अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भारतीय बेटियों की सफलता गाथा में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित जोबनेर कस्बे की युवा तीरंदाज खुशी कुमावत ने अपनी अद्भुत प्रतिभा और लगन के दम पर विश्व स्तर पर तिरंगा लहराया है। दक्षिण कोरिया की धरती पर आयोजित विश्व तीरंदाजी युवा आमंत्रण प्रतियोगिता 2026 में खुशी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक पर अचूक निशाना साधा। साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का यह सफर खुशी के कड़े संघर्ष और अटूट संकल्प को दर्शाता है।
रोमांचक फाइनल में कोरिया-ए को पछाड़कर कब्जाया गोल्ड
दक्षिण कोरिया में आयोजित इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खुशी कुमावत ने अंडर-21 महिला रिकर्व टीम स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस टीम में उनके साथ दो अन्य होनहार तीरंदाज प्रंजल कोंडापावुलुरी और युक्ताश्री भी शामिल थीं। भारतीय त्रिमूर्ति ने पूरी प्रतियोगिता के दौरान उत्कृष्ट तालमेल और तकनीकी निपुणता का प्रदर्शन किया। फाइनल मुकाबला बेहद रोमांचक और दबाव से भरा था, जहां भारतीय टीम का सामना मेजबान कोरिया-ए की मजबूत टीम से उन्हीं के घरेलू मैदान पर हुआ। अत्यधिक मानसिक दबाव के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने बेहतरीन संयम बनाए रखा और कोरिया-ए को 5-3 के अंतर से पराजित करके स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया।
क्वालिफाइंग राउंड से लेकर ग्रुप मैचों तक का शानदार सफर
स्वर्ण पदक तक पहुंचने की यह यात्रा किसी भी चरण में आसान नहीं थी। प्रतियोगिता के क्वालिफाइंग दौर में भारतीय टीम ने सामूहिक रूप से 1890 अंक जुटाकर तालिका में तीसरी रैंक हासिल की थी। इस दौर में खुशी कुमावत ने व्यक्तिगत रूप से 634 अंक हासिल करके नौवां स्थान प्राप्त किया। इसके बाद ग्रुप चरण के मुकाबलों में भारतीय टीम ने अपनी रणनीति पर मजबूती से अमल करते हुए कोरिया-बी की टीम को 5-3 से हराया। व्यक्तिगत स्पर्धा के मुकाबले में भी खुशी का दबदबा कायम रहा, जहां उन्होंने सिंगापुर की खिलाड़ी को एकतरफा अंदाज में 6-0 से मात दी। इस प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि खुशी अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजी के शीर्ष परिदृश्य में अपनी जगह पक्की कर चुकी हैं।
गुलेल के निशाने से अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजी तक का अनोखा सफर
खुशी कुमावत की इस उपलब्धि की जड़ें उनके गांव जोबनेर में बिताए गए निरंतर अभ्यास के दिनों में छिपी हैं। खुशी जयपुर ग्रामीण क्षेत्र से भारतीय तीरंदाजी टीम में जगह बनाने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी हैं। उनके पिता सांवर मल कुमावत बताते हैं कि खुशी ने अपने लक्ष्य को पाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। घर पर ही अभ्यास के लिए जगह बनाई गई थी, जहां वह तीर-कमान के पारंपरिक अभ्यास के साथ-साथ गुलेल से पेड़ों पर लगे फलों पर निशाना साधती थीं। निशाना सटीक लगाने का यही अनूठा और निरंतर अभ्यास आज उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम के शीर्ष पायदान तक ले आया है।
ताइवान के अनुभव ने निखारी प्रतिभा
पारंपरिक शिक्षा की तुलना में खेल को प्राथमिकता देने वाली खुशी का मानना है कि उनका पूरा ध्यान तीरंदाजी की तकनीकों को बेहतर बनाने पर केंद्रित रहा है। राष्ट्रीय चयन ट्रायल्स में शीर्ष प्रदर्शन के बल पर भारतीय टीम में चुना जाना उनके करियर का बड़ा मोड़ रहा। इससे पहले वर्ष 2023 में खुशी ने ताइवान में आयोजित एशिया कप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था। ताइवान के उस अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उनके खेल कौशल और मैच की परिस्थितियों को समझने की क्षमता को काफी परिपक्व बनाया। उसी अनुभव और कड़ी मेहनत का फल अब दक्षिण कोरिया में जीते गए इस ऐतिहासिक स्वर्ण पदक के रूप में सामने आया है।



















