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मनु भाकर के गुरु जसपाल राणा का दिल का दौरा पड़ने से निधन, शिष्या इतनी टूटीं कि कह नहीं पा रहीं एक शब्दखेल
13 जून 2026, 5:14 am (47 दिन पहले)· 1

मनु भाकर के गुरु जसपाल राणा का दिल का दौरा पड़ने से निधन, शिष्या इतनी टूटीं कि कह नहीं पा रहीं एक शब्द

पेरिस ओलंपिक 2024 में दो कांस्य पदक दिलाने वाले कोच और दिग्गज निशानेबाज जसपाल राणा का 49 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया; मनु भाकर की मां ने बताया कि बेटी इस सदमे में कुछ बोल पाने की हालत में नहीं है।

भारतीय खेल जगत के लिए शुक्रवार का दिन एक गहरा घाव छोड़ गया। देश की सबसे चमकती निशानेबाज मनु भाकर (Manu Bhaker) को ओलंपिक मंच तक पहुंचाने वाले उनके कोच, मार्गदर्शक और खुद एक महान शूटर जसपाल राणा (Jaspal Rana) का दिल का दौरा पड़ने से असमय देहांत हो गया। उनकी उम्र महज 49 वर्ष थी। यह खबर आते ही न सिर्फ खेलप्रेमियों की आंखें भर आईं, बल्कि उनकी सबसे प्रिय शिष्या और उनका परिवार ऐसे सदमे में चला गया जिससे उबर पाना आसान नहीं।

शब्द साथ छोड़ गए हैं मनु का

इस मुश्किल घड़ी में मनु भाकर की मां सुमेधा भाकर ने भरे गले से जो कहा, वही इस क्षति की गहराई बयां करता है। उन्होंने बताया कि मनु अभी ऐसी मानसिक स्थिति में नहीं है कि अपने ‘सर’ के जाने पर कुछ कह सके। यह नुकसान उसके लिए इतना निजी और भीतर तक उतर जाने वाला है कि भावनाएं शब्दों में नहीं ढल पा रहीं। एक खिलाड़ी के लिए उसके गुरु का जाना मानो उसका सुरक्षा कवच छिन जाना होता है, और इस वक्त मनु उसी खालीपन से जूझ रही हैं।

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कोच और खिलाड़ी से कहीं बड़ा था यह रिश्ता

राणा और मनु का नाता सिर्फ प्रशिक्षक और शिष्या तक सीमित नहीं था। इसमें अटूट भरोसा था, कठोर मेहनत थी और खोई हुई पहचान को फिर से हासिल करने की एक जिद थी। एक दौर ऐसा भी आया जब मनु का आत्मविश्वास हिल गया था, ठीक उसी मोड़ पर राणा ने अपनी इस प्रतिभाशाली शिष्या का हाथ थामा। उन्होंने मनु की तकनीक को निखारा ही नहीं, बल्कि उसे मानसिक रूप से चट्टान जैसा मजबूत बना दिया। इसी साझेदारी का फल था कि पेरिस ओलंपिक 2024 में मनु भाकर ने दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास के पन्नों पर अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया। जब मनु के गले में दो ओलंपिक पदक झूल रहे थे, तब पोडियम के पीछे खड़े राणा की आंखों में गर्व और संतोष के आंसू थे। आज जब उनकी शिष्या कामयाबी के शिखर पर है, उनका यही मार्गदर्शक हमेशा के लिए खामोश हो गया।

देहरादून में ही रुक गया परिवार

इस समय देहरादून में राष्ट्रीय निशानेबाजी शिविर चल रहा है, जहां मनु आगामी विश्व कप के ट्रायल्स की तैयारी में जुटी थीं। शुक्रवार को भी उन्होंने अपने ट्रायल्स पूरे किए ही थे कि यह दुखद खबर आ गई और सब कुछ थम-सा गया। सुमेधा ने बताया, ‘मनु के लिए इस वक्त कुछ भी कह पाना मुमकिन नहीं है। वह इस स्थिति में ही नहीं है कि अपने जज्बातों को शब्दों में ढाल सके। हम दोनों इस समय देहरादून में ही हैं। जैसे ही हमें यह खबर मिली, हम दिल्ली के लिए निकलने वाले थे, लेकिन हमें यहीं रुकने के लिए कहा गया क्योंकि सर का पार्थिव शरीर भी उनकी जन्मभूमि उत्तराखंड ही लाया जा रहा है।’ उनकी आवाज में छिपा दर्द बता रहा था कि पूरा परिवार किस कदर बिखर चुका है।

देवभूमि में होगी अंतिम विदाई

राणा का जन्म उत्तराखंड की वादियों में हुआ था, और नियति उन्हें उनके अंतिम सफर के लिए भी इसी देवभूमि में लौटा लाई है। उनके पार्थिव शरीर को देहरादून स्थित उनके निवास और उनकी ही स्थापित की हुई शूटिंग रेंज में रखा जाएगा, ताकि परिजन, देशभर के एथलीट और उनके चाहने वाले अपने नायक के अंतिम दर्शन कर सकें। मनु भी अपने गुरु को विदा देने के लिए देहरादून में ही मौजूद रहेंगी। जिस शूटिंग रेंज में गूंजती गोलियों की आवाज के बीच दोनों ने देश को गौरव दिलाने के सपने बुने थे, आज वहीं सन्नाटा पसरा है।

एक खिलाड़ी, एक द्रोणाचार्य

राणा ने सिर्फ एक खिलाड़ी के तौर पर देश को अनगिनत पदक नहीं दिलाए, जिनमें एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक भी शामिल हैं, बल्कि कोच के रूप में उन्होंने भारत में निशानेबाजों की एक पूरी नई पीढ़ी गढ़ दी। उनका सख्त मिजाज, अनुशासन और खेल के प्रति समर्पण ही उनकी पहचान था। 49 की उम्र जाने की उम्र नहीं होती। मनु और राणा की इस जोड़ी को तो अभी देश के लिए न जाने कितने और कीर्तिमान रचने थे, कितने और पदक जीतने थे, मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। राणा भले आज हमारे बीच न हों, लेकिन मनु के हर उस शॉट में उनकी सिखाई हुई बातें जिंदा रहेंगी जो आगे देश के लिए पदक लाएगा। जब-जब मनु पोडियम पर खड़ी होंगी, उनकी निगाहें उस गुरु को जरूर तलाशेंगी जो हमेशा पीछे खड़ा मुस्कुराता रहता था। देश अपने इस महान सपूत और द्रोणाचार्य को सदा नमन करता रहेगा।

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