अकसर माना जाता है कि पानी के खेल में वही बाजी मार सकता है जो जल की गहराइयों से भली-भांति वाकिफ हो, लेकिन भारतीय रोवर सलमान खान की कहानी इस धारणा को पूरी तरह उलट देती है। सलमान खान को तैरना नहीं आता और उनके भीतर पानी का गहरा खौफ भी बसा हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने अपने साथी सतनाम सिंह के साथ मिलकर एशियाई खेलों की रोइंग स्पर्धा में भारत के लिए ऐतिहासिक कांस्य पदक अपने नाम किया। पानी से डरने वाले खिलाड़ी का पानी के ऊपर ही देश का परचम लहराना किसी चमत्कार से कम नहीं है, खासकर तब जब पदक जीतने वाली यह जोड़ी रेस के फाइनल से महज पांच दिन पहले ही मैदान में उतारी गई थी।
नागारागावा के पानी पर ऐतिहासिक रेस और कांस्य पदक
जापान के नागारागावा वाटर कोर्स पर आयोजित पुरुष युगल स्कल्स स्पर्धा में भारतीय जोड़ी ने बेहतरीन गति और संतुलन का परिचय दिया। सलमान खान और सतनाम सिंह ने 6:13.25 का समय दर्ज करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया और कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। इस मुकाबले में स्वर्ण पदक जीतने वाली चीनी टीम से भारतीय जोड़ी सिर्फ 3.48 सेकंड पीछे रही, जबकि उज़्बेकिस्तान की रजत पदक विजेता टीम से उनका अंतर महज 2.76 सेकंड का रहा। साल 1982 में एशियाई खेलों में रोइंग को शामिल किए जाने के बाद से पुरुष युगल स्कल्स स्पर्धा में भारत का यह पहला ऐतिहासिक पदक है।
रेस की शुरुआत बेहद रोमांचक रही और भारतीय रोवर्स ने शुरुआत से ही अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी। 2000 मीटर लंबी इस मैराथन रेस में 1500 मीटर तक सलमान और सतनाम दूसरे स्थान पर मजबूती से डटे हुए थे और भारत के लिए रजत पदक पक्का लग रहा था। हालांकि, आखिरी 500 मीटर के कठिन दौर में उज़्बेकिस्तान के रोवर्स ने अपनी रफ्तार बढ़ाई और भारतीय नाव तीसरे स्थान पर फिसल गई। इस मामूली अंतर के बावजूद दोनों खिलाड़ियों ने अपनी अद्भुत ऊर्जा से देश को गर्व का पल थमा दिया।
कैब चलाने से सेना तक का संघर्ष
सलमान खान की यह कामयाबी किसी साधारण खेल यात्रा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह अभावों और दुखों के खिलाफ लड़ी गई एक लंबी जंग का नतीजा है। दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर कभी ओला और उबर जैसी कैब चलाने वाले सलमान के जीवन में सब कुछ सामान्य नहीं था। उनके पिता के असमय इंतकाल ने पूरे परिवार को बेसहारा छोड़ दिया था। छह बच्चों वाले इस परिवार में चार भाई और दो बहनें थीं, जिनका कोई अभिभावक नहीं बचा था। ऐसे कठिन वक्त में सत्रह-अठारह साल के युवा सलमान ने आगे बढ़कर पूरे घर की जिम्मेदारी अपने मजबूत कंधों पर उठा ली।
घर का चूल्हा जलाने के लिए उन्होंने दिल्ली में दिन-रात टैक्सी चलाई और जो भी काम मिला, मेहनत से किया। उनकी शारीरिक बनावट और कद-काठी को देखकर रिश्तेदारों व पड़ोसियों ने उन्हें फौज में भर्ती होने की नेक सलाह दी। हालांकि, पहली बार में किस्मत ने साथ नहीं दिया और वह सेना की भर्ती परीक्षा में असफल हो गए। इस विफलता से निराश होकर सलमान ने परिजनों से कह दिया था कि अब वह केवल गाड़ी चलाएंगे और इसी में अपना भविष्य देखेंगे। लेकिन परिवार के हौसले और अपनी जिद के दम पर उन्होंने दोबारा कोशिश की और सफल होकर सेना में दाखिला पा लिया। सेना में उनकी शानदार शारीरिक फिटनेस ने प्रशिक्षकों का ध्यान खींचा और उन्हें खेलों के लिए चुन लिया गया, यद्यपि उन्होंने खुद कभी रोइंग का खेल नहीं मांगा था।
पानी का डर और शुरुआती हादसे की कड़वी यादें
रोइंग में आने के बाद सलमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी का डर था। प्रशिक्षण के शुरुआती दिनों में एक अभ्यास सत्र के दौरान उनकी नाव पलट गई थी। इस हादसे ने उनके मन में ऐसा खौफ पैदा किया जो कभी पूरी तरह से नहीं मिट सका। आज भी सलमान को तैरना नहीं आता, लेकिन सेना के अनुशासन और खुद को साबित करने के जज्बे ने उन्हें इस मानसिक बाधा को पार करने की ताकत दी। हर बार जब वह चप्पू थामते, तो अपने डर का सामना करते हुए सिर्फ आगे की ओर देखते।
सतनाम सिंह का साथ और 5 दिन की हैरान करने वाली तैयारी
दूसरी तरफ, पंजाब से ताल्लुक रखने वाले सतनाम सिंह पहले राष्ट्रीय स्तर के हैंडबॉल खिलाड़ी थे। उनके खेल जीवन को नई दिशा तब मिली जब 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में लाइटवेट डबल स्कल्स के स्वर्ण पदक विजेता ओलंपियन स्वर्ण सिंह विर्क ने उनके भीतर छिपी रोइंग प्रतिभा को पहचाना और उन्हें तराशना शुरू किया। सतनाम के पास पहले से ही हांगझोउ 2023 एशियाई खेलों में जीती गई क्वाड्रपल स्कल्स स्पर्धा का कांस्य पदक था।
नागोया में होने वाले इस मुकाबले से ठीक पहले भारतीय शिविर में एक बड़ा फेरबदल हुआ। आखिरी पलों में क्रू में बदलाव किए जाने से दोनों एथलीटों की महीनों की मेहनत और तैयारी पूरी तरह पटरी से उतर गई थी। सतनाम सिंह के मुताबिक, इस अचानक हुए फैसले से खेल शिविर के माहौल में भारी निराशा और मायूसी छा गई थी। दो ऐसे रोवर्स, जिनका आपस में पहले से कोई तालमेल या अभ्यास नहीं था, उन्हें फाइनल से सिर्फ पांच दिन पहले एक ही नाव में बैठाकर चप्पू थमा दिए गए। इतने कम समय में एक-दूसरे के स्ट्रोक्स को समझना और अंतरराष्ट्रीय मंच पर तालमेल बिठाना लगभग असंभव था, लेकिन इस जोड़ी ने पानी पर उतरकर करिश्मा कर दिखाया।
घर में भोर की दुआएं और जश्न का माहौल
जापान में जब सलमान पानी पर इतिहास रचने के लिए पसीना बहा रहे थे, उस वक्त हजारों मील दूर उनके घर पर उम्मीदों और दुआओं का दौर चल रहा था। सलमान की वालिदा जबरुन निशा बेटे के इस अहम मुकाबले से पहले कई रातों से ठीक से सो नहीं सकी थीं। फाइनल की सुबह करीब चार बजे पूरा परिवार नींद से जाग गया और सबने मिलकर सलमान की जीत के लिए दुआएं मांगीं। सुबह पांच बजते-बजते जापान से कांस्य पदक जीतने की सुखद खबर आ गई।
पदक की पुष्टि होते ही घर में खुशी की लहर दौड़ गई। जबरुन निशा ने कहा कि यह कामयाबी सिर्फ उनके घर की नहीं, बल्कि पूरे गांव, पड़ोस और समूचे हिंदुस्तान की है, जिसके मान को उनके बेटे ने विश्व पटल पर ऊंचा कर दिया। गले में टंगे कांस्य पदक की मुस्कान के पीछे वर्षों का पसीना, कैब ड्राइवर के रूप में झेली गई तंगहाली और एक मां की सुबह की दुआएं छिपी हुई हैं।


















