रक्षाबंधन के पावन पर्व पर बिलासपुर के बाजारों में रंग-बिरंगी राखियों की रौनक छाई हुई है और हर तरफ खरीदारी का माहौल है। इसी त्यौहारी चहल-पहल के बीच सरकंडा बंगाली पारा के रहने वाले विपिन परमार अपनी कड़ी मेहनत और बुलंद हौसलों से आत्मनिर्भरता की एक अनूठी मिसाल कायम कर रहे हैं। विपिन आंखों और पैरों से दिव्यांग हैं और चलने-फिरने के लिए लाठी का सहारा लेते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी किसी भी शारीरिक चुनौती को कभी भी अपनी कमजोरी या तरक्की की राह में रुकावट नहीं बनने दिया। इन दिनों वे शहर की गलियों और बाजारों में घूम-घूमकर राखियां बेच रहे हैं और अपनी इस मेहनत के दम पर रोजाना 800 से 1000 रुपए तक की कमाई कर रहे हैं।
मुश्किलों के बावजूद नहीं मानी हार
विपिन परमार के लिए जिंदगी का सफर कभी भी आसान नहीं रहा है, लेकिन उन्होंने हर कदम पर डटकर मुकाबला किया और कभी भी कठिन परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। आंखों से रोशनी न होने और पैरों से चलने में भारी परेशानी होने के बावजूद उन्होंने स्वरोजगार को ही अपनी जिंदगी का मुख्य सहारा बनाया। उनका अटूट विश्वास है कि इंसान यदि पूरी ईमानदारी के साथ लगातार मेहनत करता रहे, तो मुश्किलें खुद-ब-खुद पीछे छूट जाती हैं और आगे बढ़ने के नए रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं।
मौसम के अनुसार बदलते हैं कारोबार का तरीका
अपनी आजीविका के बारे में विस्तार से बताते हुए विपिन साझा करते हैं कि उन्होंने अपने इस छोटे से सफर की शुरुआत सबसे पहले राखियां बेचकर ही की थी। इसके बाद उन्होंने समय और जरूरत के हिसाब से अगरबत्ती और अन्य तमाम प्रकार का मौसमी सामान बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने यह समझ विकसित कर ली कि हर सीजन में किस तरह का सामान डिमांड में रहता है और उसी हिसाब से चीजें बेचकर अपनी आमदनी का एक पक्का जरिया तैयार कर लिया। इस छोटी सी कमाई से वे न सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी करते हैं, बल्कि अपने बुजुर्ग माता-पिता के लिए भी जरूरी सामान जुटाने में पूरा सहयोग करते हैं।
शहर के अलग-अलग इलाकों में रोजाना की दौड़भाग
विपिन अपनी सुविधा के अनुसार सुबह या दिन के समय अपने घर से निकलते हैं और बिलासपुर शहर के विभिन्न इलाकों का रुख करते हैं। वे मुख्य बाजारों से लेकर रिहायशी इलाकों तक पैदल ही चक्कर लगाते हैं और लोगों को राखियां दिखाते हैं। इस रक्षाबंधन के सीजन में वे अपने पास 20 रुपए से लेकर 60 रुपए तक की अलग-अलग रेंज की खूबसूरत राखियां लेकर आए हैं। उनकी बिक्री के उतार-चढ़ाव के आधार पर उनकी एक दिन की कुल कमाई कभी 800 रुपए तो कभी 1000 रुपए तक आसानी से पहुंच जाती है।
लाठी के सहारे तय करते हैं रोजाना का सफर
सबसे हैरान करने वाली और प्रेरणादायक बात यह है कि आंखों में बिल्कुल भी रोशनी न होने के बावजूद विपिन शहर की व्यस्त सड़कों पर अकेले ही आवाजाही करते हैं। वे अपने हाथ में रखी लाठी को ही अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक और सहारा बनाते हैं, जिसके जरिए वे जमीन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों का अंदाजा लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। सरकंडा और उसके आसपास के तमाम इलाकों में वे खुद लोगों के बीच पहुंचते हैं। कभी किसी शांत जगह पर बैठकर तो कभी सीधे दुकानों और दफ्तरों के अंदर जाकर ग्राहकों को अपनी राखियां बेचते हैं।
संतोष और सादगी से भरी जीवनशैली
ईश्वर की दी हुई जिंदगी के प्रति विपिन के मन में किसी भी प्रकार की कोई शिकायत या मलाल नहीं है। उनका साफ तौर पर कहना है कि भगवान ने उन्हें जितना भी दिया है, वे उसी में पूरी तरह से संतुष्ट और खुशहाल हैं। उनका पक्का इरादा और उनकी खुद की मेहनत ही उनकी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। वे किसी पर भी बोझ बनने के बजाय लगातार काम करते रहना चाहते हैं और अपनी मेहनत की कमाई के बल पर ही जिंदगी में आगे बढ़ना चाहते हैं।
बहनों से की त्योहार पर सहयोग की अपील
इस पवित्र रक्षाबंधन के त्योहार के मौके पर विपिन ने शहर की तमाम बहनों से एक खास अपील की है। उन्होंने कहा कि बहनें उनके पास आएं और उनसे ही अपनी पसंद की राखियां खरीदें। उनका मानना है कि बहनों का स्नेह, प्यार और उनका आशीर्वाद उन्हें और अधिक मेहनत करने की अंदरूनी ताकत देता है। वे आने वाले समय में भी अपनी कड़ी मेहनत जारी रखना चाहते हैं ताकि लोगों के लिए और भी बेहतर और सुंदर सामान बाजार में लेकर आ सकें।
समाज के लिए एक प्रेरणास्त्रोत
बिलासपुर के विपिन परमार की यह पूरी कहानी उन तमाम लोगों के लिए एक बहुत बड़ा सबक और प्रेरणा है जो थोड़ी सी शारीरिक चुनौती या मामूली सी कठिन परिस्थिति आते ही अपना हौसला खो बैठते हैं। उन्होंने अपनी किसी भी दिव्यांगता को अपनी पहचान नहीं बनने दिया, बल्कि उसकी जगह पूरी हिम्मत के साथ मेहनत और स्वरोजगार के रास्ते को चुना। आज वे राखियां बेचकर न सिर्फ अपनी रोजमर्रा की सभी जरूरतें खुद पूरी कर रहे हैं, बल्कि समाज के सामने आत्मनिर्भरता की एक ऐसी मिसाल पेश कर रहे हैं जिसे हमेशा याद रखा जाएगा।



















