की खिलाड़ी से कड़ा मुकाबला और कोच यशपाल सोलंकी का वो मंत्र
गोल्ड मेडल मुकाबले में अस्मिता का आमना-सामना कनाडा की एक अत्यंत शक्तिशाली जूडोका से हुआ। मैच की शुरुआत में ही कनाडाई खिलाड़ी ने कुछ अंक जुटाकर अस्मिता पर बढ़त बना ली। अचानक हुए इस हमले से अस्मिता कुछ सेकंड के लिए दबाव में आ गईं और उनके मन में विचार आया कि शायद उन्हें सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ेगा। मुकाबला बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका था और भारत की हाथ से स्वर्ण पदक खिसकता नजर आ रहा था।
उसी चुनौतीपूर्ण क्षण में मैट के ठीक बाहर बैठे उनके कोच यशपाल सोलंकी ने जोर से आवाज लगाई। उन्होंने ललकारते हुए कहा कि यह गोल्ड मेडल हमारा है और हमें हर हाल में इसे जीतना ही है। कोच के इन शब्दों ने अस्मिता के अंदर नई ऊर्जा और विश्वास भर दिया। उन्होंने तुरंत मुकाबले में वापसी करते हुए अंक बराबर किए। इसके बाद मैच एक बार फिर गोल्डन स्कोर दौर में पहुंचा, जहां अस्मिता ने सटीक दांव लगाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया और भारत के लिए स्वर्ण पदक सुनिश्चित किया।
त्रिपुरा में स्कूली दिनों से शुरुआत, पिता का साया उठने का दर्द और आध्यात्मिक प्रेरणा
अस्मिता डे का यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा है। उन्होंने वर्ष 2015 में त्रिपुरा स्थित अपने गृह जिले में स्कूली स्तर से जूडो का प्रशिक्षण शुरू किया था। खेल में कदम रखे अभी कुछ ही समय हुआ था कि उनके पिता का निधन हो गया। इस व्यक्तिगत त्रासदी ने उन्हें झकझोर कर रख दिया और एक समय लगा कि उनकी दुनिया समाप्त हो गई है। ऐसे मुश्किल वक्त में उनके कोच और परिवार ने उन्हें संभाला और खेल जारी रखने के लिए प्रेरित किया।
अपने जीवन के संघर्षों पर बात करते हुए अस्मिता ने कहा कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति को सफलता आसानी से नहीं मिलती। उन्होंने आध्यात्मिक संदर्भ देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी कारागार में हुआ था और उन्हें बचपन में अपने माता-पिता से दूर रहना पड़ा था। जब ईश्वर को भी अपने जीवन में इतने संघर्षों से गुजरना पड़ा, तो हम सामान्य मनुष्य हैं। संघर्षों से घबराने के बजाय उनका सामना करना चाहिए।
एशियन गेम्स और वर्ल्ड चैंपियनशिप पर अगला निशाना
कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के बाद अस्मिता डे का ध्यान अब भविष्य की बड़ी प्रतियोगिताओं पर केंद्रित है। उनका अगला मुख्य लक्ष्य एशियन गेम्स और वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व करना है। अस्मिता का कहना है कि वे इन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना चाहती हैं। इसके लिए वे प्रतिदिन कड़ी मेहनत कर रही हैं और अपनी तकनीकों को अधिक धारदार बनाने में जुटी हुई हैं।



















