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फॉर्च्यूनर से आते हैं, हाथ में झाड़ू उठाते हैं: पिता के कफन तक के नहीं थे पैसे, आज कर्नाटक के इस शख्स की सफलता है मिसालसक्सेस स्टोरी
24 अग॰ 2026, 6:14 pm (4 घंटे पहले)· 0

फॉर्च्यूनर से आते हैं, हाथ में झाड़ू उठाते हैं: पिता के कफन तक के नहीं थे पैसे, आज कर्नाटक के इस शख्स की सफलता है मिसाल

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के बिसरोड़ी में रहने वाले सेसप्पा की कहानी प्रेरणादायक है, जो फॉर्च्यूनर कार से काम पर आते हैं और सड़कों की सफाई करते हैं।

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के बिसरोड़ी इलाके में रहने वाले सेसप्पा की कहानी बेहद अनोखी और प्रेरणा से भरी हुई है। आमतौर पर महंगी गाड़ियों में चलने वाले लोगों को देखकर आरामदेह जिंदगी का अंदाजा लगाया जाता है, लेकिन सेसप्पा की सुबह एक बिल्कुल अलग ही तस्वीर के साथ शुरू होती है। वह फॉर्च्यूनर जैसी लग्जरी गाड़ी से काम पर पहुंचते हैं और फिर हाथ में झाड़ू थामकर सड़कों की सफाई में जुट जाते हैं। यह नजारा पहली नजर में किसी को भी हैरान कर सकता है, लेकिन उनकी यह सफलता रातों-रात नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों का कड़ा संघर्ष, पसीना और काम के प्रति अटूट सम्मान छिपा है।

साल 1999 से शुरू हुआ संघर्ष और मुफस्लिसियां

सेसप्पा ने अपने कामकाजी जीवन की शुरुआत साल 1999 में सिविल सेवा से जुड़ी सफाई और मजدूरी के काम से की थी। उस शुरुआती दौर में उनकी आर्थिक स्थिति इतनी तंग थी कि उन्हें रोजाना महज 50 रुपये ही मेहनताना मिलता था। घर की खराब आर्थिक स्थिति और निजी जीवन की तमाम मुश्किलों के चलते वह मानसिक रूप से टूट चुके थे और धीरे-धीरे उन्हें शराब की बुरी लत लग गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि उन्हें अपनी बिखरी हुई जिंदगी को दोबारा संभालना बेहद मुश्किल लगने लगा और भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नजर आने लगा।

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एक मुलाकात ने पलट दी जिंदगी की दिशा

उनकी जिंदगी में वह निर्णायक मोड़ साल 2005 में आया जब उनकी मुलाकात बांटवाल थाने में तैनात सब-इंस्पेक्टर बेलियप्पा से हुई। पुलिस अधिकारी के साथ हुई उस मुलाकात और उनकी कही गई बातों ने सेसप्पा की सोच को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। उन्होंने उसी वक्त शराब को हमेशा के लिए अलविदा कहने का कड़ा फैसला किया और अपनी जिंदगी की बागडोर खुद अपने हाथों में लेने की ठान ली। इसके बाद उन्होंने अनुशासन और लगातार मेहनत को अपना हथियार बनाया तथा कभी भी किसी भी काम को छोटा या कमतर नहीं आंका।

कड़ी मेहनत और दिनचर्या का अनुशासन

आज भी सेसप्पा की दिनचर्या सुबह करीब 5 बजे से शुरू हो जाती है। वह दोपहर तक लगातार सड़कों पर झाड़ू लगाने, कचरा हटाने और कार्यालय का कचरा उठाने वाले वाहन को चलाने जैसे तमाम काम पूरी ईमानदारी से करते हैं। इसके बाद भी वह आराम करने के बजाय अपनी आमदनी को बढ़ाने के लिए खेती-किसानी, डेयरी संचालन और अन्य छोटे-बड़े काम करते हैं। इन तमाम प्रयासों के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया और आज उनके पास अपनी मेहनत के दम पर खरीदी गई फॉर्च्यूनर जैसी गाड़ी है, जिसे देखकर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि उन्होंने कितनी गरीबी देखी है।

पिता के अंतिम संस्कार तक के नहीं थे पैसे

सेसप्पा के जीवन का सबसे दर्दनाक और झकझोर देने वाला पल उनके पिता के निधन से जुड़ा है। जब उनके पिता की मृत्यु हुई, तब उनके पास अंतिम संस्कार करने तक के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे। उस विपत्ति के समय उनकी मदद के लिए कोई भी आगे नहीं आया। आखिरकार उन्हें अकेले ही अपने पिता के पार्थिव शरीर को नेत्रावती नदी के किनारे ले जाना पड़ा और वहीं उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा। इस दुखद घटना ने उनके मन पर गहरा घाव छोड़ दिया, लेकिन साथ ही उन्हें इतना मजबूत बना दिया कि उन्होंने भविष्य में कभी किसी के आगे हाथ न फैलाने की कसम खाई।

खेती और पशुपालन से संवारी आर्थिक हालत

केवल अपनी मुख्य नौकरी पर ही निर्भर रहने के बजाय सेसप्पा ने कई अन्य स्रोतों से आय जुटाने का रास्ता चुना। उन्होंने कृषि कार्यों में हाथ आजमाया, डेयरी का काम संभाला और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त मेहनत मजदूरी भी की। उनका हमेशा से यही मानना रहा है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है। चाहे काम खेत में हो, सड़क पर हो या कचरा उठाने का हो, अगर उसे पूरी निष्ठा से किया जाए तो वह कभी छोटा नहीं होता। इसी सोच ने उन्हें उस स्थिति से बाहर निकाला जब उनके पास अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे।

महंगी गाड़ी और झाड़ू के बीच का संदेश

आज सेसप्पा के पास फॉर्च्यूनर गाड़ी होने के बावजूद सड़क पर झाड़ू लगाते वक्त उनके मन में कोई झिझक या अहंकार नहीं होता है। उनकी नजर में पैसा या वाहन सफलता का पैमाना तय नहीं करते हैं, बल्कि असली सफलता अपनी जिम्मेदारियों को पूरी शिद्दत से निभाना है। वह आज भी अपने हर काम को किसी पूजा की तरह करते हैं। उनका पूरा जीवन यही बड़ा संदेश देता है कि इंसान की पहचान उसके काम के छोटे या बड़े होने से नहीं, बल्कि उस काम को करने की उसकी नीयत और ईमानदारी से तय होती है।

सवाल-जवाब

सेसप्पा कहां के रहने वाले हैं?
सेसप्पा कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के बिसरोड़ी गांव के रहने वाले हैं।
सेसप्पा की वित्तीय स्थिति में सुधार कैसे हुआ?
उन्होंने शराब की लत छोड़कर खेती, डेयरी, मजदूरी और सफाई का काम करके अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया।
सेसप्पा के पास कौन सी गाड़ी है?
अपनी कड़ी मेहनत के दम पर सेसप्पा ने एक फॉर्च्यूनर कार खरीदी है।
उनके जीवन का सबसे दर्दनाक अनुभव क्या था?
उनके पिता के निधन के समय उनके पास अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे और उन्हें नेत्रावती नदी के किनारे अंतिम संस्कार करना पड़ा था।
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