प्लास्टिक और स्टायरोफोम के कचरे से पूरी दुनिया जूझ रही है, लेकिन ब्राजील के एक स्कूली छात्र ने इस गंभीर समस्या का प्राकृतिक और बेहद आसान समाधान खोज निकाला है। परान्ना राज्य के कूरितिबा शहर में रहने वाले 14 वर्षीय छात्र लुकास तादाओ सुगाहारा वर्निक ने कसावा के छिलकों और अराउकारिया पेड़ की सूखी टहनियों का इस्तेमाल करके एक ऐसी बायोडिग्रेडेबल ट्रे बनाई है जो बाजार में बिकने वाली स्टायरोफोम पैकेजिंग की जगह ले सकती है। यह अनोखा प्रयोग स्कूल के एक साधारण साइंस प्रोजेक्ट से शुरू हुआ था, जो अब पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी मिसाल बन चुका है। कोलेजियो बॉम जीजस सेंट्रो स्कूल में पढ़ाई करने वाले लुकास ने साइंटिफिक इनिशिएशन की कक्षा के दौरान यह जानने का प्रयास किया था कि औद्योगिक कचरा पर्यावरण में कहां जाकर इकट्ठा होता है। इसी जिज्ञासा ने उन्हें कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की प्रेरणा दी। आठवीं कक्षा में कदम रखने के बाद से शुरू हुआ उनका यह शोध नौवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते 30 से अधिक बायोडिग्रेडेबल ट्रे के निर्माण में तब्दील हो चुका है।
स्टायरोफोम का संकट और प्राकृतिक विकल्पों की खोज
बाजार में फल, सब्जियां, मांस और अन्य खाद्य सामग्रियों की पैकेजिंग के लिए बड़े पैमाने पर स्टायरोफोम का इस्तेमाल किया जाता है। स्टायरोफोम हल्का और सस्ता तो होता है, लेकिन इसका उपयोग खत्म होने के बाद जब इसे फेंक दिया जाता है, तो यह सदियों तक मिट्टी में वैसा ही पड़ा रहता है। पर्यावरण विज्ञान की गणनाओं के अनुसार, सामान्य स्टायरोफोम को पूरी तरह से नष्ट होकर मिट्टी में घुलने-मिलने में करीब 700 साल का लंबा समय लग जाता है। इस गंभीर परिस्थिति को समझते हुए लुकास ने अपने आसपास आसानी से मिलने वाले जैविक कचरे पर ध्यान केंद्रित किया। ब्राजील में कसावा की पैदावार बड़े पैमाने पर होती है और इसके छिलके को आमतौर पर बेकार मानकर फेंक दिया जाता है या फिर बहुत कम मात्रा में पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी तरफ, अराउकारिया पेड़ परान्ना राज्य का आधिकारिक प्रतीक माना जाता है। इस पाइन प्रजाति के पेड़ की टहनियां और पत्ते स्वाभाविक रूप से टूटकर गिरते रहते हैं और पार्कों व बगीचों के कचरे में एकत्र हो जाते हैं। लुकास ने इन दोनों अनुपयोगी जैविक पदार्थों को मिलाकर एक नया पैकेजिंग मिश्रण तैयार किया।
निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया और तकनीक
कसावा के छिलके और अराउकारिया के अवशेषों से टिकाऊ ट्रे बनाने के लिए एक विशेष प्रक्रिया का पालन किया जाता है। सबसे पहले एकत्र किए गए कसावा के छिलकों और अराउकारिया की सूखी पत्तियों व टहनियों को अच्छी तरह साफ किया जाता है, ताकि किसी तरह की गंदगी न रहे। इसके बाद इन्हें पूरी तरह सुखाकर बारीक पाउडर के रूप में पीसा जाता है। तैयार पाउडर में पानी और प्राकृतिक बाइंडिंग एजेंट के रूप में कसावा स्टार्च मिलाया जाता है। इस पूरे गाढ़े मिश्रण को गर्म करके विशेष सांचों में डाला जाता है और दबाव देकर सुखा लिया जाता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पेट्रोलियम आधारित किसी भी प्लास्टिक, पॉलिमर या हानिकारक रासायनिक गोंद की जरूरत नहीं पड़ती। कसावा स्टार्च खुद ही प्राकृतिक चिपकने वाले पदार्थ की तरह काम करता है और पूरे मिश्रण को मजबूती से जोड़े रखता है। इसका नतीजा यह होता है कि जहां आम स्टायरोफोम 700 साल तक मिट्टी को प्रदूषित करता है, वहीं लुकास द्वारा बनाई गई यह जैविक ट्रे महज 30 दिनों के भीतर मिट्टी में घुल-मिल जाती है। हालांकि मिट्टी की नमी, तापमान और सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी के हिसाब से इस समय सीमा में थोड़ा बदलाव हो सकता है, लेकिन 30 दिन का यह समय स्टायरोफोम के मुकाबले बेहद क्रांतिकारी है।
कठोर वैज्ञानिक परीक्षण और परिणाम
प्रयोगशाला में ट्रे तैयार करने के बाद लुकास ने इसके व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को परखने के लिए कई तरह के परीक्षण किए। इस बायोडिग्रेडेबल ट्रे की दबाव सहने की क्षमता, मरोड़ प्रतिरोध, पानी सोखने की दर और मिट्टी में घुलने की गति जैसे मानकों की गहन जांच की गई। ट्रे की जैविक अपघटन दर जांचने के लिए नमूनों को नम मिट्टी में दबाकर नियमित अंतराल पर उनका अवलोकन किया गया। इन सभी जांचों के नतीजों से साबित हुआ कि यह ट्रे खाद्य पैकेजिंग के लिए आवश्यक मजबूती और लचीलापन प्रदान करती है, जबकि पर्यावरण को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती।
प्रोजेक्ट की सफलता और भावी योजनाएं
लुकास का यह शोध केवल उनके स्कूल के क्लासरूम तक सीमित नहीं रहा। उनके इस नवाचार को पीयूसीपीआर साइंस फेयर जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुत किया गया और साइंटिफिक इनिशिएशन सिम्पोजियम की आधिकारिक कार्यवाही में भी शामिल किया गया। इस शानदार काम के लिए लुकास को कई राष्ट्रीय विज्ञान कार्यक्रमों में आमंत्रित किया गया है और परान्ना की संघीय यूनिवर्सिटी (यूएफपीआर) की ओर से उन्हें स्कॉलरशिप भी प्रदान की गई है। लुकास की भविष्य में योजना इस प्राकृतिक बायोडिग्रेडेबल मिश्रण का विस्तार आर्किटेक्चर, उत्पाद डिजाइन और सजावट के क्षेत्रों में करने की है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल 40 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा पैकेजिंग सामग्री का होता है। आज दुनिया भर के शोधकर्ता मक्के के स्टार्च, गन्ने की खोई, चावल की भूसी और कसावा जैसे कृषि अपशिष्टों से टिकाऊ पैकेजिंग बनाने पर काम कर रहे हैं। लुकास तादाओ सुगाहारा वर्निक का यह छोटा सा प्रयोग इसी वैश्विक शोध यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो यह साबित करता है कि एक स्कूली छात्र की सोच भी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।



















