अक्सर मान लिया जाता है कि बड़ा कारोबार सिर्फ वही खड़ा कर सकता है जिसके पास ऊँची डिग्रियाँ हों या मोटी पूँजी। कर्नाटक के बेल्लारे गाँव के एक साधारण पुजारी के बेटे सत्य शंकर की कहानी इस धारणा को सिरे से खारिज कर देती है। सिर्फ 12वीं तक पढ़े सत्य शंकर के पिता के पास आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने तक के पैसे नहीं थे, और गुजारे के लिए उन्हें सड़कों पर ऑटो रिक्शा चलाना पड़ा। बावजूद इसके, बड़ा कुछ कर गुजरने का उनका सपना कभी कमजोर नहीं पड़ा। आज वही सत्य शंकर करोड़पति हैं और उनका देसी ब्रांड पेप्सी तथा कोका-कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधी टक्कर दे रहा है।
₹900 करोड़ का कारोबारी साम्राज्य
आज सत्य शंकर का समूह एसजी कॉर्पोरेट्स करीब ₹900 करोड़ के टर्नओवर तक पहुँच गया है। इसमें उनके पेय और स्नैक्स कारोबार हाउस ऑफ बिंदु की कीमत ₹570 करोड़ आँकी जाती है, जबकि उनकी फाइनेंस इकाई प्रवीण कैपिटल की वैल्यू ₹330 करोड़ है। उनकी कंपनियाँ जीरा मसाला, मैंगो जूस और स्नैक्स समेत 55 से ज्यादा उत्पाद बेचती हैं। इनमें सबसे चर्चित बिंदु फिज़ जीरा मसाला दक्षिण भारत में बेहद लोकप्रिय है। कर्नाटक और तेलंगाना के बाद अब आंध्र प्रदेश में भी उनकी नई फैक्ट्रियाँ खड़ी हो रही हैं।
ऑटो की कमाई से एंबेसडर तक
सत्य शंकर का जन्म एक बेहद मामूली परिवार में हुआ। साल 1984 में, 18 साल की उम्र में पढ़ाई छूट जाने के बाद उन्होंने एक सरकारी योजना के तहत कर्ज लेकर एक ऑटो रिक्शा खरीदा। साल भर कड़ी मेहनत कर उन्होंने पूरा कर्ज चुकाया और फिर वही ऑटो बेचकर एक एंबेसडर कार ले ली। इसी कार से वे अक्सर विदेशी पर्यटकों को घुमाया करते थे। यहीं उन्होंने एक बात गौर की कि पर्यटक सबसे पहले पानी की बोतल खरीदते हैं। इसी पल उन्हें समझ आ गया कि साफ और सुरक्षित पानी का आने वाले वक्त में बहुत बड़ा बाजार बनने वाला है।
दुकान, टायर और फाइनेंस का तजुर्बा
1988 में उन्होंने अपनी कार बेच दी और पुत्तूर में स्पेयर पार्ट्स की एक छोटी दुकान खोल ली, जहाँ जल्द ही टायर बेचना भी शुरू कर दिया। यहीं उन्होंने देखा कि गाँव के लोग और किसान अक्सर उधार पर सामान लेते हैं और छोटी-छोटी किस्तों में चुकाते हैं। शंकर ने तर्क लगाया कि जब ये लोग किस्तों में भुगतान कर सकते हैं, तो इन्हें कर्ज भी दिया जा सकता है। इसी सोच के साथ 1994 में उन्होंने आम लोगों को कर्ज देने के लिए प्रवीण कैपिटल नाम से फाइनेंस कंपनी शुरू की और सेकंड-हैंड गाड़ियों पर लोन देने लगे। उस दौर में यह एक नया प्रयोग था, क्योंकि ज्यादातर फाइनेंसर पुरानी गाड़ियों के लिए कर्ज देने से बचते थे।
साल 2000 और बिंदु ब्रांड का जन्म
साल 2000 में सत्य शंकर ने अपने दिल के सबसे करीब रहे पानी के कारोबार को हकीकत में उतारने की ठानी। उन्होंने भारी बारिश वाले नरिमोगेरू गाँव में अपनी पहली फैक्ट्री लगाई और ब्रांड का नाम रखा 'बिंदु', जिसका कन्नड़ में मतलब होता है बूँद। उत्तर भारत की एक यात्रा के दौरान उन्होंने एक स्थानीय दुकान पर सोडे में जीरा पाउडर और नमक मिलाकर बिकते देखा। आसपास के लोगों को उसका मजा लेते देखकर उनके मन में विचार आया कि इसी स्वाद को एक ब्रांडेड और बेहतर पैकेज्ड उत्पाद में बदला जा सकता है। उनके सबसे मशहूर प्रोडक्ट बिंदु फिज़ जीरा मसाला की नींव यहीं पड़ी।
आसान नहीं रहा देसी स्वाद का सफर
देसी स्वाद को बाजार में जमाना आसान नहीं था। उस समय बाजार पर कोका-कोला और पेप्सी जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों का दबदबा था। शुरुआत में जब बिंदु फिज़ के 200 बॉक्स बाजार में भेजे जाते, तो दुकानदार उनमें से 100 बॉक्स वापस लौटा देते थे। बड़ी कंपनियों की तरह विज्ञापनों पर खर्च करने के पैसे शंकर के पास नहीं थे। प्रचार के लिए उन्होंने पूरी तरह देसी रास्ता चुना और हाईवे की दीवारों पर पेंटिंग करवाकर अपने ब्रांड को आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे यह मेहनत रंग लाई, बिंदु फिज़ जीरा मसाला का स्वाद लोगों की जुबान चढ़ गया और यह ड्रिंक सुपरहिट साबित हुई।













